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शिव समय के देवता

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पूर्णिमा पर चांद जब निकलता है, वह सोलह कलाओं से निपुण होता है, सुहागिन स्त्री भी सोलह श्रृंगार करती है, पर शिव अट्ठारह श्रृंगार करते हैं, शिव को अवधूत कहा जाता है, अवधूत यानि स्वयं शिव, जिसके श्मशान भूमि और राज भूमि एक सी हो, जो मल और मांस दोनों खा सकता हो. हमारे यहां संतो की सबसे बड़ी डिग्री अवधुत ही है, भगवान दत्तात्रेय भी अवधूत थे और रामकृष्ण परमहंस भी. अवधूत संयास की वह अवस्था है जहां मोक्ष पाने के लिए नहीं बल्कि मोक्ष दिलाने के लिए साधना की जाती है. शिव को लेकर एक बात कहीं जाती है कि वह संहार के देवता हैं, महाकाल के काल को मौत मान लिया जाता है जबकि वह समय के देवता हैं, उनको ढंग से देखिए समय यानि क्या? भूतकाल, वर्तमान और भविष्य. शिव की तीन आंखें हैं, उनके माथे पर त्रिपुण है, उनको बेलपत्र भी तीन पत्तियों वाली चढ़ाई जाती है. बीच का सिरा वर्तमान है और बाकि बाकि दो सिरे भविष्य और भूत है. वर्तमान का सिरा हमेशा स्थिर होता है, बिल्कुल सीध में जिसे एक मंत्र ओम् तत् सत् से जोड़ सकते हैं, जिससे आशय है कि हम आज में ही जी सकते हैं बाकि भविष्य और भूत के विषय में सोचकर हम निश्चित और आ...

दूरियां ज़रूरी हैं

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दूरियां ज़रूरी हैं इक दूजे को समझने के लिए. यह सलाखें, यह पाबंदियां उन जिंदगियों की असलियत है जो बंद है कारावास में वर्षों से. उनकी खुशियों का रास्ता है यह झरोखा, जो लाता है उन तक उनके अपनों की महक और फिर मिलने की आस.

गोरा रंग श्रेष्ठ कैसे

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राक्षसों के शरीर का का रंग काला है वही देवता श्वेत वर्ण के है, भगवान को भी हम गोरे काले रंग से तोलते है, सूर्य देवता को उनके पुत्र पसंद नहीं थे क्योंकि शनि देव अश्वेत थे. जब बचपन से हमें साहित्य में बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला जैसी कहावतें सिखाई जाती है तो यकीनन हम काले रंग को नीच और बुराई का प्रतीक मानने लग जाते है, हमारे समाज में गोरे रंग की एक सत्ता है, जो जन्म से ही श्रेष्ठ घोषित हो जाती है, सड़कों पर हमें दुपट्टा बांधे महिलाएं दिख जाती है, विकास की दौड़ में कहर बरपाती धूप से बचती इन महिलाओं को धूप से नहीं काले होने से डर लगता है, यदि गोरे रंग की मालकियत समाप्त हो गई तो ब्यूटी प्रोडक्ट के कई धंधे बंद हो जाएंगे, किसी व्यक्ति के शरीर का रंग भद्दा कैसे हो सकता है? जबकि विश्व इतिहास में गांधी, नेल्सन मंडेला और मार्टिन लूथर किंग जूनियर तक इस श्वेत सिंहासन को हिलाने में अपना समय देते है, फोटोशॉप के जरिए खुद को ब्यूटीफुल दिखाने के लिए खुद को गोरा करता समाज पिछड़ेपन में जीता है, यह पिछड़ापन उस गुलामी का ही रूपक है, जो गोरों की गुलामी करता है, हम भी बड़े अजीब है, हमे शरीर का रंग गोरा चा...

मुझे भीड़ पसंद नहीं है

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मुझे भीड़ पसंद नहीं है, न मुझे भीड़ में खड़ा होना भाता है न ही मुझे भीड़ को ताकना पसंद है फिर भी मेरा सच यही है कि मैं भीड़ में ही कहीं शामिल हूं. लोग अक्सर गांव से शहर की ओर जाते हैं, मैं शहर से गांव गया था, वो भी पत्रकारिता करने मैंने गांव को जितना भी जाना समझा है इस तमगे के साथ जाना है. पत्रकारिता करनी है, यह मैंने पांच साल पहले सोचा था. सोचते ही माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय में एडमिशन ले लिया, वहां गया तो पत्रकार बनने था पर वहां नेता (छात्र नेता) ज्यादा समझा गया. इस नेता शब्द को मिटाने के लिए अखबार, चैनल के दफ्तर खंगालने लग गया, आखिरकार मुझे देर सवेर इस शब्द से अब छुट्टी मिल चुकी है. मैं किस्मत में बहुत मानता हूं, कई बार मेहनत से ज्यादा और कई बार उसके बराबर भी, मैंने किस्मत को कभी भी मेहनत से कम नहीं आंका है. ऐसा क्यों है? इसके पीछे अब तक की पूरी 23 साल की जिंदगी है. एक बात जो मेरे साथ परछाई की तरह जुडी है, हम अक्सर देखते हैं कि हमारे मम्मी पापा से झगडे होते हैं जो खत्म इस लाइन पर होते हैं कि आप मुझे नहीं समझ सकते. यह लाइन मैंने कभी नहीं कहीं क्योंकि जिन्होंने मेरी परवरि...

कर्नाटक विधानसभा में हुए इस विवाद को समझने के लिए जानना होगा आखिर फर्जी/असली सेनानी क्या बला है?

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कर्नाटक विधानसभा में एक अजीब वाकया घटा जब बीजेपी विधायक बासनगौड़ा पाटिल यतनाल के एक बयान पर विवाद खड़ा हो गया, विधायक यतनाल ने पिछले दिनों एच. एस दौरेस्वामी को फर्जी स्वतंत्रता सेनानी कहा था। यतनाल के शब्द थे, "कई फर्जी स्वतंत्रता सेनानी हैं, एक बैंगलोर में भी हैं, हमें अब बताना पड़ेगा कि दौरेस्वामी क्या हैं? वह वृद्ध कहा हैं? वह पाकिस्तान के एजेंट की तरह व्यवहार करते हैं." गौरतलब है कि दोरेस्वामी अक्सर राज्य की भाजपा सरकार के खिलाफ बयान देते रहते हैं. जिसको लेकर वह विधायक के निशाने पर थे, वैसे उन्होंने जिस फर्जी सेनानी कहकर दौरेस्वामी को घेरा है, वह समझने के यह फर्जी सेनानी क्या होता है? अगर विधायक फर्जी सेनानी हैं, तो फिर असली सेनानी क्या होता हैं? दरअसल हम हर साल स्वतंत्रता दिवस तो बड़े उत्साह से मना लेते हैं वहीं स्वतंत्रता सेनानी क्या होते हैं? इसका सही - सही ज़बाब हमारे पास नहीं है, जो हम थोड़ा बहुत उस शब्द का अर्थ लगा लेते हैं, वह यह है कि जो व्यक्ति अंग्रेजों के खिलाफ लड़ा था वह स्वतंत्रता सेनानी हैं. लेकिन सरकार की स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शब्द की परिभाषा ...

सांप्रदायिकता के रंग में रंगी दिल्ली ढूंढ रही इंसान

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सांप्रदायिकता के रंग में रंगी दिल्ली ढूंढ रही इंसान तू हिन्दु बनेगा ना मुसलमान बनेगा, इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा, यह लाइन यू तो फिल्म देवता के एक गीत की है. आज यह लाइन दिल्ली के उस दौर में काफी मार्मिक होती दिखती है, जहां सारी लड़ाई मजहब की दीवार पर साम्प्रदायिकता के रंग से रंगी गई थी. रह रह कर 72 घंटे चली इस हिंसा के ज्वार में हमने क्या खोया ? जब इस सवाल पर मंथन दिल्ली के दंगा प्रभावित क्षेत्रों में ढूंढने की कोशिश की जाती है, तो तिरंगे के रंग को भगवा और हरे से पाटने की गुस्ताखी साफ नजर आती है. हमारे पूर्वजों की गंगा जमुनी तहज़ीब 42 जिंदगियों के खून से धुल गई है. कहते हैं दिल्ली देश का दिल है, जब दिल धड़कता है, तो शरीर जिंदा है, यह अहसास होता है, वही दो रोज पहले जब देश के दिल की गलियां पत्थर और ईट के टूकडों से पटी पड़ी थी. तब देश चैन की सांस कैसे जी रहा होगा, देश खुश होने का दिखावा कर रहा होगा, वही वह भीतर ही भीतर दर्द से कराह रहा होगा, वह दर्द जो मन को कचोट देता है, किसी अपने के खोने की वह पीड़ा जो किसी अपने के चेहरे को बस यादों में ही देख सकती है. हकीकत में नहीं. कहते हैं दुनि...

थप्पड़ फिल्म लाश को बोलते हुए दिखाती है

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ओशो कहते हैं "सबको बीबी लाश जैसी चाहिए." थप्पड़ फिल्म उस लाश के बोलने की कहानी है. फिल्म में स्लो ड्रामा है, एक थप्पड़ के सीन में ही बस नाटकीय पक्ष दिखता है. फिल्म की हीरोइन अमृता है, जो अपनी मां जैसी हाउस वाइफ बनने की ओर है, वह अपनी मां के नुस्खों पर हंसती है, वही वह अपने पति की जरूरी मीटिंग से पहले उसकी जेब में पर्ची रखने की कोशिश करती है, क्योंकि उसे विश्वास है अपनी मां की उस बात पर कि ऐसा करने से उसका काम हो जाएगा. फिल्म का नाम थप्पड़ है, जो थप्पड़ अमृता के गाल के साथ - साथ उसकी अस्मिता पर भी पड़ता दिखता है. फिल्म के मैसेज को समझने के लिए सिर्फ महिला किरदारों के संवाद ही काफी है. एक अमृता के पिता को छोड़ दिया जाए तो यह पूरी मूवी महिलाओं की कहानी कही जा सकती है. ओशो की बात पर गौर करें तो बीबी तो एक लाश है, जो बच्चे पैदा करती है, अपनी सांस की डायबिटीज चेंक करती है, सुबह मोबाइल पर्स लिए अपने पति को कार तक बिठाने आती है. जब बात पत्नी की इच्छाओं की आती है, तो वह तो सिर्फ एक लाश है. लाश को कहा बुरा लगता है, बुरा लगेगा भी तो क्या कर लेंगी? थोड़ा सा रो लेंगी, घर का सामान बिखेर ल...

सोचता हूं घर छोड़ दूं

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सोच रहा हूं घर छोड़ दूं, घर में अब वह किवाड़ ढंग से खुलती नहीं है, चटखनी अंदर से बंद भी कर देता हूं, तो एक बार की जोर आजमाइश से दरवाजा धड़ाक से खुल जाता है. सोचता हूं घर छोड़ दूं, बारिश के कहर में घर का रंग कालिख में तब्दील हो गया है, दीवार पर टंगी सभी तस्वीरें दीमक की जद में हैं, मेरे घर का सोफ़ा पानी के बहाव में भीग गया है. सोचता हूं घर छोड़ दूं, मच्छरों ने दिमाग खराब करके रख दिया है, खुले बदन लेटता हूं, तो मेरे शरीर पर लाल रंग के चट्टे उभर आते हैं, इन मां के जनों ने मेरा खून चूस कर रख दिया है. सोचता हूं घर छोड़ दूं, घर में बिजली का मीटर उखड़ गया है, पंखे, टीवी सब सिर्फ साजों सामान बनकर रह गए हैं, मोबाइल चार्ज करने भी पड़ोसी के घर भागना होता है. सोचता हूं घर छोड़ दूं, मेरा घर अब मकान में तब्दील हो गया है, जहां अब सिर्फ वीराने का ही राज है, हर तरफ ईट सीमेंट के बने कमरों से रिश्ते गायब हो गए. सोचता हूं घर छोड़ दूं, मेरा दिन तो मोबाइल की अलार्म से वॉट्सएप की आखरी चेट तक ही है, दोस्तों के दिल भी फेसबुक के रिएक्शन में ढूंढना पड़ता है. सोचता हूं घर छोड़ दूं, क्योंकि अब मैं एक मशीन ब...

कल्पनाओं के पक्षी

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चलिए कल्पना के पक्षियों की उड़ान को नापते हैं, पिछले दिनों एक किताब पढ़ी उसमें ककनूस पक्षी का जिक्र आया था, चील की लंबाई - चौड़ाई का यह पक्षी थोड़ा अलहदा है, इसके पंख चमकीले, किरमिची और सुनहरे होते हैं। इसके स्वर में संगीत होता है। इसकी आयु कम से कम पांच सौ वर्ष होती है। कुछ विद्वान इसकी आयु का अनुमान सत्तानवे हजार दो सौ वर्ष लगाते है। जब इसकी आयु की अवधि शेष रहने लगती है, यह सुगंधित वृक्षों की टहनियां इकट्ठी करके एक घोंसला बनाता है और यह घोंसला सहित उसमें जल जाता है। इसकी राख में से एक ककनूस जन्म लेता है, जो सारी सुगंधित राख को समेटकर सूरज के मंदिर की ओर जाकर राख को सूरज के सामने चढ़ा देता है। मिस्र के पुरातन पक्षी का घर उधर बताया जाता है, जिधर सूरज उदय होता है, इसीलिए लोग इस पक्षी का स्थान अरब या हिंदुस्तान मानते हैं, हिंदुस्तान अधिक क्योंकि सुगंधित वृक्षों की टहनियां हिंदुस्तान की भूमि के साथ जुडती है। ककनूस को लैटिन के एक कवि ने रोमन राज्य से संबंधित किया है, कुछ पादरियों ने इसे क्राइस्ट की मृत्यु और उसके पुनजीर्वित होने की वार्ता से जोड़ा है। जब मैं यह पढ़ रहा था मुझे हमारे आध्...

प्रेम जंग में जीतना नहीं सिखाता

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अभी अभी एक ख्याल आया, खुद को उन आंखों के भीतर महसूस किया, जिनमें कभी मैं समाता था, आंखों की भीतरी भृति से जब धीरे धीरे उसके दिल के नजदीक जाने की कोशिश की, तो उसके यादों के बंद संदूक में एक भी फोटो मेरी नहीं थी, उसमें ढेर सारे रंग बिरंगे चमक धमक वाले लोग कैद थे, प्रेम में डूबी प्रकृति जिनकी दुनिया लाल, हरे, नीले गहरे चटक रंगों से सजी हुई सी लगी, मैं तो पूर्णतः कोरा कागज जितना खाली हूं, वह भी पूरा सफेद कागज नहीं, रद्दी को गलाकर बनी रफ कांपी का कागज जैसा हूं, उन चमक भरे संदूक में खुद को खोजना घास के ढेर में सूई खोजने जितना मुश्किल काम है, मुझे उसके दिल की परत दर परत देखना अच्छा भी लग रहा था, पर इतनी रोशनी में मेरी आंखें बंद हो गई थी, अंधेरे में रहने वाली मेरी आंखें उस प्रकाश को देखकर बंद हो गई, बंद आंखों से जब मैंने गलती से उस संदूक को बंद कर दिया तो मुझे बंद आंखों से वह महसूस हुआ, जिसे अपनी असल जिंदगी में मैंने कभी महसूस ही नहीं किया था, वह सुराही के पानी जितना ठंडा कुछ था, जिसे देखकर पवित्रता का वह भाव पैदा हुआ, जो भाव छुटपन में मंदिर में महसूस होता था, मेरी समझ में वह उस खुदा का ...

हरियाणा चुनाव एक भोपाली की नजर से

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पिछले दो दिनों से हरियाणा में हूं, यह राज्य मुझे बड़ा अनोखा लगता है, यहां के लोग हम मध्यप्रदेश वासियों की तरह सुस्त न होकर काफी फुर्तीले होते हैं. (मैं खुद सुस्त हूं, इसीलिए पूरे राज्य को लिख रहा हूं) मुझे जीवन में पहली बार मध्यप्रदेश के अलावा जिस दूसरे राज्य के मुख्यमंत्री का नाम याद हुआ था, वह हरियाणा था, तब भुपेंद्र हुड्डा मुख्यमंत्री हुआ करते थे, शायद उन्हें मुख्यमंत्री बने कुछ अरसा ही हुआ होगा, कि दिल्ली के बिड़ला मंदिर के नजदीक स्थित आर्य समाज भवन में इन्हें करीब से देखा था, ब्लैक वर्दी धारी अंगरक्षकों के साथ आएं हुड्डा वहां आएं कार्यक्रम में खाना परोसने लग गए, जब अंगरक्षक खाना परोसने के उनके काम में अड़ंगा बन गए तो उन्होंने उन्हें वहां से चलता किया, वह कार्यक्रम भुपेंद्र हुड्डा के पिता की अध्यक्षता में आयोजित किया गया था, तब मैंने पहली बार हुड्डा को खाना परोसते हुए देखा था, मेरे घर में एक दीवार घड़ी हुआ करती थी, जिसमें हुड्डा के पिता (चौधरी रणबीर सिंह हुड्डा) की फोटो चस्पा थी, उनका 1 फरवरी 2009 को देहावसान हो गया था. वह रोहतक से 1952 के चुनाव में जीतने वाले प्रत्याशी थे, इ...

रिश्ते उलझे धागे से

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रिश्तों को समझना सचमुच कितना मुश्किल है, एक पल में अपने पराये के एक शब्द से हम रिश्तों को पुकारने लग जाते हैं. मनुष्य रिश्तों की एक महीन सी डोर पर सवार होकर संबंधों को परखना चाहता है, उसे हर दम अपने मतलब का सामान बटोरना होता है, दुर्गा सप्तशती के दूसरे अध्याय में लिखा है, कि कुत्ता अपने खुद के बारे में सोचता है, पक्षी अपने बच्चों की चोंच में दाना डालकर खुश होते हैं पर मानव सभी के बारे में सोचता है. कुत्ते, पक्षी और मानव के बीच यह अंतर अगर लागू किया जाए, तो बहुतरे मानव कुत्तों और पक्षियों के रूप में बंट जाएंगे, जो थोड़े लोग दूसरों की पीड़ा को खुद का दुख और दूसरो की खुशी में मुस्कुराएंगे वह महात्मा ही कहलाएं जा सकते हैं. वो सुबह कभी तो आएगी मुझे समाज में इस समय दो मनोवृत्ति के लोग दिखते हैं, जब वह छोटे शहरों की बड़ी परंपराओं में बंधकर बड़े शहरों में जाते हैं, तो वह अपने पिता, माता, फुफा, ताई की नजर से उस शहर को देखने लग जाते हैं, उन्हें देखकर ऐसा लगता है, जैसे वह जहाज में खजाना लिए समुद्री डाकूओं से बच रहे हो, उनके मन में कुछ कहावतें घर कर जाती है, जैसे लड़की खुली तिजोरी की तरह ह...

आईआईएमसी तक आने का रास्ता इतना आसान भी नहीं है

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मैं आईआईएमसी का छात्र हूं, पिछले साल जब माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय से बैचलर करके पास हुआ, तो आगे क्या करना है? यह सवाल सर पर था, एक दोस्त ने बताया कि जामिया में पत्रकारिता का डिप्लोमा होता है, चले जाओ आगे का अच्छा स्कोप है, मैंने इंट्रेस दिया. जिस दोस्त के साथ में जामिया का इंट्रेस देने आया था, उसने कहा भाई आईआईएमसी उससे भी उम्दा संस्थान है, वहां का फार्म भर दे. मैंने यहां का प्रोस्पेक्टस उठाकर देखा तो 79,000 रूपए यहां की फीस थी, मेरी माली हालत ऐसी नहीं थी, कि मैं यहां पढ़ सकूं, सोचा फार्म भरकर तो देखते हैं, जब फार्म देखा तो एक हजार रूपए का एक पाठ्यक्रम का फार्म था, फिर अगर इंट्रेस निकल जाता तो दिल्ली जाने का खर्चा अलग से, अपनी जेब पढ़ने की इजाजत वैसे भी नहीं दे रही थी. दादी की मौत के बाद मेरे पास कोई आय का साधन भी नहीं था। दिमागी गणित फिट करके यहां फार्म नहीं भरा, उस समय विश्वविद्यालय से ईटीवी में प्लेसमेंट हो गया था. सोचा आगे कि पढ़ाई प्राइवेट इग्नू या भोज से डाल देंगे। पढ़ाई की पढ़ाई हो जाएंगी और नौकरी की नौकरी भी। अपन झोला उठाकर नरसिंहपुर चल दिए। वहां पर पत्रकारिता की हालत दे...

न्याय की देवी की आंख पर पट्टी क्यों?

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न्याय की देवी की आंख पर पट्टी है, उनके एक हाथ में तराजू है, तो दूसरे हाथ में तलवार. जिसको आंखों से दिखता नहीं है, वह तराजू के पलड़े पर सच के वजन को भी नहीं देख सकती, न ही तलवार से अपराधियों को दंड दे सकती है. फिर हम भारतीय न्याय व्यवस्था से इंसाफ की उम्मीद क्यों करते हैं. जिन जानवरों ने उस डॉक्टर का यौन शोषण कर उसको जलाया था, उनके लिए जंगल के कानून की ही जरूरत है. हम गांधीवादी होकर सबको न्याय की बात कर सकते हैं लेकिन सुधार गृह में इंसान भेजे जाते हैं, वहशी जानवर नहीं, उनकी तो बली ही चढनी चाहिए, मेरे विचार आक्रमक हो रहे हैं, मैं जानता हूं. न्याय की देवी   जब पोर्न साईट पर देश के लाखों सरफिरे लोग  उस मासूम के साथ हुए दुष्कर्म की वीडियो तलाश रहे थे, तब मुझे दुख हुआ था, जब संसद रोड पर बैठी लड़की रो रही थी, तब मुझे दुख हुआ था.जब आज जनसत्ता अखबार में एक अध्ययन को पढ़ा और पता चला कि भोपाल, ग्वालियर और जोधपुर शहरों में 90 फीसद महिलाएं असुरक्षित महसूस करती है, तो मुझे दुख हुआ. जेल रूपी सुधार गृह में उन सभी लोगों को बंद कर देना चाहिए, जिनकी फब्तियों, नज़रों से लड़कियां असु...

अदाकार क्यों बोले भाई?

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एक मर्तबा शाहरुख खान से किसी ने पूछा था, कि हॉलीवुड के अदाकार अक्सर अपने देश में घट रहे मुद्दों पर अपनी राय देते हैं, आप क्यों अपनी राय नहीं देते? उनका ज़बाब था, वहां की मीडिया सिर्फ उनके बयान को दिखाती है लेकिन यहां अगर मैं किसी मुद्दे पर अपनी बात कहूंगा, तो बाजीगर फिल्म की धुन के साथ आधे घंटे का एपीसोड बनेगा. अभी हाल ही में Jnu में दीपिका पादुकोण के जाने पर बवाल मचा था यह बात तो किंग खान ने कहीं थी पर हमारा असली चरित्र यही है, हमें फिल्मी सितारे पर्दे के भीतर ही स्टेंड लेते हुए अच्छे लगते हैं, असल जिंदगी में नहीं. असलियत में अगर वह कुछ कह देते हैं, तो हमारे जज करने वाले पैरामीटर से हम उन्हें एक सर्टिफिकेट से नवाज देते हैं. कुछ ऐसा ही अभी दीपिका पादुकोण के साथ होते दिख रहा है. भई दीपिका की मर्जी वह जेएनयू जाएं या न जाएं. उनकी मर्जी वह वहां किस मंच पर रूके. उनकी संवेदना, उनकी आजादी, उनकी अभिव्यक्ति वह चाहे जिसका समर्थन करें. उनके जाने से यदि आप उन्हें देशद्रोही, टुकड़े टुकड़े गैंग का मेंबर  और छपाक फिल्म के विरोध में ट्वीट करके खुश होते हैं, तो यकीन मानिए आपके अंदर से लोकत...

धर्म : मिथक या सत्य

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आर वेंकटरमण एक मर्तबा लंदन गए, वहां उन्होंने लिखे हुए नीरस भाषण में थोड़ा रस लाने के लिए एक कहानी को सुनाया, कहानी यू तो रोमियो जूलियट की थी पर उन्होंने उसमें थोड़ा फेरबदल कर दिया, आर वेंकटरमण ने कहा कि " यह दुखद है कि शेक्सपियर ने अपने नाटक रोमियो और जूलियट का त्रासद अंत किया, जिसमें रोमियो और जूलियट दोनों मर गए। मेरे पास उसी कहानी का संशोधित रूप है और इसमें सिर्फ रोमियो मरता है। इससे जूलियट इतनी दुखी और निराश होती है कि एकदम बेहाल पड़ी रहती है। उसकी सहेलियां उसे सलाह देती है कि वह रोमियो की आत्मा से बात कर ले। इससे उसे राहत मिलेगी। बातचीत शुरू होती है और रोमियो से बात करके खुशी से झूमती जूलियट उस पर सवालों की बौछार कर देती है। वह उससे उसके स्वास्थ्य , खाने, खेलने और आसपास के माहौल के बारे में पूछती है। रोमियो ज़बाब देता है, ' ओह! जूलियट, मैं एक आश्चर्यचकित दुनिया में हूं। यहां खाने के लिए बहुत कुछ है। गीत संगीत, डांस, थियेटर सब कुछ दिन रात चलता रहता है। साथी है, जो समय को जीवंत बना देते हैं... जूलियट को लगता है कि रोमियो स्वर्ग में हैं। उसने कहा ओ रोमियो , स्वर्ग बहुत अच्छी...

तुम जेल गए थे?

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तुम जेल गए थे? कोई सबूत है तुम्हारे पास, केंद्र सरकार से ताम्रपत्र तो मिला ही होगा, अच्छा बताओ किस आंदोलन में शामिल हुए थे? अरे तुम तो महिला हो, महिलाओं की जेल कहा होती थी आजादी के दिनों में, नहीं नहीं तुम छः महीने से कम समय जेल में बिताए हो हम तुम्हें स्वतंत्रता सेनानी नहीं मान सकते. जेल का प्रतीकात्मक फोटो यह वह सवाल है, जिनका सामना हमारे देश के स्वतंत्रता सेनानी करते हैं, हमने इतिहास की किताब में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शब्द तो कई बार पढ़ा है, पर उसके मायने हमें आज तक नहीं पता है. स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को कई कैटेगरी में भारत सरकार ने बांट रखा है, मसलन आप भारत छोड़ो आंदोलन सरीखे आंदोलन में जेल में बंद हुए थे तो आप देश के स्वतंत्रता सेनानी है, यदि आप भोपाल की आजादी के लिए भोपाल की जेल में बंद हुए थे तो आप राज्य के सेनानी है. अगर इस परिभाषा को देखे तो चंद्रशेखर आजाद स्वतंत्रता सेनानी नहीं है क्योंकि वह असहयोग आंदोलन में बेत से पिटने की सजा छोड़कर कभी जेल में बंदी नहीं रहे है. केंद्र और राज्य के सेनानी में उतना ही अंतर है जितना मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के पद में अंतर...

मर्द होने की पीड़ा

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मेरे अंदर के आदमी को मारने की मैंने खूब कोशिश की, लेकिन वह मरता ही नहीं है, उसे तिरष्कार स्वीकार ही नहीं है, वह नकली मर्दानगी की आड़ में अपनी कमजोरियों को छिपाता है, उसे बार-बार यह दिलासा हम देते रहते हैं, कि बेटा हम मर्द है, मर्द मतलब पिता (सब ही का बाप). वह महिलाओं को मिलने वाली आजादी का पक्षधर हैं, उसे उनका घुमना फिरना, चाट पकोड़ी खाना पसंद हैं लेकिन खुद के साथ. वह उनको सिनेमाघर की कोने वाली सीट पर इसलिए बिठाना चाहता है, ताकि वह वहां अंधेरे का फायदा उठाकर जता सके कि मैं मर्द हूं. मैं कुछ भी कर सकता हूं. तुम्हारी मर्जी और ना की परवाह मुझे कभी नहीं होगी. मैं मर्द जो ठहरा मैं तुम्हें आज़ादी दिलवायुगा पर समानता नहीं. मैं सड़कों गलियों में गालियां बोलूंगा, गालियों में भी में अपनी मर्द होने की निशानियां दूंगा.  मर्दानगी की आधी सलाखें हमें बचपन से दिखा दी जाती है, जिसके चक्कर में हमें आधा खुला दरवाजा कभी नहीं दिखता मुझे तुम्हारे साथ रिलेशन में आने का अधिकार है, मैं ही तुम्हें वॉट्सएप की दीवार के उस छोर से पहल करूंगा, तुम मत करना यह सिर्फ मर्दों का काम है, मैं रिलेशन में आकर ...

मौत के बाद न रूह की गंध से एक - दूसरे को पहचाना जाएगा

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सिगरेट का एक कश मुंह में लेकर धुएं को गले से सहला ही रहा था, कि वह बोल पड़ी तुम मरना चाहते हो क्या? मैंने कहा हां. जिंदगी मैंने खुद नहीं चुनी थी, यक़ीनन मौत में अपनी खुद चुन चुका हूं, वेंटीलेटर पर मरते समय अपनी आंखों के सामने से जब मैं अपनी पूरी जिंदगी को गुजरते हुए  देखूं तो मुझे गम न हो, कि जिंदगी भी किसी ओर ने दी थी और मौत भी मेरी दूसरे चुन रहे हैं. मैं कभी किसी दूसरे को वह जगह नहीं दूंगा, कि तुम मेरे जज्बातों के साथ खेलों और मैं हार्ट अटैक से मर जाऊं, हां मैंने हर गलती पर दूसरों को कोसने की जगह खुद को जिम्मेदार माना है, मैंने जिसको भी अपना माना, उसने मुझे ऐसा दर्द उपहार में दिया, जिसको बयां करने के लिए शब्द कम है. कई बार लगता है, मेरी आंखों का पानी अब सूख चुका है, जो भीतरी आंसूओं का सरोता होगा, वह शायद सूख गया होगा, उसे अब दोबारा भरने के लिए एक नया जीवन चाहिए, जिसके लिए मुझे मौत चाहिए. मौत से बड़ा सुख दुनिया में कुछ नहीं है, जिंदगी भी नहीं. ईश्वर ने हमें जिंदगी जिन सुखों के लिए दी है, वह सब सुख अब बेमानी है. हकीमों, डॉक्टरों, मंदिरों, दरगाह ऐसी कोई जगह नहीं बची है, जहां जाते ...

छोड़ो कल की बातें

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छोड़ो कल की बातें कल की बात पुरानी, नए दौर में लिखेंगे मिलकर नई कहानी. वाह क्या गीत है? सुनकर लगता है, मानों सही में मेहनतकश इसे सुनकर अपने काम में ओर भी मेहनत से लग जाएंगे. वैसे यह गीत प्रेम धवन साहब ने लिखा है, हम हिंदूस्तानी फिल्म के लिए, गाया भी इसे मुकेश ने. मतलब यह तो सोने पर सुहागे वाली बात हो गई. लेकिन इस गाने को सुनने वाला आम आदमी मतलब मेरी उम्र का व्यक्ति इसे ब्रेकअप सांग समझ सकता है. मतलब लेखक साहब कह रहे हैं, भई दीपू उस लड़की की पिछली बातों को भूल जाओं , टेंशन मत लो, नए दौर में कोई नया साथी ढूंढ लेना. गाने का प्रसंग कोई भी हो, उसे किसी भी उद्देश्य से लिखा गया हो, वह अपनी टारगेट ऑडियंस पर असर तो करते ही हैं. जो गाने का मतलब नहीं समझ सकते हैं, वह अपनी तय फीलिंग के हिसाब से उसे अपना खुद का गाना मान लेता है. गाने में फूल मूर्खता का भी रूपक है और सुंदरता का भी शैलेन्द्र के कई गीत मैंने मंदिर में भजन के तौर पर गाते हुए सुने हैं. मुझे पहले पहल तो लगा कि यह भजन है, जब रंगहीन प्रिंट में राजकपूर को बेलगाड़ी हांकते हुए देखा और गाना बजता है, सजनवा बैरी हो गए हमारे, कर्मवा बैर...

शाहीन बाग तुम्हें सलाम

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हर मोहल्ले में एक दो महिलाएं ऐसी होती है, जिन्हें पूरे मोहल्ले की खबर होती है,वह हर मकान की खिड़की के अंदर की बातों को बड़े चाव से बताती है. उन्हें पता होता है, कि पुष्पा अपनी आई सरला के साथ आज नया हीटर खरीदने गई है. वह फिर अपने सामाजिक विश्लेषण करने के हुनर से बताती है, देखना सरला  बारह सौ रूपए तक का ही हीटर खरीद कर लाएंगी, फालतू की फिजूलखर्ची पुष्पा उसे करने ही नहीं देंगी. ऐसी ही एक मोहल्ले के कान कहे जाने वाली अम्मा के मुंह से मैंने एक महिला की आपबीती सुनी है, जो सुनकर मुझे संवेदना और आक्रोश का भाव एक साथ महसूस हुआ. दरअसल यह एक ऐसी महिला है, जो अधेड़ उम्र की है और अभी आईसीयू में भर्ती होकर आई है, उसे दिक्कत या साफ लफ्जों में उसकी बीमारी का एक ही नाम है, उसका शराबी पति. वह पति जो अपनी पत्नी को इस कदर डराता है, कि वह उसकी मार चिल्ला चोंट से सहम कर बेहोश हो गई. जब मेरे से दो तीन साल छोटा उसका बेटा उसे अस्पताल लेकर गया तो उसकी मां उस अवस्था में थी, जिसे डॉक्टरी भाषा में कोमा कहा जाता है. वैसे अभी वह होश में आकर घर आ गई है, लेकिन यह हमारे समाज में महिलाओं की स्थिति है. जो अपनी स्वाभ...

मैं तुलसीदास हूं

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मैं तुलसीदास हूं.  वह तुलसीदास जो अपनी पत्नी से बेशुमार मोहब्बत करता था, उसे मिलने की चाह में मैं लाश को नाव समझकर नदी पार कर गया, जी हां मुझ पागल को सांप और रस्सी में अंतर समझ नहीं आया था, मैं तो बस अपनी प्रियसी का मुखड़ा देखना चाहता था. रात में जब मैं अपनी पत्नी के पास पहुंचा तो उसने कहा तुम मुझे जितना चाहते हो, अगर उतना भगवान को चाहोगे तो भगवान तुम्हें मिल जाएंगे. मैं क्या करता? मैं  तो बस अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता था, उसकी कही बात को पूरा करने मैं निकल पड़ा. अब मुझे भगवान ढूंढना था, जो मुझे राम में मिले, मेरे श्री राम में मिले. वैसे मुझे रामजी से उनके भक्त हनुमान जी ने मिलवाया था और हनुमान जी का पता एक प्रेत ने दिया था, वैसे मैं ही वह तुलसी हूं जिसने हनुमान चालीसा में लिखा था, भूत पिसाच निकट नहिं आवै महावीर जब नाम सुनावे. वही इन्हीं की बिरादरी के प्रेत ने मुझे बजरंग बली से मिलवाया था. तुलसी  मैं संस्कृत में लिखी रामायण को अवधी में लिखने का काम शुरू कर चुका था, मुझे शिव सती से शुरू हुई रामचरितमानस को लिखते- लिखते ऐसा लगा जैसे प्रभु मेरी आंखों के सामने ही...

सेक्स के लिए अलहदा च्वाइस से क्या आप अलग है?

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क्या मेरा देश बदल रहा है? क्या वह किसी दूसरे व्यक्ति को इसलिए जज करना छोड़ चूका है क्योंकि उसकी सेक्स के लिए साथी की पसंद उससे अलहदा है. अंसर हां भी है और नही भी. इसी तरीके के जनमत को ही मिली जुली प्रतिक्रिया कहा जाता है. आजकल एक विज्ञापन टीवी स्क्रीन पर दिखता है, जिसमें करण जौहर एक सूप का प्रचार करते दिखते हैं. सभी जानते हैं करण जौहर साहब वह व्यक्ति हैं, जो हमारी ठेठ पुरुष की परिभाषा में फिट नहीं बैठते हैं, कई मर्तबा हमारे पास उन जैसे व्यक्तियों के लिए कोई ढंग का शब्द नहीं मिलता है, जो शब्द समाज में प्रचलन में है, उन्हें अपशब्द ही कहा जा सकता है. वैसे एलजीबीटीक्यू समुदाय का कहकर हम उस घटिया शब्दावली से  बच जाते हैं. उस विज्ञापन में महिला की जगह करण को रखकर कई रुढ़ि तुटती सी दिखती है. जो हमारे माथे में जमी हुई है.  फिल्म निर्माता करण जौहर खैर सिनेमा के सौ वर्ष पुरे होने पर एक फिल्म बनी थी बांबे टॉकीज उसमें चार निर्देशकों ने अपने हिस्से की चार कहानियां बनाई थी. उस फिल्म में करण जौहर ने जिस कहानी को उठाया था वह इस समुदाय की वास्तविक पीड़ा थी, जहां एक नौजवान घर छोड़ने ...

वह देश जिसने पांच सौ साल तक राजकर भारतीयों की रसोई में लाल मिर्च को प्रवेश कराया

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हमारे घर की रसोई में एक तीखी खाद्य वस्तु पाई जाती है, जिसे हमारे घर की अन्नपूर्णा महिलाएं खाना बनाते समय उपयोग में लाती है, यह वाक्यांश पढ़ते ही हमारे दिमाग में मिर्च की इमेज बनकर सामने आ जाती है, लेकिन यह लाल मिर्च भारत में जिस देश से आई उस देश ने भारत के एक हिस्से में पांच सौ साल तक राज किया। दो विपरीत दिशाओं में बसे पूर्व और पश्चिम पहली बार समुद्री रास्ते से जब मिले, तब से पुर्तगाली भारत पर अपना कब्जा जमाएं हुए थे।  जब हम इम्तिहान के पहले जल्दी जल्दी में एक की जगह दो  पन्ने पलट देते है, तो हम इतिहास में सौ साल पीछे चले जाते है, ऐसे नौ पन्ने पलटने पर हमें पहले यूरोपीय के भारत आगमन की जानकारी मिलती है, कि 20 मई 1498 को बारह हजार मील का सफर तय कर वास्को डी गामा भारत आया था। वह स्पाइस आइलैंड (मसाले के द्वीप) जिसे ईस्ट इंडीज कहा जाता था, उसे तलाशते हुए सरजमीं ए हिंद में पहुंच गया था, वह अपने साथ काली मिर्च जैसे मसालों से लादकर जहाज लेकर वापस गया और उसे उसके खर्चे के साठ गुना ज्यादा के दाम में वह मसाले मिले, यह व्यापारी रूप में आएं और भारत की सत्ता पर काबिज हो गएं जिनको बाद म...

एक जिंदगी काफी नहीं

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साल खत्म होने को है, बीते हुए साल के पन्ने जब पलटता हूं, तो बहुत से ऐशे दृश्य आंखों के सामने घटे है, जिसने मुझे एक नया नजरिया दिया है. मैं हर साल के आखिरी दिनों में पूरे साल को कागज पर उकेरता हूं, पिछले छह-सात साल से तो यह कर ही रहा हूं. लेकिन इस बार मेरे पास डायरी नहीं है, तो इस आभासी दुनिया के दलदल में मैं अपना हिस्सा भी न्यौछावर कर रहा हूं, वैसे भी कीचड़ में साफ पानी भी मिलकर कीचड़ ही बन जाता है, तो शुरुआत कीचड़ से ही करते हैं, खुद में खूब कमियां इस साल देखी है, जिन्हें बदलना है. कम से कम उन्हें छोड़ने की एक्टिंग तो करना ही है. उन कमियों में हद से ज्यादा चुप रहने का एक बनावटीपन सा मैंने इस साल खूब किया है. जहां मैं अस्वाभाविक रूप से चुप रहा हूं, जहां मेरे शब्द गले तक आकर होंठों की भीतरी सतह से फूटना चाहते थे, लेकिन मैंने उनको जबरदस्ती से दबा दिया. मुझे अब अपनी अभिव्यक्ति को दबाना नहीं है. भेड़ाघाट में मां नर्मदा और मैं (शुभम) मैंने इस साल जीवन में शायद दूसरी बाद खुले में शौच की है, मैं इटारसी से भोपाल गर्मी के दिनों में आ रहा था और मेरे पास शौचालय रूपी कोई जगह दिख नहीं रही...

सच्ची दास्तां जिसके सारे शब्द सच की स्याही से लिखे होंगे

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चलो एक सच्ची दास्तान लिखते हैं, जिसका एक- एक शब्द सच की स्याही से ही लिखा जाएगा, जिसे लिखने वाले ने भी कभी झूठ न कहा, न लिखा होगा, जिसको पढ़ने वाले ने भी न कभी झूठ सुना या पढ़ा होगा. यकीन मानिए यह कथ्य सिर्फ सच्चे लोगों के लिए है. आटे में नमक जितना या नमक में आटे जितना झूठ मिलाने वालों के लिए नहीं. जो झूठा होगा उसके लिए यहां लिखे शब्द ओझल हो जाएंगे. उसके सामने सच पड़ा होगा लेकिन उसे सिर्फ कोरा कागज दिखेगा. पढ़ने वाले की सच्चाई ही उसे वह शब्द महसूस करा सकती है, जो शब्द सच से उकरे गए हैं. उसी सच से जिसे भगवान की संज्ञा यह मानुष देता है. सब जानते हैं, फिर उस सच को कोई नहीं पढ़ पाएगा, सबसे बड़ा झूठ आज के समय का यही है, कि मैं झूठ नहीं बोलता. वकील अपने मुवक्किल को जिताने में झूठ बोलता है, डॉक्टर अपने मरीज में आस जगाने के लिए झूठ बोलता है. पंडित जी ग्रहों को आगे करके झूठ बोलते है और पुलिस अपने डंडे को दिखाकर करके झूठ बोलती है. बाकि नेताओं का तो सब जानते ही हैं, जीतकर पांच साल वह जिस एक चीज में सबसे अच्छी पर्फार्मेंस देते हैं. वह झूठ बोलने की कला ही है. वैसे एक धंधा बहुत ही अच्छा है, जहां न ...

कॉपीराइट एक्ट 1957

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कॉपीराइट एक्ट 1957 :  परिचय “वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।“ कितनी बेहतरीन लाइन है। पढ़ने वाले के सीधे दिल में घर कर जाती है। यह तो मरुहम शायर साहिर लुधियानवी ने लिखी है, जिसे फिल्म गुमराह के लिए फिल्माया गया हैं। सोचिए कोई बेनाम शायर इस गाने को अपनी रचना बता दे और इसको किसी ओर फिल्म के लिए बेंच देता तो साहिर लुधियानवी साहब क्या करते उनके पास रास्ता ही क्या था? अपनी रचना को अपनी खुद की रचना बताने का। इस भ्रमजाल वाले हालत से बचने के लिए जिस एक रास्ते को सरकार ने बनाया है, उस कानून का नाम है, भारतीय कॉपीराइट एक्ट जो 1957 में बना था। यह कानून उन सभी चोरों पर नकेल कसने की कोशिश करता है, जो दूसरों की कला को खुद की मेहनत बताकर मुनाफा कमाते है। किसी ने फिल्म बनाई, किसी ने कंप्यूटर प्रोग्राम तैयार किए। प्रत्येक व्यक्ति अपनी इन विधाओं को अक्षुण्ण रखना चाहता है। कोई और उसके कार्य की नकल करे, वह ऐसा नहीं चाहता। यह खासियत उसका विशेषाधिकार बन जाता है। कानून द्वारा इन अधिकारों की रक्षा की गई है। यह कानून कॉपीराइट कानून कहा जाता है। इस अधिनियम ...