अदाकार क्यों बोले भाई?

एक मर्तबा शाहरुख खान से किसी ने पूछा था, कि हॉलीवुड के अदाकार अक्सर अपने देश में घट रहे मुद्दों पर अपनी राय देते हैं, आप क्यों अपनी राय नहीं देते? उनका ज़बाब था, वहां की मीडिया सिर्फ उनके बयान को दिखाती है लेकिन यहां अगर मैं किसी मुद्दे पर अपनी बात कहूंगा, तो बाजीगर फिल्म की धुन के साथ आधे घंटे का एपीसोड बनेगा.

अभी हाल ही में Jnu में दीपिका पादुकोण के जाने पर बवाल मचा था


यह बात तो किंग खान ने कहीं थी पर हमारा असली चरित्र यही है, हमें फिल्मी सितारे पर्दे के भीतर ही स्टेंड लेते हुए अच्छे लगते हैं, असल जिंदगी में नहीं. असलियत में अगर वह कुछ कह देते हैं, तो हमारे जज करने वाले पैरामीटर से हम उन्हें एक सर्टिफिकेट से नवाज देते हैं. कुछ ऐसा ही अभी दीपिका पादुकोण के साथ होते दिख रहा है. भई दीपिका की मर्जी वह जेएनयू जाएं या न जाएं. उनकी मर्जी वह वहां किस मंच पर रूके. उनकी संवेदना, उनकी आजादी, उनकी अभिव्यक्ति वह चाहे जिसका समर्थन करें. उनके जाने से यदि आप उन्हें देशद्रोही, टुकड़े टुकड़े गैंग का मेंबर  और छपाक फिल्म के विरोध में ट्वीट करके खुश होते हैं, तो यकीन मानिए आपके अंदर से लोकतंत्र खत्म हो गया है. आप उस मानसिकता के शिकार हो गए हैं, जो बस सच को अपने पाले में मानकर दूसरे की बात को सुनना ही नहीं चाहता. मुंबई में विशाल भारद्वाज, दीया मिर्जा, अनुराग कश्यप यदि जेएनयू के छात्रों के साथ हुई हिंसा के खिलाफ बैठे हैं, तो वह उनकी निजी पसंद है, वह नहीं चाहते हैं कि किसी कैंपस में खून के छीटें गिरे. याद रखिए वह अदाकार हो सकते हैं, सिनेमा में आप उनको उनके काम से जानते हैं. वही उसके पहले वह एक नागरिक हैं, हर नागरिक को इस देश में अपनी कहने की स्वतंत्रता है. भारत की महान संस्कृति जब बचेगी, जब आप उस जमात की सुनने की आदत डालेंगे जो अपने फायदे के लिए कम और दूसरो के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद कर सकें. बाकि रोजी रोटी की तलाश में सब दौड़ ही रहे हैं.

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