सेक्स के लिए अलहदा च्वाइस से क्या आप अलग है?
क्या मेरा देश बदल रहा है? क्या वह किसी दूसरे व्यक्ति को इसलिए जज करना छोड़ चूका है क्योंकि उसकी सेक्स के लिए साथी की पसंद उससे अलहदा है. अंसर हां भी है और नही भी. इसी तरीके के जनमत को ही मिली जुली प्रतिक्रिया कहा जाता है. आजकल एक विज्ञापन टीवी स्क्रीन पर दिखता है, जिसमें करण जौहर एक सूप का प्रचार करते दिखते हैं. सभी जानते हैं करण जौहर साहब वह व्यक्ति हैं, जो हमारी ठेठ पुरुष की परिभाषा में फिट नहीं बैठते हैं, कई मर्तबा हमारे पास उन जैसे व्यक्तियों के लिए कोई ढंग का शब्द नहीं मिलता है, जो शब्द समाज में प्रचलन में है, उन्हें अपशब्द ही कहा जा सकता है. वैसे एलजीबीटीक्यू समुदाय का कहकर हम उस घटिया शब्दावली से बच जाते हैं. उस विज्ञापन में महिला की जगह करण को रखकर कई रुढ़ि तुटती सी दिखती है. जो हमारे माथे में जमी हुई है.
खैर
सिनेमा के सौ वर्ष पुरे होने पर एक फिल्म बनी थी बांबे टॉकीज उसमें चार निर्देशकों ने अपने हिस्से की चार कहानियां बनाई थी. उस फिल्म में करण जौहर ने जिस कहानी को उठाया था वह इस समुदाय की वास्तविक पीड़ा थी, जहां एक नौजवान घर छोड़ने से पहले अपने बाप को कहता है, " मैं छक्का नहीं हूं , गे हूं हे"। उसके बाप की मार को वह दूसरे व्यक्ति के चांटे में भी महसूस करता है, जो दूसरा व्यक्ति खुद उसके जैसा ही होता है और समाज में होने वाली थू थू से बचने के लिए एक शादी में रहने का नाटक करता रहता है. कहानी अंत में एक लाइन के साथ खत्म होती है. झूठ बोलना पाप है, इसीलिए सच बोलना चाहिए. लेकिन यह सच क्या सचमुच में कोई व्यक्ति कबूल पाता होगा, मुझे इसका उत्तर एक बड़ी न में ही दिखता है.
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| फिल्म निर्माता करण जौहर |
खैर
सिनेमा के सौ वर्ष पुरे होने पर एक फिल्म बनी थी बांबे टॉकीज उसमें चार निर्देशकों ने अपने हिस्से की चार कहानियां बनाई थी. उस फिल्म में करण जौहर ने जिस कहानी को उठाया था वह इस समुदाय की वास्तविक पीड़ा थी, जहां एक नौजवान घर छोड़ने से पहले अपने बाप को कहता है, " मैं छक्का नहीं हूं , गे हूं हे"। उसके बाप की मार को वह दूसरे व्यक्ति के चांटे में भी महसूस करता है, जो दूसरा व्यक्ति खुद उसके जैसा ही होता है और समाज में होने वाली थू थू से बचने के लिए एक शादी में रहने का नाटक करता रहता है. कहानी अंत में एक लाइन के साथ खत्म होती है. झूठ बोलना पाप है, इसीलिए सच बोलना चाहिए. लेकिन यह सच क्या सचमुच में कोई व्यक्ति कबूल पाता होगा, मुझे इसका उत्तर एक बड़ी न में ही दिखता है.
एक अलीगढ़ फिल्म भी है, जो इस मुद्दे को बड़ी संवेदनाओं से छूती है, फिल्म में नायक को उसकी योग्यता के बावजूद इसीलिए नौकरी से निकाल दिया जाता है क्योंकि वह अपने जैसे आदमी के साथ हमबिस्तर अवस्था में पकड़ा जाता है. वह खूब सारी लानत झेलने के बाद आखिरकार केस तो जीत जाता है. फिर भी कोई हमसे अलग है उसके लिए विशेष शब्द बना है. फिर हम खुद से अलग व्यक्ति को अजीब क्यों कहने लगते हैं?
अभी कुंभ में किन्नरों का अलग से अखाड़ा बना, दो महाकुंभ में उन्होंने अपना पंडाल भी लगाया. उस अखाड़े के विरोध में शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के शब्द थे "किन्नर देवयोनी है लेकिन यह जो लोग अखाड़ा बनाएं हुए हैं यह मूलतः नपुंसक है." मैं धर्म को शंकराचार्य जितना नहीं समझ सकता लेकिन फिर भी उन्होंने कहा कि किन्नर देवयोनी है यानी वह देवताओं के बराबर है, फिर उनके लिए समाज में इतना भेदभाव क्यों दिखता है. हमे खजुराहो के मंदिर के बाहर ऐसी मूर्तियां दिखती है, जिन्हें हम उनकी बनावट से एलजीबीटी समुदाय की श्रेणी में ही रख सकते हैं. फिर वह अलग क्यों है? यह सवाल जब लोगों से पूछा जाता है तो कुछ लोगों का कहना होता है कि यह एक बीमारी है जो उनके दिमाग में बस गई है उनमें से अधिकतर का बचपन में कोई परिचित अप्राकृतिक यौन संबंध कर लेता है और यह उसको पसंद करने लगते हैं. आमिर खान के सत्यमेव जयते में दिखाया गया था कि बड़ी तादाद में छोटे बच्चों का यौन शोषण हमारे देश में होता है. जो भी हो पर इस विषय पर कम से कम बातचीत तो होनी चाहिए. न्यायालय ने 377 से इन्हें आजाद तो कर दिया है. क्या हम अपनी रुढियों से इन्हें बाहर कर पाएंगे.
नोट :- करण जौहर को अभी पद्मश्री मिला है, कुछ लोग सोशल मीडिया पर उसका विरोध करते हुए दिखे, उनके पास विरोध का तर्क तो नहीं दिखा लेकिन उनका पूर्वाग्रह वहीं था जो मैं पोस्ट में लिखना चाहता हूं.

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