छोड़ो कल की बातें
छोड़ो कल की बातें कल की बात पुरानी, नए दौर में लिखेंगे मिलकर नई कहानी. वाह क्या गीत है? सुनकर लगता है, मानों सही में मेहनतकश इसे सुनकर अपने काम में ओर भी मेहनत से लग जाएंगे. वैसे यह गीत प्रेम धवन साहब ने लिखा है, हम हिंदूस्तानी फिल्म के लिए, गाया भी इसे मुकेश ने. मतलब यह तो सोने पर सुहागे वाली बात हो गई. लेकिन इस गाने को सुनने वाला आम आदमी मतलब मेरी उम्र का व्यक्ति इसे ब्रेकअप सांग समझ सकता है. मतलब लेखक साहब कह रहे हैं, भई दीपू उस लड़की की पिछली बातों को भूल जाओं , टेंशन मत लो, नए दौर में कोई नया साथी ढूंढ लेना.
गाने का प्रसंग कोई भी हो, उसे किसी भी उद्देश्य से लिखा गया हो, वह अपनी टारगेट ऑडियंस पर असर तो करते ही हैं. जो गाने का मतलब नहीं समझ सकते हैं, वह अपनी तय फीलिंग के हिसाब से उसे अपना खुद का गाना मान लेता है.
शैलेन्द्र के कई गीत मैंने मंदिर में भजन के तौर पर गाते हुए सुने हैं. मुझे पहले पहल तो लगा कि यह भजन है, जब रंगहीन प्रिंट में राजकपूर को बेलगाड़ी हांकते हुए देखा और गाना बजता है, सजनवा बैरी हो गए हमारे, कर्मवा बैरी हो गए हमारे, चिट्ठियां हो तो हर कोई बांचें, भाग्य न बांचें कोई . तब समझ में आया कि अरे यह तो फिल्मी गीत है, मैं तो उसे भगत की अरदास समझता था, कि हे भगवान रूपी सजन मुझसे रुठ गए हैं, चिट्ठी में भेजा गया संदेश तो सब ही समझ लेते हैं, वही किस्मत में लिखा हुआ कोई नहीं समझता. मैं इस लाइन को ताना समझता था, जो मीराबाई के काव्य की तरह एकदम सटीक बैठता था. वैसे यह गीत सही में क्या सोचकर लिखे जाते हैं, यह भी एक अजूबा ही है, चलिए मानते हैं, म्यूजिक डायरेक्टर की तय धुन पर फिल्म निर्देशक की बताइ सिचुएशन पर सिर्फ शब्द पिरोने का काम गीतकार करते हैं. यकायक मोती पिरोना सबसे बड़ी कला है, जो गीतकार अपने अनुभवों के सार को शब्द में ढाल कर करते हैं. इसीलिए किसी से रिश्ता खत्म करने के लिए साहिर लुधियानवी की इन लाइनों से बेहतर कुछ भी नहीं हो सकता है. वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे एक खुबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा. चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों. इन शब्दों से छुटकारा शब्द साहित्यिक जामा पहन लेता है. वैसे यह गीतकार कभी भी कुछ भी लिख सकते हैं, कारावास में आशिकी, समुद्र किनारे देशभक्ति पर लिखने की विचित्र कला इन्हीं में पाई जाती है. लता दीदी से ए मेरे वतन के लोगों गीत सुनकर बहुत सी आंखें नम हुई है, लेकिन जब मुझे पता चला कि कवि प्रदीप ने यह गीत मुंबई (तब बंबई) में समुद्र किनारे लिखा है, तो मैंरा इस लिखनची कौम से भरोसा ही उठ गया.
आखिर मैं इरशाद कामिल का एक किस्सा बताने लायक है. वह बताते हैं कि उन्हें एक दफा एयरपोर्ट पर एक महिला मिली जो उनके जब बी मेट में लिखे गीत को भगवान की प्रार्थना के लिए गाती थी. जबकि फिल्म में यह गीत इरशाद ने शाहिद कपूर के कैरेक्टर से गीत यानि करीना कपूर को याद करने के अल्फ़ाज़ में लिखा है. गीत के बोल थे. "तुमसे ही दिन होता है
सुरमई शाम आती तुमसे ही, तुमसे ही हरघड़ी सांस आती है ज़िंदगी कहलाती है तुमसे ही, तुमसे ही"
गाने का प्रसंग कोई भी हो, उसे किसी भी उद्देश्य से लिखा गया हो, वह अपनी टारगेट ऑडियंस पर असर तो करते ही हैं. जो गाने का मतलब नहीं समझ सकते हैं, वह अपनी तय फीलिंग के हिसाब से उसे अपना खुद का गाना मान लेता है.
![]() |
| गाने में फूल मूर्खता का भी रूपक है और सुंदरता का भी |
शैलेन्द्र के कई गीत मैंने मंदिर में भजन के तौर पर गाते हुए सुने हैं. मुझे पहले पहल तो लगा कि यह भजन है, जब रंगहीन प्रिंट में राजकपूर को बेलगाड़ी हांकते हुए देखा और गाना बजता है, सजनवा बैरी हो गए हमारे, कर्मवा बैरी हो गए हमारे, चिट्ठियां हो तो हर कोई बांचें, भाग्य न बांचें कोई . तब समझ में आया कि अरे यह तो फिल्मी गीत है, मैं तो उसे भगत की अरदास समझता था, कि हे भगवान रूपी सजन मुझसे रुठ गए हैं, चिट्ठी में भेजा गया संदेश तो सब ही समझ लेते हैं, वही किस्मत में लिखा हुआ कोई नहीं समझता. मैं इस लाइन को ताना समझता था, जो मीराबाई के काव्य की तरह एकदम सटीक बैठता था. वैसे यह गीत सही में क्या सोचकर लिखे जाते हैं, यह भी एक अजूबा ही है, चलिए मानते हैं, म्यूजिक डायरेक्टर की तय धुन पर फिल्म निर्देशक की बताइ सिचुएशन पर सिर्फ शब्द पिरोने का काम गीतकार करते हैं. यकायक मोती पिरोना सबसे बड़ी कला है, जो गीतकार अपने अनुभवों के सार को शब्द में ढाल कर करते हैं. इसीलिए किसी से रिश्ता खत्म करने के लिए साहिर लुधियानवी की इन लाइनों से बेहतर कुछ भी नहीं हो सकता है. वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे एक खुबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा. चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों. इन शब्दों से छुटकारा शब्द साहित्यिक जामा पहन लेता है. वैसे यह गीतकार कभी भी कुछ भी लिख सकते हैं, कारावास में आशिकी, समुद्र किनारे देशभक्ति पर लिखने की विचित्र कला इन्हीं में पाई जाती है. लता दीदी से ए मेरे वतन के लोगों गीत सुनकर बहुत सी आंखें नम हुई है, लेकिन जब मुझे पता चला कि कवि प्रदीप ने यह गीत मुंबई (तब बंबई) में समुद्र किनारे लिखा है, तो मैंरा इस लिखनची कौम से भरोसा ही उठ गया.
आखिर मैं इरशाद कामिल का एक किस्सा बताने लायक है. वह बताते हैं कि उन्हें एक दफा एयरपोर्ट पर एक महिला मिली जो उनके जब बी मेट में लिखे गीत को भगवान की प्रार्थना के लिए गाती थी. जबकि फिल्म में यह गीत इरशाद ने शाहिद कपूर के कैरेक्टर से गीत यानि करीना कपूर को याद करने के अल्फ़ाज़ में लिखा है. गीत के बोल थे. "तुमसे ही दिन होता है
सुरमई शाम आती तुमसे ही, तुमसे ही हरघड़ी सांस आती है ज़िंदगी कहलाती है तुमसे ही, तुमसे ही"

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें