एक जिंदगी काफी नहीं

साल खत्म होने को है, बीते हुए साल के पन्ने जब पलटता हूं, तो बहुत से ऐशे दृश्य आंखों के सामने घटे है, जिसने मुझे एक नया नजरिया दिया है. मैं हर साल के आखिरी दिनों में पूरे साल को कागज पर उकेरता हूं, पिछले छह-सात साल से तो यह कर ही रहा हूं. लेकिन इस बार मेरे पास डायरी नहीं है, तो इस आभासी दुनिया के दलदल में मैं अपना हिस्सा भी न्यौछावर कर रहा हूं, वैसे भी कीचड़ में साफ पानी भी मिलकर कीचड़ ही बन जाता है, तो शुरुआत कीचड़ से ही करते हैं, खुद में खूब कमियां इस साल देखी है, जिन्हें बदलना है. कम से कम उन्हें छोड़ने की एक्टिंग तो करना ही है. उन कमियों में हद से ज्यादा चुप रहने का एक बनावटीपन सा मैंने इस साल खूब किया है. जहां मैं अस्वाभाविक रूप से चुप रहा हूं, जहां मेरे शब्द गले तक आकर होंठों की भीतरी सतह से फूटना चाहते थे, लेकिन मैंने उनको जबरदस्ती से दबा दिया. मुझे अब अपनी अभिव्यक्ति को दबाना नहीं है.


भेड़ाघाट में मां नर्मदा और मैं (शुभम)


मैंने इस साल जीवन में शायद दूसरी बाद खुले में शौच की है, मैं इटारसी से भोपाल गर्मी के दिनों में आ रहा था और मेरे पास शौचालय रूपी कोई जगह दिख नहीं रही थी, तो ले देकर मुझे एक पानी की बोतल जुगाड़ करके हमारे मध्यप्रदेश के घने जंगलों के बीच जगह तलाश करके स्वच्छ भारत को ठेंगा दिखाया, इस साल हुए लोकसभा चुनाव में मैंने आप जानकर मताधिकार का प्रयोग नहीं किया, मुझे पता नहीं क्यों अंदेशा था, कि मेरा वोट इस दफा गया तो मुझे बुरा लगेगा, इसीलिए वोटिंग के एक दिन पहले मैंने इस शहर को अलविदा कह दिया, ट्रेन में बैठे - बैठे मुझे अफसोस था कि यह मेरा गलत कृत्य था, इसीलिए अब वोट जरुर दूंगा, यह ठाना है. इस साल कई लोगों का दिल दुखाया है, अपना गुस्सा या जलाल जो भी कहे उन मासूमों पर निकाला है, जिनकी बद्दुआ से पत्थर भी पिघल जाए, हो सकता है वहां क्रोध लाजमी था, यह भी सच्चाई है कि उस पलभर के बुलबुले के चक्कर में बहुतरे लोग दूर हो गए, अब यह सोचा है, कि उन लोगों की लिस्ट बनानी है, जिनका दिल मैंने दुखाया है, इन दो - तीन दिनों में उनसे माफी मांगना है. हो सकता है, वह मुझे माफ़ न करें, फिर मैं क्यों अपने दिल में खोट रखूं.
इस साल कई किताबों को अधूरा छोड़ रखा है, विपश्यना का प्लान भी इस बार अधर पर रहा. इस साल साहित्य और ध्यान दोनों को जिंदगी का हिस्सा बनाना है. इसके लिए एक बड़ी लंबी तीन पन्नों की लिस्ट बनाई है, जिनमें उन किताबों के नाम लिखे हैं, जिनमें उन लेखकों, साहित्यकारों के किस्से है, उनकी कल्पनाएं है, जिनको पढ़कर खुद के दिमाग को विकसित करना है.
ध्यान के लिए विपश्यना का एप डाउनलोड किया था, कुछ समय आंख बंद करके उन स्टेप को फोलो भी किया, फिर मुझे यह समझ हुई कि शिविर में जाकर ही कुछ मिलेगा, यहां नहीं.
इस साल राजस्थान, हरियाणा, यूपी के उन जिलों को देखा जो अभी तक सिर्फ अपने नामों तक ही मेरी स्मृति में कैद थे, इस साल उन्हें जीकर वहां के लोगों की सुनकर,उनको अपनी सुनाकर मैं आया हूं.
दिल्ली में मैंने एकांत की जगहें तलाश ली है, जहां खुद को खुद से मिलाया जा सकता है, हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह में मुझे वह शांति महसूस होती है, जो इस आपाधापी भरे शहर में कही नहीं होती, इस साल मथुरा जाकर गोवर्धन की 21 किलोमीटर की तीन परिक्रमा लगाई है, एक दफा तो मेरे सहयात्री लोग मेरे लिए बिल्कुल अंजान थे, उनमें से एक जज थे तो उन्होंने न्यायालय और अंधविश्वास की बहुत सी ऐसी कहानी बताई जिसपर मैं काफी शोध करने वाला हूं. इस साल प्रेमचंद, सत्य व्यास, दिलीप कुमार, अमृता प्रीतम, खुशवंत सिंह, प्रणॉय रॉय, दिव्य प्रकाश दूबे, के आर नारायण, वाजपेई, प्रभाष जोशी का लिखा कुछ हिस्सा आंखों के नीचे से गुजारा हैं. कबीर सिंह से लेकर गाइड, पुरानी जींस, बापू, चटनी सरीखी बहुत सी नई पुरानी फिल्में देखी हैं, उस मायाजाल में बंधकर कई रातों को हंसीन सपने देखे है. एक पूरा साल यह तो किसी किताब लिखने जैसा काम है, जिसमें इंसान के अच्छे और बुरे दोनों समय पर अच्छा खासा कंटेंट लिखा जा सकता है, लाइफ एक जर्नी है, उस साल का एक पड़ाव 2019अब खत्म होने को है, वही 2020 हमसे अपने  नए नए अनुभव साझा करने को बैठा हुआ है, चिंता मत करो दोस्त तुम्हें भी बिल्कुल वैसे जीएंगे जैसे इस साल को जीआ है.

नोट :- नटवर सिंह की आत्मकथा का नाम है एक जिंदगी काफी नहीं, मां नर्मदा की नाभि से यात्रा करने का आलौकिक सुख, खुद से की गई गद्दारी ऐसी बहुत सी बातें हैं, जो हकीकत में बयां नहीं की जा सकती, उन्हें किसी ओर के नाम से उनकी दास्तान बनाकर सुनना चाहिए.

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