तुम जेल गए थे?
तुम जेल गए थे? कोई सबूत है तुम्हारे पास, केंद्र सरकार से ताम्रपत्र तो मिला ही होगा, अच्छा बताओ किस आंदोलन में शामिल हुए थे? अरे तुम तो महिला हो, महिलाओं की जेल कहा होती थी आजादी के दिनों में, नहीं नहीं तुम छः महीने से कम समय जेल में बिताए हो हम तुम्हें स्वतंत्रता सेनानी नहीं मान सकते.
![]() |
| जेल का प्रतीकात्मक फोटो |
यह वह सवाल है, जिनका सामना हमारे देश के स्वतंत्रता सेनानी करते हैं, हमने इतिहास की किताब में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शब्द तो कई बार पढ़ा है, पर उसके मायने हमें आज तक नहीं पता है. स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को कई कैटेगरी में भारत सरकार ने बांट रखा है, मसलन आप भारत छोड़ो आंदोलन सरीखे आंदोलन में जेल में बंद हुए थे तो आप देश के स्वतंत्रता सेनानी है, यदि आप भोपाल की आजादी के लिए भोपाल की जेल में बंद हुए थे तो आप राज्य के सेनानी है. अगर इस परिभाषा को देखे तो चंद्रशेखर आजाद स्वतंत्रता सेनानी नहीं है क्योंकि वह असहयोग आंदोलन में बेत से पिटने की सजा छोड़कर कभी जेल में बंदी नहीं रहे है. केंद्र और राज्य के सेनानी में उतना ही अंतर है जितना मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के पद में अंतर होता है. सेनानी क्योंकि जेल में बंद रहे रणबांकुरों को ही माना जाता है, तो उसके लिए आपका नाम जिस जेल में कैदी के तौर पर आप रहे हैं, वहां के सजायाफ्ता कैदियों के रजिस्टर में दर्ज होना चाहिए, उसके लिए आपके पास जेल प्रमाण पत्र होना बहुत जरूरी है, बिना उसके आप सेनानी नहीं हो सकतें.
एक व्यक्ति थे आर वेंकटरमण वह भारत के आठवें राष्ट्रपति रहे हैं, वह भारत छोड़ो आंदोलन में सेंट्रल जेल वेलोर में बंदी रहे थे, पर वहां के रिकार्ड में उनका नाम दर्ज नहीं था, यही कारण है कि वह स्वतंत्रता सेनानी के तयशुदा मापदंड में फिट नहीं बैठते थे, वह राष्ट्रपति रहते हुए भी खुद को स्वतंत्रता सेनानी होने के लिए उस प्रमाणपत्र को प्राप्त ही नहीं कर पाएं. सोचिए जब राष्ट्रपति के लिए प्रमाणपत्र पाना इतना कठिन काम है तो आम व्यक्ति कितने जतन से खुद को सेनानी साबित कराता होगा.
हमारे शहर में एक दादा रहते हैं, वह भोपाल विलीनीकरण आंदोलन में शरीक हुए थे और कुछ महीने जेल में बंद रहे थे, लेकिन भोपाल जेल में उनके जेल में प्रवेश करने की तारीख ही दर्ज है बाहर आने की तारीख वहां नहीं लिखी गई है, इस एक गलती के कारण वह बुर्जुग स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को मिलने वाली सुविधाओं को सही ढंग से नहीं पा सकते है, वह अपने को सेनानी शब्द को साबित करने के लिए हाइकोर्ट तक का दरवाजा खटखटा चुका है पर उन्हें निराशा ही हाथ लगी है. स्वतंत्रता सेनानी कहलाने के लिए लोगों ने कितना संघर्ष किया है, कभी इस पर सरकार को एक शोध कराना चाहिए, जिनका घर संपत्ति और जवानी देश की आजादी के लिए कुर्बान चली गई, उनका बुढ़ापा अच्छे स्वास्थ्य और अंतिम समय में तिरंगे को सीने से लगाने की आस में बली चढ़ जाता है, पर हम यह नहीं समझ सकते, क्योंकि हमारे लिए स्वतंत्रता सेनानी होना सिर्फ एक शब्द है, इससे ज्यादा कुछ नहीं.

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें