मैं तुलसीदास हूं
मैं तुलसीदास हूं.
वह तुलसीदास जो अपनी पत्नी
से बेशुमार मोहब्बत करता था, उसे मिलने की चाह में मैं लाश को नाव समझकर नदी पार कर गया, जी हां मुझ पागल को सांप और रस्सी में अंतर समझ नहीं आया था, मैं तो बस अपनी प्रियसी का मुखड़ा देखना चाहता था. रात में जब मैं अपनी पत्नी के पास पहुंचा तो उसने कहा तुम मुझे जितना चाहते हो, अगर उतना भगवान को चाहोगे तो भगवान तुम्हें मिल जाएंगे. मैं क्या करता? मैं तो बस अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता था, उसकी कही बात को पूरा करने मैं निकल पड़ा. अब मुझे भगवान ढूंढना था, जो मुझे राम में मिले, मेरे श्री राम में मिले. वैसे मुझे रामजी से उनके भक्त हनुमान जी ने मिलवाया था और हनुमान जी का पता एक प्रेत ने दिया था, वैसे मैं ही वह तुलसी हूं जिसने हनुमान चालीसा में लिखा था, भूत पिसाच निकट नहिं आवै महावीर जब नाम सुनावे. वही इन्हीं की बिरादरी के प्रेत ने मुझे बजरंग बली से मिलवाया था.
मैं संस्कृत में लिखी रामायण को अवधी में लिखने का काम शुरू कर चुका था, मुझे शिव सती से शुरू हुई रामचरितमानस को लिखते- लिखते ऐसा लगा जैसे प्रभु मेरी आंखों के सामने ही सारी लीलाएं कर रहे हैं. मैं उन- उन जगह पर कभी अपने शरीर से जा ही न पाया, जहां मेरा मन प्रभु राम को ढूंढने जा चुका था. मैं प्रभु की नगरी अयोध्या में जब पहुंचा तो मुझे वहां से दुत्कार कर भगाया गया, मैं उन प्रभु पर मालिकाना हक रखने वाले लोगों को क्या बताता कि मेरे मन में तो सिर्फ हरि और हरि ही बसते हैं. वह हरि जिनकी मनसबदारी मेरे हाथ में थी. जिसके बलबूते मैंने अपने सखा रहीम के मनसबदार बनने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया. कई बार सोचता हूं, इतनी हिम्मत मुझमें तब कहां से आई थी? वह हिम्मत तो उस हरि की कृपा थी. जिसे मैंने अपने अंतिम दिनों में दुत्कारा था. वैसे जब मुझे अयोध्या से प्रभु के मालिकों ने भगाया था, तब मैंने कहा था. तुलसी सरनाम, गुलाम है रामको, जाको चाहे सो कहे वोहू.
मांग के खायिबो, महजिद में रहिबो, लेबै को एक न देबै को दोउ.
अब मैं उन लोगों को कैसे समझाता मेरा राम तो उस डूबते सुरज की लालिमा में भी है, उस सैया से बात करती औरत की आवाज में भी है. और उन धुत्त लोगों में भी है, जो मुझे पागल समझते हैं. बस अंतर इतना सा है. मैं खुद के अंदर के राम को जानता हूं. वही वह सिर्फ उस मंदिर में विराजित राम को ही जानते हैं. हे राम ! तुम मेरी कोढ़ी काया और टूटे हुए हाथ को सही नहीं कर सकते, तुम कितने निर्दयी हो. यह मेरी आखरी भावनाएं थी मेरे प्रभु के लिए. मैं क्या करूं अपने अंदर के राम से नाराजगी जाहिर करना मेरा हक है. एक बात ओर बताऊं, जब मैंने यह शरीर छोड़ा और मुझे मेरे प्रभु दिखे तब उन्होंने एक बात कहीं थी. तुलसी तुम जैसा दूसरा अब कोई इस धरती पर नहीं जन्मेगा.
वह तुलसीदास जो अपनी पत्नी
से बेशुमार मोहब्बत करता था, उसे मिलने की चाह में मैं लाश को नाव समझकर नदी पार कर गया, जी हां मुझ पागल को सांप और रस्सी में अंतर समझ नहीं आया था, मैं तो बस अपनी प्रियसी का मुखड़ा देखना चाहता था. रात में जब मैं अपनी पत्नी के पास पहुंचा तो उसने कहा तुम मुझे जितना चाहते हो, अगर उतना भगवान को चाहोगे तो भगवान तुम्हें मिल जाएंगे. मैं क्या करता? मैं तो बस अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता था, उसकी कही बात को पूरा करने मैं निकल पड़ा. अब मुझे भगवान ढूंढना था, जो मुझे राम में मिले, मेरे श्री राम में मिले. वैसे मुझे रामजी से उनके भक्त हनुमान जी ने मिलवाया था और हनुमान जी का पता एक प्रेत ने दिया था, वैसे मैं ही वह तुलसी हूं जिसने हनुमान चालीसा में लिखा था, भूत पिसाच निकट नहिं आवै महावीर जब नाम सुनावे. वही इन्हीं की बिरादरी के प्रेत ने मुझे बजरंग बली से मिलवाया था.
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| तुलसी |
मैं संस्कृत में लिखी रामायण को अवधी में लिखने का काम शुरू कर चुका था, मुझे शिव सती से शुरू हुई रामचरितमानस को लिखते- लिखते ऐसा लगा जैसे प्रभु मेरी आंखों के सामने ही सारी लीलाएं कर रहे हैं. मैं उन- उन जगह पर कभी अपने शरीर से जा ही न पाया, जहां मेरा मन प्रभु राम को ढूंढने जा चुका था. मैं प्रभु की नगरी अयोध्या में जब पहुंचा तो मुझे वहां से दुत्कार कर भगाया गया, मैं उन प्रभु पर मालिकाना हक रखने वाले लोगों को क्या बताता कि मेरे मन में तो सिर्फ हरि और हरि ही बसते हैं. वह हरि जिनकी मनसबदारी मेरे हाथ में थी. जिसके बलबूते मैंने अपने सखा रहीम के मनसबदार बनने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया. कई बार सोचता हूं, इतनी हिम्मत मुझमें तब कहां से आई थी? वह हिम्मत तो उस हरि की कृपा थी. जिसे मैंने अपने अंतिम दिनों में दुत्कारा था. वैसे जब मुझे अयोध्या से प्रभु के मालिकों ने भगाया था, तब मैंने कहा था. तुलसी सरनाम, गुलाम है रामको, जाको चाहे सो कहे वोहू.
मांग के खायिबो, महजिद में रहिबो, लेबै को एक न देबै को दोउ.
अब मैं उन लोगों को कैसे समझाता मेरा राम तो उस डूबते सुरज की लालिमा में भी है, उस सैया से बात करती औरत की आवाज में भी है. और उन धुत्त लोगों में भी है, जो मुझे पागल समझते हैं. बस अंतर इतना सा है. मैं खुद के अंदर के राम को जानता हूं. वही वह सिर्फ उस मंदिर में विराजित राम को ही जानते हैं. हे राम ! तुम मेरी कोढ़ी काया और टूटे हुए हाथ को सही नहीं कर सकते, तुम कितने निर्दयी हो. यह मेरी आखरी भावनाएं थी मेरे प्रभु के लिए. मैं क्या करूं अपने अंदर के राम से नाराजगी जाहिर करना मेरा हक है. एक बात ओर बताऊं, जब मैंने यह शरीर छोड़ा और मुझे मेरे प्रभु दिखे तब उन्होंने एक बात कहीं थी. तुलसी तुम जैसा दूसरा अब कोई इस धरती पर नहीं जन्मेगा.

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