कॉपीराइट एक्ट 1957
कॉपीराइट एक्ट 1957 : परिचय
“वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।“ कितनी बेहतरीन लाइन है। पढ़ने वाले के सीधे दिल में घर कर जाती है। यह तो मरुहम शायर साहिर लुधियानवी ने लिखी है, जिसे फिल्म गुमराह के लिए फिल्माया गया हैं। सोचिए कोई बेनाम शायर इस गाने को अपनी रचना बता दे और इसको किसी ओर फिल्म के लिए बेंच देता तो साहिर लुधियानवी साहब क्या करते उनके पास रास्ता ही क्या था? अपनी रचना को अपनी खुद की रचना बताने का। इस भ्रमजाल वाले हालत से बचने के लिए जिस एक रास्ते को सरकार ने बनाया है, उस कानून का नाम है, भारतीय कॉपीराइट एक्ट जो 1957 में बना था। यह कानून उन सभी चोरों पर नकेल कसने की कोशिश करता है, जो दूसरों की कला को खुद की मेहनत बताकर मुनाफा कमाते है। किसी ने फिल्म बनाई, किसी ने कंप्यूटर प्रोग्राम तैयार किए। प्रत्येक व्यक्ति अपनी इन विधाओं को अक्षुण्ण रखना चाहता है। कोई और उसके कार्य की नकल करे, वह ऐसा नहीं चाहता। यह खासियत उसका विशेषाधिकार बन जाता है। कानून द्वारा इन अधिकारों की रक्षा की गई है। यह कानून कॉपीराइट कानून कहा जाता है। इस अधिनियम का मूल उद्देश्य कॉपीराइट के मूल स्वामी की बेईमानी से की जाने वाली नकल से रक्षा करना। अवैध लाभ प्राप्त करने की मंशा पर रोक लगाना है।
मानव का दिमाग विचारों का खजाना है। हर विचार एक अनुभव का सार सरीखा है। उन विचार रुपी समंदर में चुनिंदा विचार ही होते है, जो खोज का रुप ले पाते है। यही बात किसी को मिली जन्मजात या अपने अथक प्रयास अर्जित कला पर भी लागू होती है। जो कि उस व्यक्ति के लिए रोजी- रोटी का जरिया है। यह जीने-मरने तक के सवाल तक लोगों को प्रभावित करता है। लेकिन सोचिए किसी व्यक्ति के वर्षो बरस तक किये गये मेहनत के फल रुपी काम को कोई चोरी कर ले तो किसी व्यक्ति पर क्या गुजरेगी। वह अपनी मेहनत को किसी दूसरे व्यक्ति के नाम से बाजार में बिकता कैसे देख सकेगा। ऐसी स्थिति देश में न पैदा हो, इसीलिए सरकार ने कॉपीराइट एक्ट 1957 बनाया है। इस कानून के बनने के पहले और बाद में क्या हालत है। कलापक्ष इस कॉपीराइट शब्द से क्यों जुझता है। कुछ पुराने और कुछ तत्कालिक मामलों की पड़ताल करके हम इस विषय को समझने की कोशिश प्रस्तुत रिपोर्ट में करेंगे।
एस.आर. जयलक्ष्मी बनाम मेटा म्यूजिकल केस में मद्रास हाईकोर्ट द्वारा निर्धारित किया गया कि कॉपीराइट कानून का मूल उद्देश्य, व्यक्ति के कार्य, श्रम एवं कौशल की अन्य व्यक्ति नकल न कर पाए। नकल से रक्षा करना ही इसका मूल अभिप्राय है। एक अन्य फैसले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कॉपीराइट के अधिकारों का अन्य व्यक्तियों द्वारा अप्राधिकृत उपयोग किए जाने पर रोक तथा संरक्षण देना मूल कार्य है।
कानून के बाद यह हुआ
कॉपीराइट अधिनियम को सफलता से लागू करने हेतु कॉपीराइट बोर्ड एवं कॉपीराइट कार्यालय की स्थापना की गई है। कॉपीराइट कार्यालय, कॉपीराइट रजिस्ट्रार के प्रत्यक्ष नियंत्रण के अधीन रहता है तथा केंद्रीय सरकार के अधीक्षण और निदेशन के अधीन कार्य करता है। केंद्र सरकार कॉपीराइट्स का एक रजिस्ट्रार नियुक्त करती है और वह एक या अधिक कॉपीराइट्स के उप रजिस्ट्रार भी नियुक्त करती है। धारा 11 में एक कॉपीराइट बोर्ड के गठन के बारे में प्रावधान किया गया है। इसमें अध्यक्ष के पद पर एक ऐसा व्यक्ति आसीन होता है जो किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रह चुका हो या जिसमें हाईकोर्ट का न्यायाधीश होने की पात्रता हो।
अधिनियम की धारा 12 में कॉपीराइट बोर्ड की शक्तियों का उल्लेख किया गया है। कॉपीराइट बोर्ड सामान्यत: अधिनियम के तहत मामले की सुनवाई उसी क्षेत्र में करेगा जहां कार्यवाही की शुरुआत में संबंधित व्यक्ति स्वेच्छा से निवास करता है या कारोबार करता है। कॉपीराइट बोर्ड को सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 में विहित सिविल न्यायालय के समान शक्तियां प्राप्त होती हैं। जैसे समन करना, हाजिर कराना, शपथ पर उसकी परीक्षा करना। शपथ-पत्र पर साक्ष्य लेना, साक्षियों व दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना। कॉपीराइट बोर्ड का कोई भी सदस्य किसी ऐसे मामले की कार्यवाही में भाग नहीं लेगा, जिसमें उसका स्वयं का हित निहित हो। पीठासीन अधिकारी के निर्देशों का पालन नहीं करने पर लोकसेवक की अवमानना के दोषी को दंडित करने का प्रावधान भी किया गया है। कॉपीराइट के स्वामी चाहें, तो कॉपीराइट सोसायटी भी बना सकते हैं। जिसमें कम से कम सात सदस्य हों।
यहां होती है शिकायत
कॉपीराइट उल्लंघन क्या है, यह सवाल अक्सर पूछा जाता है। बिना अनुमति किसी और के स्वामित्व वाली कृति को प्रकाशित करना, उसका लाभ उठाना। सार्वजनिक स्थानों पर इसे दिखाना आदि। कॉपीराइट के उल्लंघन होने पर नजदीक के थाने में एफआईआर लिखाई जा सकती है और जांच में रजिस्ट्रार कॉपीराइट पूरा सहयोग करता है। धारा 63 के अनुसार कॉपीराइट के जानबूझकर उल्लंघन के लिए दुष्प्रेरणा को दंडनीय अपराध घोषित किया गया है। इसके लिए दोषी को कम से कम 6 माह कारावास एवं 50 हजार रु. के जुर्माने से दंडित किया जा सकता है। अधिकतम तीन वर्ष की जेल और दो लाख रु. तक का जुर्माना हो सकता है। यदि कोई बार-बार ऐसा करता है तो सजा व जुर्माना बढ़ सकता है।
कॉपीराइट के मायने
• किसी भी कंटेंट का कमर्शल इस्तेमाल बिना कॉपीराइट होल्डर के इजाजत के नहीं हो सकता। निजी इस्तेमाल के लिए इजाजत की जररूत नहीं है। मसलन अगर कोई शख्स किताब ज्ञान के लिए पढ़ता या पढ़ाता है या फिर किसी गाने से रियाज करता है तो वह सही है। अगर किसी लेखन, शायरी या कविता के कुछ अंश समीक्षा के उद्देश्य से या रिपोर्ट या लेख को समझाने के लिए इस्तेमाल होता है तो यह फेयर डिलिंग यानी निष्पक्ष व्यवहार के दायरे में कवर होगा। कॉपीराइट एक्ट की धारा-52 के तहत किसी भी कंटेंट का प्राइवेट इस्तेमाल के लिए उपयोग किया जाना कॉपीराइट का उल्लंघन नहीं है।
• कोई भी कंटेंट जिसका कोई शख्स अगर प्राइवेट इस्तेमाल करता है तो वह कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन नहीं माना जाएगा। लेकिन इसका सार्वजनिक प्रसार नहीं किया जा सकता। अगर कोई शख्स पब्लिक डोमेन में नेट आदि पर पड़े फोटोग्राफ या कोई अन्य कंटेंट का इस्तेमाल करना चाहता है तो लेखक या ओरिजिनटेर से इसके लिए इजाजत लेनी होगी और इसके लिए उसे रॉयल्टी पेमेंट करना होगा। कॉपीराइट ओनर की इजाजत हो तो फोटोग्राफ आदि के लिए उन्हें क्रेडिट देना होगा।
• कोई भी ऐसे कंटेंट, जो पब्लिक डोमेन में हों या फिर नेट आदि पर हों या लेखन आदि के रूप में हों, उसका पब्लिक में प्रसार नहीं किया जा सकता। या फिर बिना इजाजत के कमर्शल उद्देश्य के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। बिना कॉपीराइट होल्डर की इजाजत के कोई भी सामग्री इस्तेमाल नहीं हो सकती। हां, ऐसा इस्तेमाल जो निष्पक्ष व्यवहार के दायरे में हो, वह हो सकता है।
• आमतौर पर ऑरिजिनेटर यानी लेखक व प्रदाता का अधिकार उसके मरने के 60 साल तक अपनी कृति पर कॉपीराइट का लीगल अधिकार होता है। इसके बाद नहीं।
सजा और मुआवजा
कॉपीराइट एक्ट के उल्लंघन के लिए दोषी पाए जाने पर एक साल तक की सजा का प्रावधान है। इसके लिए सिविल अपराध का प्रावधान है। कॉपीराइट के उल्लंघन के मामले में डैमेज क्लेम किया जा सकता है। किसी ने कॉपीराइट के उल्लंघन कर जितना प्रॉफिट कमाया है, उस हिसाब से डैमेज क्लेम किया जा सकता है।
2012 में हुआ कानून में संशोधन
लोकसभा ने इस कानून को मई 2012 के पहले सप्ताह में कापीराइट एक्ट (संशोधन) विधेयक 2012 को मंजूरी दे दी, जिसे राज्यसभा 17 मई को ही पारित कर चुका है। एक्ट में लेखकों की उनकी कृतियों पर अधिकार जताने के विशेष प्रावधान हैं। गीतकार म्यूजिक कंपनियों के साथ रायल्टी पर सौदेबाजी कर सकेंगे। विधेयक किसी भी साहित्य, नाटक या संगीत संबंधी कृति की मूल रिकॉर्डिग के बाद पांच साल तक उसका कवर वर्जन लाने पर पाबंदी लगाता है।
छात्रों को शोध कार्यो के लिए कॉपीराइट एक्ट से छूट है पर पायरेसी करने वालों के लिए जुर्माने के साथ ही दो वर्ष जेल का प्रावधान है।
केस स्टडी
इलैया राजा ने गायक को ही गाना गाने से रोका
इलैया राजा ने बालासुब्रमणयम को नोटिस भेजते हुए कहा था कि उनके कंपोज किए गए गाने गा कर बालासुब्रमण्यम कॉपीराइट लॉ का उल्लंघन कर रहे हैं। इस बात का खुलासा बालासुब्रमण्यम ने अपने फेसबुक पर किया। उन्होंने लिखा, 'कुछ दिन पहले मेरे और शो के आयोजकों पास इलैया राजा द्वारा भेजा नोटिस आया। इसमें उन्होंने कहा है कि हम उनके द्वारा कंपोज किए गाने नहीं गा सकते हैं। अगर हमने ऐसा किया तो यह कानून का उल्लंघन होगा और इसके लिए हमें जुर्माना देना होगा। इसलिए मैंने तय किया है कि अब मैं उनके कंपोज किए गाने नहीं गाउंगा। भगवान की दुआ से मैंने और भी कंपोजर्स के साथ काम किया है जो मैं गा सकता हूं।'
जब देश के पूर्व राष्ट्रपति पर चोरी का आरोप लगा
1920 के दशक में कोलकाता (जो तब कलकत्ता था) में ‘मॉडर्न रिव्यू’ नामक एक मासिक पत्रिका प्रकाशित होती थी। जनवरी 1929 के उसके प्रकाशन में जदुनाथ सिन्हा नाम के एक छात्र ने सनसनीख़ेज़ दावा किया। उन्होंने लिखा कि सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने ‘साहित्यिक चोरी’ करते हुए उनकी थीसिस के प्रमुख हिस्से अपने बताकर प्रकाशित करवा लिए. उन्होंने आरोप लगाया कि राधाकृष्णन की किताब ‘भारतीय दर्शन - 2’ में उनकी थीसिस का इस्तेमाल किया गया है. फिर फ़रवरी, मार्च और अप्रैल के संस्करण में जदुनाथ ने अपने दावे के समर्थन में कई साक्ष्य पेश किए जिससे यह विवाद ज़्यादा बढ़ गया।
उधर, राधाकृष्णन ने जदुनाथ के दावों पर जवाबी पत्र लिखते हुए कहा कि चूंकि उनकी किताब और जदुनाथ की थीसिस का विषय एक ही था, इसलिए इत्तेफ़ाक़न दोनों की विषय सामग्री मिलती जुलती है. उनके ये जवाब पत्रिका के फ़रवरी और मार्च के संस्करण में प्रकाशित हुए थे। फिर अगस्त 1929 में जदुनाथ ने राधाकृष्णन पर केस कर दिया। जवाब में राधाकृष्णन ने जदुनाथ और पत्रिका के संपादक रामनाथ चट्टोपाध्याय दोनों के ख़िलाफ़ केस दर्ज करा दिया। बाद में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कोर्ट के बाहर दोनों पक्षों का समझौता कराया।
जब एक शब्द के लिए कोर्ट में लड़ी दो लेखिकाये
ज्ञानपीठ से सम्मानित लेखिका कृष्णा सोबती ने अमृता प्रीतम पर उनकी कृति हरदत्त का जिंदगीनामा को लेकर केस किया था। वह मामला करीब पच्चीस साल तक चला था और फैसला अमृता प्रीतम के पक्ष में आया था। दरअसल अमृता प्रीतम की किताब हरदत्त का जिंदगीनामा, जब छपी तो कृष्णा जी को लगा कि ये शीर्षक उनके चर्चित उपन्यास जिंदगीनामा से उड़ाया गया है और वह कोर्ट चली गईं। साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता कृष्णा सोबती और ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजी गई अमृता प्रीतम के बीच इस साहित्यिक विवाद की उस वक्त पूरे देश में खूब चर्चा हुई थी। जब केस का फैसला अमृता जी के पक्ष में आया तब तक अमृता प्रीतम की मौत हो गई थी। केस के फैसले के बाद कृष्णा सोबती ने बौद्धिक संपदा का तर्क देते हुए कहा था कि हार जीत से ज्यादा जरूरी उनके लिए अपनी बौद्धिक संपदा की रक्षा के लिए संघर्ष करना था। तब उस वक्त भी कई लेखकों ने कृष्णा सोबती को याद दिलाया था कि जिंदगीनामा का पहली बार प्रयोग उन्होंने नहीं किया था। कृष्णा सोबती के उपन्यास के पहले फारसी में लिखी दर्जनों किताबें इस शीर्षक के साथ मौजूद हैं। मशहूर लेखक खुशवंत सिंह ने तो उस वक्त भी कहा था कि गुरु गोविंद सिंह के एक शिष्य़ ने उनकी जीवनी भी जिंदगीनामा के नाम से लिखी थी और ये किताब कृष्णा सोबती के उपन्यास के काफी पहले प्रकाशित हो चुकी थी ।
जब कुमार विश्वास ने अमिताभ बच्चन को 30 रुपये देने की बात कहीं
कुमार विश्वास और अमिताभ बच्चन इन दोनों दिग्गजों के बीच कॉपीराइट के एक विवाद को लेकर ट्विटर पर तकरार हुई थी। तब अमिताभ बच्चन ने कुमार विश्वास को कानूनी नोटिस भेजा था, जिसके जवाब में कुमार विश्वास ने उन्हें 32 रुपये भिजवाये थे। दरअसल ये पूरा मामला इस तरह है। कवि कुमार विश्वास ने अमिताभ बच्चन के बाबू जी हरिवंश राय बच्चन की कविता ‘नीड़ का निर्माण’ को गाया था और उसे यूट्यूब पर अपलोड भी किया था। कुमार विश्वास यूट्यूब पर ‘तर्पण’ नाम के अकाउंट से अपना वीडियो शेयर करते हैं। उन्होंने 8 जुलाई को 2016 इस कविता को यू ट्यूब पर अपलोड किया था और कवि हरिवंश राय बच्चन को क्रेडिट दिया था।
जब फॉटोकॉपी की दुकान अंतरराष्ट्रीय प्रकाशकों ने लगाया कॉपीराइट
दिल्ली यूनिवर्सिटी के अंदर किताबों की फोटोकॉपी की बिक्री को रोकने के लिए तीन अंतरराष्ट्रीय प्रकाशकों ने डीयू की फोटोकॉपी शॉप के खिलाफ केस किया था। जिसे दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले को खारिज कर दिया। अंतरराष्ट्रीय प्रकाशकों ने आरोप लगाया था कि कियोस्क ने उनके कॉपीराइट का उल्लंघन किया है और दिल्ली विश्वविद्यालय के कहने पर उन्हें भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ रहा है क्योंकि छात्रों ने अब उनकी किताबें खरीदनी बंद कर दी हैं। लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय ने फोटोकॉपी करने वालों का समर्थन करते हुए कहा कि छात्रों द्वारा कॉपीराइट पुस्तकों की फोटोकॉपी का उपयोग करना तार्किक शैक्षिक आवश्यकता है और इसे उल्लंघन के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। इस मामले में छात्र भी कियोस्क के समर्थन में खडे़ दिखे क्योंकि कुछ किताबें काफी महंगी थी।
साथ काम करने को तैयार नहीं है।
जब गुलजार के गाने को कविता से प्रेरित बताया
फिल्म इश्किया का गाना इब्नेबतूता दर्शकों को काफी पसंद आ रहा है, लेकिन गीतकार गुलजार के इस गीत पर कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के परिवारवाले काफी दुखी हैं क्योंकि उनकी कविता से प्रेरित होकर लिखे गये इस गाने में कहीं भी इस दिवंगत कवि को श्रेय नहीं दिया गया है। अपनी गजलों से लोगों को मंत्रमुग्ध करने वाले गुलजार ने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता पर इस गाने के बोल लिखे हैं। सक्सेना ने मोरक्को के विद्वान इब्ने बतूता के घुम्मकड़ रवैये को दर्शाने के लिये एक कविता लिखी थी। लेकिन फिल्म में कहीं भी इस कवि को श्रेय नहीं दिया गया।सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की बेटी विभा सक्सेना ने कहा, जी हां, मेरे पिताजी ने इब्ने बतूता पर कविता लिखी थी, लेकिन गुलजार साहब ने इसमें थोड़े बदलाव करते हुए यह गाना लिखा है। हमें दुख इस बात का है कि कहीं भी उन्हें श्रेय नहीं दिया गया या ऐसा नहीं बताया गया कि यह गाना सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता इब्ने बतूता से प्रेरित है। उन्होंने कहा कि गुलजार साहब खुद एक कवि हैं और अगर वह गाने की पंक्तियां कहीं से उतारते हैं तो उसे हमेशा श्रेय देते हैं। उनकी गरिमा इसी में होगी कि वे मेरे पिताजी को श्रेय दें क्योंकि मेरे पिताजी अब इस दुनिया में नहीं हैं।
छपाक फिल्म पर जब मंडराये कॉपीराइट के बादल
दीपिका पादुकोण और विक्रांत मेसी स्टारर फ़िल्म 'छपाक' को लेकर नया मोड़ आया है। कॉपीराइट को लेकर डायरेक्टर मेघना गुलज़ार ने बॉम्बे हाईकोर्ट के सामने अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि किसी भी सच्ची घटना पर कॉपीराइट का दावा नहीं किया जा सकता है। मेघना ने यह बात उस केस में रखा, जिसमें एक लेखक ने दावा किया है कि आने वाली फ़िल्म 'छपाक' सच्ची घटना पर उसकी लिखी हुई कहानी पर आधारित है।न्यूज़ एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, गुलज़ार ने एक हलफनामा दिया। उन्होंने लेखक राकेश भारती द्वारा दायर केस में यह एफिडेविट दिया। भारती ने केस दायर कर फ़िल्म में बतौर लेखक क्रेडिट की मांग की है। इस हलफनामे को नाइक एंड नाइक कंपनी के वकील अमित नाईक और मधु गादोडिया ने दाखिल किया। उन्होंने मुकदमे को लेकर कहा, 'यह पूरी तरह से गलत और कानूनी रूप से अस्थिर है।' वहीं, दायर हलफनामे में कहा गया है कि दायर मुकदमा किसी भी तरीके से कॉपीराइट का मामला बनाने में असफल है। जो जानकारी पब्लिक डोमेन में मौजूद है, वह कॉफीराइट के अंदर नहीं आता है। हलफनामे में डायरेक्टर मेघना गुलज़ार ने कहा है, 'वर्तमान केस में वादी(भारती) द्वारा एसिड एटैक पीड़िता लक्ष्मी अग्रवाल की स्टोरी पर संरक्षण की मांग की गई है। किसी भी सच्ची घटनाओं या इवेंट पर कॉपीराइट का दावा नहीं किया जा सकता है।' बता दें कि लेखक भारती ने केस दायर कर दावा किया है, इस पर आधारित एक 'ब्लैक डे' नाम से एक स्क्रिप्ट लगभग लिखी जा चुकी है। इसका रजिस्ट्रेशन फरवरी 2015 में इंडियन मोशन पिक्चर प्रोड्यूसर एसोसिएशन (IMPPA) में कराया गया है। भारती ने कहा कि तब से वह काम कर रह हैं। वह स्क्रिप्ट लेकर कई कलाकारों और निर्माताओं से संपर्क भी किया है।'
पानीपत फिल्म पर उपान्यासकार ने लगाया था आरोप
मराठी उपन्यासकार विश्वास पाटिल ने कहा, अगर उन्हें ग़लत साबित कर दिया गया, तो वह पानीपत के मेकर्स से सार्वजनिक रूप से मांफी मांगेंगे। हाल ही में प्लॉट चुराने को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट में एक केस भी दायर किया है। इसको लेकर पाटिल ने कहा, 'जिस वक्त मैंने ट्रेलर देखा, तभी मुझे विश्वास हो गया था कि उन्होंने (फ़िल्ममेकर्स) मेरी किताब की आत्मा को चुराया है। इसके बाद कोर्ट जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।' न्यूज़ एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए पाटिल ने कहा, 'मैंने उन्हें स्क्रिप्ट और फ़िल्म दोनों दिखाने के लिए कहा है। अगर मैं ग़लत हुआ और उन्होंने मेरा प्लॉट नहीं चुराया, तो मैं सार्वजनिक रूप से माफ़ी मागूंगा। नहीं तो, उन्हें मुआवजा देना होगा।' बता दें कि यह नॉवेल का 43वां एडिशन है। किताब की मराठी कॉपी की 2 लाख से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं। हाल ही वेस्टलैंड प्रकाशन ने इसकी अंग्रेजी में ट्रांस्लेटेड प्रति भी छापी है। वहीं, लेखक इस पर आधारित 'रणांगन' नाम से नाटक भी लिख रहे हैं। बता दें कि अशुतोष गोवारिकर की फ़िल्म 'पानीपत' और 'नॉवेल' दोनों ही पानीपत के तीसरे युद्ध पर आधारित हैं। इस युद्ध में मराठाओं के सामने अफ़गानी सेना खड़ी थी। यह युद्ध 14 जनवरी, 1761 को लड़ा गया था। 60 वर्षीय लेखक पाटिल का कहना है कि युद्ध की कहानी पब्लिक डोमेन में है। ऐसे में इस पर किसी व्यक्ति विशेष का कॉपीराइट नहीं है। लेकिन उनका दावा है कि उनकी किताब में कहानी को कई नए आयाम और रंग दिए गए। यही आयाम और रंग फ़िल्ममेकर्स ने चुराये हैं।
“वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।“ कितनी बेहतरीन लाइन है। पढ़ने वाले के सीधे दिल में घर कर जाती है। यह तो मरुहम शायर साहिर लुधियानवी ने लिखी है, जिसे फिल्म गुमराह के लिए फिल्माया गया हैं। सोचिए कोई बेनाम शायर इस गाने को अपनी रचना बता दे और इसको किसी ओर फिल्म के लिए बेंच देता तो साहिर लुधियानवी साहब क्या करते उनके पास रास्ता ही क्या था? अपनी रचना को अपनी खुद की रचना बताने का। इस भ्रमजाल वाले हालत से बचने के लिए जिस एक रास्ते को सरकार ने बनाया है, उस कानून का नाम है, भारतीय कॉपीराइट एक्ट जो 1957 में बना था। यह कानून उन सभी चोरों पर नकेल कसने की कोशिश करता है, जो दूसरों की कला को खुद की मेहनत बताकर मुनाफा कमाते है। किसी ने फिल्म बनाई, किसी ने कंप्यूटर प्रोग्राम तैयार किए। प्रत्येक व्यक्ति अपनी इन विधाओं को अक्षुण्ण रखना चाहता है। कोई और उसके कार्य की नकल करे, वह ऐसा नहीं चाहता। यह खासियत उसका विशेषाधिकार बन जाता है। कानून द्वारा इन अधिकारों की रक्षा की गई है। यह कानून कॉपीराइट कानून कहा जाता है। इस अधिनियम का मूल उद्देश्य कॉपीराइट के मूल स्वामी की बेईमानी से की जाने वाली नकल से रक्षा करना। अवैध लाभ प्राप्त करने की मंशा पर रोक लगाना है।
मानव का दिमाग विचारों का खजाना है। हर विचार एक अनुभव का सार सरीखा है। उन विचार रुपी समंदर में चुनिंदा विचार ही होते है, जो खोज का रुप ले पाते है। यही बात किसी को मिली जन्मजात या अपने अथक प्रयास अर्जित कला पर भी लागू होती है। जो कि उस व्यक्ति के लिए रोजी- रोटी का जरिया है। यह जीने-मरने तक के सवाल तक लोगों को प्रभावित करता है। लेकिन सोचिए किसी व्यक्ति के वर्षो बरस तक किये गये मेहनत के फल रुपी काम को कोई चोरी कर ले तो किसी व्यक्ति पर क्या गुजरेगी। वह अपनी मेहनत को किसी दूसरे व्यक्ति के नाम से बाजार में बिकता कैसे देख सकेगा। ऐसी स्थिति देश में न पैदा हो, इसीलिए सरकार ने कॉपीराइट एक्ट 1957 बनाया है। इस कानून के बनने के पहले और बाद में क्या हालत है। कलापक्ष इस कॉपीराइट शब्द से क्यों जुझता है। कुछ पुराने और कुछ तत्कालिक मामलों की पड़ताल करके हम इस विषय को समझने की कोशिश प्रस्तुत रिपोर्ट में करेंगे।
एस.आर. जयलक्ष्मी बनाम मेटा म्यूजिकल केस में मद्रास हाईकोर्ट द्वारा निर्धारित किया गया कि कॉपीराइट कानून का मूल उद्देश्य, व्यक्ति के कार्य, श्रम एवं कौशल की अन्य व्यक्ति नकल न कर पाए। नकल से रक्षा करना ही इसका मूल अभिप्राय है। एक अन्य फैसले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कॉपीराइट के अधिकारों का अन्य व्यक्तियों द्वारा अप्राधिकृत उपयोग किए जाने पर रोक तथा संरक्षण देना मूल कार्य है।
कानून के बाद यह हुआ
कॉपीराइट अधिनियम को सफलता से लागू करने हेतु कॉपीराइट बोर्ड एवं कॉपीराइट कार्यालय की स्थापना की गई है। कॉपीराइट कार्यालय, कॉपीराइट रजिस्ट्रार के प्रत्यक्ष नियंत्रण के अधीन रहता है तथा केंद्रीय सरकार के अधीक्षण और निदेशन के अधीन कार्य करता है। केंद्र सरकार कॉपीराइट्स का एक रजिस्ट्रार नियुक्त करती है और वह एक या अधिक कॉपीराइट्स के उप रजिस्ट्रार भी नियुक्त करती है। धारा 11 में एक कॉपीराइट बोर्ड के गठन के बारे में प्रावधान किया गया है। इसमें अध्यक्ष के पद पर एक ऐसा व्यक्ति आसीन होता है जो किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रह चुका हो या जिसमें हाईकोर्ट का न्यायाधीश होने की पात्रता हो।
अधिनियम की धारा 12 में कॉपीराइट बोर्ड की शक्तियों का उल्लेख किया गया है। कॉपीराइट बोर्ड सामान्यत: अधिनियम के तहत मामले की सुनवाई उसी क्षेत्र में करेगा जहां कार्यवाही की शुरुआत में संबंधित व्यक्ति स्वेच्छा से निवास करता है या कारोबार करता है। कॉपीराइट बोर्ड को सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 में विहित सिविल न्यायालय के समान शक्तियां प्राप्त होती हैं। जैसे समन करना, हाजिर कराना, शपथ पर उसकी परीक्षा करना। शपथ-पत्र पर साक्ष्य लेना, साक्षियों व दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना। कॉपीराइट बोर्ड का कोई भी सदस्य किसी ऐसे मामले की कार्यवाही में भाग नहीं लेगा, जिसमें उसका स्वयं का हित निहित हो। पीठासीन अधिकारी के निर्देशों का पालन नहीं करने पर लोकसेवक की अवमानना के दोषी को दंडित करने का प्रावधान भी किया गया है। कॉपीराइट के स्वामी चाहें, तो कॉपीराइट सोसायटी भी बना सकते हैं। जिसमें कम से कम सात सदस्य हों।
यहां होती है शिकायत
कॉपीराइट उल्लंघन क्या है, यह सवाल अक्सर पूछा जाता है। बिना अनुमति किसी और के स्वामित्व वाली कृति को प्रकाशित करना, उसका लाभ उठाना। सार्वजनिक स्थानों पर इसे दिखाना आदि। कॉपीराइट के उल्लंघन होने पर नजदीक के थाने में एफआईआर लिखाई जा सकती है और जांच में रजिस्ट्रार कॉपीराइट पूरा सहयोग करता है। धारा 63 के अनुसार कॉपीराइट के जानबूझकर उल्लंघन के लिए दुष्प्रेरणा को दंडनीय अपराध घोषित किया गया है। इसके लिए दोषी को कम से कम 6 माह कारावास एवं 50 हजार रु. के जुर्माने से दंडित किया जा सकता है। अधिकतम तीन वर्ष की जेल और दो लाख रु. तक का जुर्माना हो सकता है। यदि कोई बार-बार ऐसा करता है तो सजा व जुर्माना बढ़ सकता है।
कॉपीराइट के मायने
• किसी भी कंटेंट का कमर्शल इस्तेमाल बिना कॉपीराइट होल्डर के इजाजत के नहीं हो सकता। निजी इस्तेमाल के लिए इजाजत की जररूत नहीं है। मसलन अगर कोई शख्स किताब ज्ञान के लिए पढ़ता या पढ़ाता है या फिर किसी गाने से रियाज करता है तो वह सही है। अगर किसी लेखन, शायरी या कविता के कुछ अंश समीक्षा के उद्देश्य से या रिपोर्ट या लेख को समझाने के लिए इस्तेमाल होता है तो यह फेयर डिलिंग यानी निष्पक्ष व्यवहार के दायरे में कवर होगा। कॉपीराइट एक्ट की धारा-52 के तहत किसी भी कंटेंट का प्राइवेट इस्तेमाल के लिए उपयोग किया जाना कॉपीराइट का उल्लंघन नहीं है।
• कोई भी कंटेंट जिसका कोई शख्स अगर प्राइवेट इस्तेमाल करता है तो वह कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन नहीं माना जाएगा। लेकिन इसका सार्वजनिक प्रसार नहीं किया जा सकता। अगर कोई शख्स पब्लिक डोमेन में नेट आदि पर पड़े फोटोग्राफ या कोई अन्य कंटेंट का इस्तेमाल करना चाहता है तो लेखक या ओरिजिनटेर से इसके लिए इजाजत लेनी होगी और इसके लिए उसे रॉयल्टी पेमेंट करना होगा। कॉपीराइट ओनर की इजाजत हो तो फोटोग्राफ आदि के लिए उन्हें क्रेडिट देना होगा।
• कोई भी ऐसे कंटेंट, जो पब्लिक डोमेन में हों या फिर नेट आदि पर हों या लेखन आदि के रूप में हों, उसका पब्लिक में प्रसार नहीं किया जा सकता। या फिर बिना इजाजत के कमर्शल उद्देश्य के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। बिना कॉपीराइट होल्डर की इजाजत के कोई भी सामग्री इस्तेमाल नहीं हो सकती। हां, ऐसा इस्तेमाल जो निष्पक्ष व्यवहार के दायरे में हो, वह हो सकता है।
• आमतौर पर ऑरिजिनेटर यानी लेखक व प्रदाता का अधिकार उसके मरने के 60 साल तक अपनी कृति पर कॉपीराइट का लीगल अधिकार होता है। इसके बाद नहीं।
सजा और मुआवजा
कॉपीराइट एक्ट के उल्लंघन के लिए दोषी पाए जाने पर एक साल तक की सजा का प्रावधान है। इसके लिए सिविल अपराध का प्रावधान है। कॉपीराइट के उल्लंघन के मामले में डैमेज क्लेम किया जा सकता है। किसी ने कॉपीराइट के उल्लंघन कर जितना प्रॉफिट कमाया है, उस हिसाब से डैमेज क्लेम किया जा सकता है।
2012 में हुआ कानून में संशोधन
लोकसभा ने इस कानून को मई 2012 के पहले सप्ताह में कापीराइट एक्ट (संशोधन) विधेयक 2012 को मंजूरी दे दी, जिसे राज्यसभा 17 मई को ही पारित कर चुका है। एक्ट में लेखकों की उनकी कृतियों पर अधिकार जताने के विशेष प्रावधान हैं। गीतकार म्यूजिक कंपनियों के साथ रायल्टी पर सौदेबाजी कर सकेंगे। विधेयक किसी भी साहित्य, नाटक या संगीत संबंधी कृति की मूल रिकॉर्डिग के बाद पांच साल तक उसका कवर वर्जन लाने पर पाबंदी लगाता है।
छात्रों को शोध कार्यो के लिए कॉपीराइट एक्ट से छूट है पर पायरेसी करने वालों के लिए जुर्माने के साथ ही दो वर्ष जेल का प्रावधान है।
केस स्टडी
इलैया राजा ने गायक को ही गाना गाने से रोका
इलैया राजा ने बालासुब्रमणयम को नोटिस भेजते हुए कहा था कि उनके कंपोज किए गए गाने गा कर बालासुब्रमण्यम कॉपीराइट लॉ का उल्लंघन कर रहे हैं। इस बात का खुलासा बालासुब्रमण्यम ने अपने फेसबुक पर किया। उन्होंने लिखा, 'कुछ दिन पहले मेरे और शो के आयोजकों पास इलैया राजा द्वारा भेजा नोटिस आया। इसमें उन्होंने कहा है कि हम उनके द्वारा कंपोज किए गाने नहीं गा सकते हैं। अगर हमने ऐसा किया तो यह कानून का उल्लंघन होगा और इसके लिए हमें जुर्माना देना होगा। इसलिए मैंने तय किया है कि अब मैं उनके कंपोज किए गाने नहीं गाउंगा। भगवान की दुआ से मैंने और भी कंपोजर्स के साथ काम किया है जो मैं गा सकता हूं।'
जब देश के पूर्व राष्ट्रपति पर चोरी का आरोप लगा
1920 के दशक में कोलकाता (जो तब कलकत्ता था) में ‘मॉडर्न रिव्यू’ नामक एक मासिक पत्रिका प्रकाशित होती थी। जनवरी 1929 के उसके प्रकाशन में जदुनाथ सिन्हा नाम के एक छात्र ने सनसनीख़ेज़ दावा किया। उन्होंने लिखा कि सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने ‘साहित्यिक चोरी’ करते हुए उनकी थीसिस के प्रमुख हिस्से अपने बताकर प्रकाशित करवा लिए. उन्होंने आरोप लगाया कि राधाकृष्णन की किताब ‘भारतीय दर्शन - 2’ में उनकी थीसिस का इस्तेमाल किया गया है. फिर फ़रवरी, मार्च और अप्रैल के संस्करण में जदुनाथ ने अपने दावे के समर्थन में कई साक्ष्य पेश किए जिससे यह विवाद ज़्यादा बढ़ गया।
उधर, राधाकृष्णन ने जदुनाथ के दावों पर जवाबी पत्र लिखते हुए कहा कि चूंकि उनकी किताब और जदुनाथ की थीसिस का विषय एक ही था, इसलिए इत्तेफ़ाक़न दोनों की विषय सामग्री मिलती जुलती है. उनके ये जवाब पत्रिका के फ़रवरी और मार्च के संस्करण में प्रकाशित हुए थे। फिर अगस्त 1929 में जदुनाथ ने राधाकृष्णन पर केस कर दिया। जवाब में राधाकृष्णन ने जदुनाथ और पत्रिका के संपादक रामनाथ चट्टोपाध्याय दोनों के ख़िलाफ़ केस दर्ज करा दिया। बाद में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कोर्ट के बाहर दोनों पक्षों का समझौता कराया।
जब एक शब्द के लिए कोर्ट में लड़ी दो लेखिकाये
ज्ञानपीठ से सम्मानित लेखिका कृष्णा सोबती ने अमृता प्रीतम पर उनकी कृति हरदत्त का जिंदगीनामा को लेकर केस किया था। वह मामला करीब पच्चीस साल तक चला था और फैसला अमृता प्रीतम के पक्ष में आया था। दरअसल अमृता प्रीतम की किताब हरदत्त का जिंदगीनामा, जब छपी तो कृष्णा जी को लगा कि ये शीर्षक उनके चर्चित उपन्यास जिंदगीनामा से उड़ाया गया है और वह कोर्ट चली गईं। साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता कृष्णा सोबती और ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजी गई अमृता प्रीतम के बीच इस साहित्यिक विवाद की उस वक्त पूरे देश में खूब चर्चा हुई थी। जब केस का फैसला अमृता जी के पक्ष में आया तब तक अमृता प्रीतम की मौत हो गई थी। केस के फैसले के बाद कृष्णा सोबती ने बौद्धिक संपदा का तर्क देते हुए कहा था कि हार जीत से ज्यादा जरूरी उनके लिए अपनी बौद्धिक संपदा की रक्षा के लिए संघर्ष करना था। तब उस वक्त भी कई लेखकों ने कृष्णा सोबती को याद दिलाया था कि जिंदगीनामा का पहली बार प्रयोग उन्होंने नहीं किया था। कृष्णा सोबती के उपन्यास के पहले फारसी में लिखी दर्जनों किताबें इस शीर्षक के साथ मौजूद हैं। मशहूर लेखक खुशवंत सिंह ने तो उस वक्त भी कहा था कि गुरु गोविंद सिंह के एक शिष्य़ ने उनकी जीवनी भी जिंदगीनामा के नाम से लिखी थी और ये किताब कृष्णा सोबती के उपन्यास के काफी पहले प्रकाशित हो चुकी थी ।
जब कुमार विश्वास ने अमिताभ बच्चन को 30 रुपये देने की बात कहीं
कुमार विश्वास और अमिताभ बच्चन इन दोनों दिग्गजों के बीच कॉपीराइट के एक विवाद को लेकर ट्विटर पर तकरार हुई थी। तब अमिताभ बच्चन ने कुमार विश्वास को कानूनी नोटिस भेजा था, जिसके जवाब में कुमार विश्वास ने उन्हें 32 रुपये भिजवाये थे। दरअसल ये पूरा मामला इस तरह है। कवि कुमार विश्वास ने अमिताभ बच्चन के बाबू जी हरिवंश राय बच्चन की कविता ‘नीड़ का निर्माण’ को गाया था और उसे यूट्यूब पर अपलोड भी किया था। कुमार विश्वास यूट्यूब पर ‘तर्पण’ नाम के अकाउंट से अपना वीडियो शेयर करते हैं। उन्होंने 8 जुलाई को 2016 इस कविता को यू ट्यूब पर अपलोड किया था और कवि हरिवंश राय बच्चन को क्रेडिट दिया था।
जब फॉटोकॉपी की दुकान अंतरराष्ट्रीय प्रकाशकों ने लगाया कॉपीराइट
दिल्ली यूनिवर्सिटी के अंदर किताबों की फोटोकॉपी की बिक्री को रोकने के लिए तीन अंतरराष्ट्रीय प्रकाशकों ने डीयू की फोटोकॉपी शॉप के खिलाफ केस किया था। जिसे दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले को खारिज कर दिया। अंतरराष्ट्रीय प्रकाशकों ने आरोप लगाया था कि कियोस्क ने उनके कॉपीराइट का उल्लंघन किया है और दिल्ली विश्वविद्यालय के कहने पर उन्हें भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ रहा है क्योंकि छात्रों ने अब उनकी किताबें खरीदनी बंद कर दी हैं। लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय ने फोटोकॉपी करने वालों का समर्थन करते हुए कहा कि छात्रों द्वारा कॉपीराइट पुस्तकों की फोटोकॉपी का उपयोग करना तार्किक शैक्षिक आवश्यकता है और इसे उल्लंघन के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। इस मामले में छात्र भी कियोस्क के समर्थन में खडे़ दिखे क्योंकि कुछ किताबें काफी महंगी थी।
साथ काम करने को तैयार नहीं है।
जब गुलजार के गाने को कविता से प्रेरित बताया
फिल्म इश्किया का गाना इब्नेबतूता दर्शकों को काफी पसंद आ रहा है, लेकिन गीतकार गुलजार के इस गीत पर कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के परिवारवाले काफी दुखी हैं क्योंकि उनकी कविता से प्रेरित होकर लिखे गये इस गाने में कहीं भी इस दिवंगत कवि को श्रेय नहीं दिया गया है। अपनी गजलों से लोगों को मंत्रमुग्ध करने वाले गुलजार ने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता पर इस गाने के बोल लिखे हैं। सक्सेना ने मोरक्को के विद्वान इब्ने बतूता के घुम्मकड़ रवैये को दर्शाने के लिये एक कविता लिखी थी। लेकिन फिल्म में कहीं भी इस कवि को श्रेय नहीं दिया गया।सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की बेटी विभा सक्सेना ने कहा, जी हां, मेरे पिताजी ने इब्ने बतूता पर कविता लिखी थी, लेकिन गुलजार साहब ने इसमें थोड़े बदलाव करते हुए यह गाना लिखा है। हमें दुख इस बात का है कि कहीं भी उन्हें श्रेय नहीं दिया गया या ऐसा नहीं बताया गया कि यह गाना सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता इब्ने बतूता से प्रेरित है। उन्होंने कहा कि गुलजार साहब खुद एक कवि हैं और अगर वह गाने की पंक्तियां कहीं से उतारते हैं तो उसे हमेशा श्रेय देते हैं। उनकी गरिमा इसी में होगी कि वे मेरे पिताजी को श्रेय दें क्योंकि मेरे पिताजी अब इस दुनिया में नहीं हैं।
छपाक फिल्म पर जब मंडराये कॉपीराइट के बादल
दीपिका पादुकोण और विक्रांत मेसी स्टारर फ़िल्म 'छपाक' को लेकर नया मोड़ आया है। कॉपीराइट को लेकर डायरेक्टर मेघना गुलज़ार ने बॉम्बे हाईकोर्ट के सामने अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि किसी भी सच्ची घटना पर कॉपीराइट का दावा नहीं किया जा सकता है। मेघना ने यह बात उस केस में रखा, जिसमें एक लेखक ने दावा किया है कि आने वाली फ़िल्म 'छपाक' सच्ची घटना पर उसकी लिखी हुई कहानी पर आधारित है।न्यूज़ एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, गुलज़ार ने एक हलफनामा दिया। उन्होंने लेखक राकेश भारती द्वारा दायर केस में यह एफिडेविट दिया। भारती ने केस दायर कर फ़िल्म में बतौर लेखक क्रेडिट की मांग की है। इस हलफनामे को नाइक एंड नाइक कंपनी के वकील अमित नाईक और मधु गादोडिया ने दाखिल किया। उन्होंने मुकदमे को लेकर कहा, 'यह पूरी तरह से गलत और कानूनी रूप से अस्थिर है।' वहीं, दायर हलफनामे में कहा गया है कि दायर मुकदमा किसी भी तरीके से कॉपीराइट का मामला बनाने में असफल है। जो जानकारी पब्लिक डोमेन में मौजूद है, वह कॉफीराइट के अंदर नहीं आता है। हलफनामे में डायरेक्टर मेघना गुलज़ार ने कहा है, 'वर्तमान केस में वादी(भारती) द्वारा एसिड एटैक पीड़िता लक्ष्मी अग्रवाल की स्टोरी पर संरक्षण की मांग की गई है। किसी भी सच्ची घटनाओं या इवेंट पर कॉपीराइट का दावा नहीं किया जा सकता है।' बता दें कि लेखक भारती ने केस दायर कर दावा किया है, इस पर आधारित एक 'ब्लैक डे' नाम से एक स्क्रिप्ट लगभग लिखी जा चुकी है। इसका रजिस्ट्रेशन फरवरी 2015 में इंडियन मोशन पिक्चर प्रोड्यूसर एसोसिएशन (IMPPA) में कराया गया है। भारती ने कहा कि तब से वह काम कर रह हैं। वह स्क्रिप्ट लेकर कई कलाकारों और निर्माताओं से संपर्क भी किया है।'
पानीपत फिल्म पर उपान्यासकार ने लगाया था आरोप
मराठी उपन्यासकार विश्वास पाटिल ने कहा, अगर उन्हें ग़लत साबित कर दिया गया, तो वह पानीपत के मेकर्स से सार्वजनिक रूप से मांफी मांगेंगे। हाल ही में प्लॉट चुराने को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट में एक केस भी दायर किया है। इसको लेकर पाटिल ने कहा, 'जिस वक्त मैंने ट्रेलर देखा, तभी मुझे विश्वास हो गया था कि उन्होंने (फ़िल्ममेकर्स) मेरी किताब की आत्मा को चुराया है। इसके बाद कोर्ट जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।' न्यूज़ एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए पाटिल ने कहा, 'मैंने उन्हें स्क्रिप्ट और फ़िल्म दोनों दिखाने के लिए कहा है। अगर मैं ग़लत हुआ और उन्होंने मेरा प्लॉट नहीं चुराया, तो मैं सार्वजनिक रूप से माफ़ी मागूंगा। नहीं तो, उन्हें मुआवजा देना होगा।' बता दें कि यह नॉवेल का 43वां एडिशन है। किताब की मराठी कॉपी की 2 लाख से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं। हाल ही वेस्टलैंड प्रकाशन ने इसकी अंग्रेजी में ट्रांस्लेटेड प्रति भी छापी है। वहीं, लेखक इस पर आधारित 'रणांगन' नाम से नाटक भी लिख रहे हैं। बता दें कि अशुतोष गोवारिकर की फ़िल्म 'पानीपत' और 'नॉवेल' दोनों ही पानीपत के तीसरे युद्ध पर आधारित हैं। इस युद्ध में मराठाओं के सामने अफ़गानी सेना खड़ी थी। यह युद्ध 14 जनवरी, 1761 को लड़ा गया था। 60 वर्षीय लेखक पाटिल का कहना है कि युद्ध की कहानी पब्लिक डोमेन में है। ऐसे में इस पर किसी व्यक्ति विशेष का कॉपीराइट नहीं है। लेकिन उनका दावा है कि उनकी किताब में कहानी को कई नए आयाम और रंग दिए गए। यही आयाम और रंग फ़िल्ममेकर्स ने चुराये हैं।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें