मथुरा की लड़की और गोकुल की गाय कर्म फूटे तो अंत ही जाएं (1930 के दशक की कहानी)



मथुरा की लड़की और गोकुल की गाय कर्म फूटे तो अंत ही जाएं यह कहते हुए बाबा ने पान की बेगम की तुरुप चलकर मेरे हुकम के इक्के की बंती को नहीं बनने दिया और दहला पकड़ की उस चाल में बाबा और अम्मा की जोड़ी जीत गई और मैं(मंगों) और मेरे बिड़ू नत्था नाना हार गएं, अम्मा उठी और अपने समधी और भाई के लिए पानी का लोटा लाई, बाबा ने एकटक मुझे घूरा मैं उतने मैं उठकर अम्मा की मदद  करने लग गई, बाबा के चेहरे के भाव देखकर समझ आ रहा है, कि वह कह रहे है अपनी बुर्जग दादी की मदद कर। दो दिन बाद मेरा गोना होने वाला है, हमारे दसविसा गोवर्धन वाली बाखर में मेहमानों का तांता सा लगना अभी से प्रारंभ हो गया है। यूं तो हमारे जिझोतिया ब्राह्मण गोत्र के घर में जिजवानों का आना जाना आम सी बात है पर इस बार यह भीड़  गिरराज जी की परिक्रमा के लिए नहीं बल्कि मेरे गोने में शामिल होने इक्टठा हुई है। हमारा परिवार राजस्थान के दो रजवाड़ो अजमेर और भरतपुर के कुलपुरोहितों का है, उन के क्षेत्र के  यात्री जब भी पूर्णिमा पर गोबर्धन आते है, हमारे घर ही रुकते है, हम उनकी खूब खातिरदारी करते है, बदले में मुंहजुबानी बोल जाते है, कि इस वर्ष हमारे यहां से दस किलों गुड़, एक किंवटल गेंहू आपके हिस्से में, फिर हम गांव गांव जाकर वह दान लेते है और सामान बेंचकर पैसे घर लाते है, उसी से हमारे घर का सालभर का चूला चौका चलता है। मैं 
आषाढ़ में 16 वर्ष की हुई हुं, ठीक छह साल पहले जब मैं
दस वर्ष की थी तब मेरी शादी गोकुल के छोटेलाल से हुई थी। छोटेलाल यह नाम मैने आज तक कभी मुंह से नहीं बोला है, हमारे यहां पति का नाम लिया भी नहीं जाता है, उस नाम से हम उम्र भर के लिए बंध जाते है, पर उस बंधन का नाम लेना हमारी परंपरा में नहीं है। 


                  यह फोटो अछुत कन्या मूवी का पोस्टर है
मैं उनकी दूसरी पत्नी हुं, उनकी पहली पत्नी यही हमारे घर से तनिक ही दूर की थी वह मशहुर नत्थु पहलवान की बहन भगवानदेई थी, यही मायके में आकर वो चल वसी थी, सुना है, उसके नवजात बच्चे की मौत से वह सदमे में आ गई थी पर वह और उसकी बेटी कैसे मरी यह राज ही है,  मुझे नहीं मालुम था जिन दीदी की शादी में चार साल की उम्र में मैं बैठी थी, उन्ही के दुल्हे से मेरी शादी होगी, बड़ी नेक दीदी थी वो खूब मौनथार चखा था मैने उनकी मंडप में, शायद शादी में गाई जाने वाली गालियां मैने पहली बार तभी मैरे कान मैं गई थी, हमारे यहां जैसी गालियां शादियों मैं गाई जाती है, उन्हे सुनकर मर्द भी शर्मा जाएं, तरह तरह की प्रजाति की गालियां दुल्हे की अगवानी पर गाई जाती है, दुल्हा बौना है, तो अलग गाली, लंबा है तो अलग गाली पर  इन गालियों में वह मिठास है, जो दो परिवारो के संबंध को हास परिहास से जोड़ देता है। मेरे पति मुझसे उम्र में 20 साल बड़े है, यह अंतर आम सी बात है ऐसा मेरे दादजी कहते है, दादजी मैं पिताजी को कहते हुं। वह नजदीक मैं ही जतिपुरा की पाठशाला में माससाहब है, उन्होने और मेरी अम्मा यानि मेरी मां की मां ने मुझे पाला है, मेरी अम्मा मुझे हमेशा कहती है, तेरी मेरी किस्मत बिल्कुल मेरी जैसी है, मुझे अम्मा की यह बात बहुत बुरी लगती है. वह उन अभागी मां में से है, जिनके जीते जी उनको दोनो बच्चे मरे है, वह अपनी बेटी और बेटे दोनों की मौत में खुद भी मरी है, दो बार उनकी जुबान ने भगवान के सामने उनकी जान लेकर बेटा या बेटी की जान वापस लौटाने को कहा है पर ठाकुरजी के आगे आखिर किसकी चलती है. वह मेरी मां किरण और मामा सूरज का नाम सुनते ही फफक फफक कर रोने लगती है, जब मामा का श्राद्ध होता है, तो वह नाग को दूध चकलेश्वर जाती है उन्हे लगता है, उनका बेटा अब नाग के रुप में मौजूद है, जिसे उनकी पत्नी ने किसी बाबा से घात देकर मरवा दिया था और अचानक भोलेबाबा के मंदिर के बाहर आते से ही उनकी मौत हो गई, अम्मा तो नत्था बाबा ने कहा था कि भोलेनाथ की शरण में अपना सूरज नागदेवता के रुप में वास करता है, वह उसी आस मे अपने मरे बेटे को दूध पिलाने वहां जाती है और मंदिर के बाहर दूध का प्याला रख आती है. जिस घर में हम रहते है वह मेरी अम्मा का मायका है, मेरी मां की मौत के बाद दादजी मुझे यहां छोड़गए और मेरे बड़े भाई राधारमण को बाबाजी के हवाले कर दिया जब अम्मा ने दादजी से पूछा लाला राधों कहां तो बोले दानघाटी के पास केशव बाबा को दे आया, उनके मुंह से निकला नास के मिटे और वह दौड़ लगाकर मेरे भाई को लेकर आई. अम्मा की ससुराल हाथरस में और वह अपने भाई नत्था बाबा का ख्याल रखने यहां आई थी , लखा नाना हमारे गणेशरा गांव के खेतों की रखवाली करते है और बहुत ज्ञानी है, उनकी कही बात कभी झुठी नहीं जाती है, जह मैने और मेरे भाई राधों ने पूछा बाबा अम्मा ने अपनी जिंदगी में इतना दुख क्यों देखा तो वह बोले अशरफी बीबी का ब्याह मथुरा के बाहर हुआ था और जिस भी मथुरा जिले की लड़की की शादी यहां से बाहर होती है, उसकी किस्मत बहुत खराब होती है, फिर उन्होने वह कहावत सुना दी कि मथुरा की लड़की और गोकुल की गाय कर्म फुटे तो अंत ही जाएं.
मेरे मन में अंदर ही अंदर अम्मा की कही उनकी किस्मत जैसी मेरी किस्मत वाली बात खाये जा रही है, पर संतो बीबी के होते मैं ऐसी सोच में कैसे रह सकती हुं, हमारे घर में एक कुतिया भी है, जो दसविसे गोबर्धन में हमारे साथ रहती है, वो शायद ब्रज की पहली कुतिया होगी जिसने मेरा कन्यादान लिया था, उस बेजुबान को पता नहीं यह कैसो मालूम पर सुबह मानसी गंगा के जल से नहाकर  आई संतो बीबी ने मेरी शादी वाले दिन कुछ नहीं खाया था, मेरे कन्यादान के बाद पीपल के पेड़ के नीचे बैठे गिराजजी महाराज पर चढ़ रहे दूध को उसनें पी कर अपना वर्त तोड़ा था, मुझे उससे बहुत लगाव है, वह है ही लाजवाब , गोना होने तक मैं मायके की अमानत हुं, दो दिन बचे है मेरी विदाई की बेला में , हमारे ब्रज में लाली होने पर खुशी कम दुख ज्यादा मनता है और विदाई की बेला में दुख कम और खुशी ज्यादा, मेरे गोने की खुशी सारे रिश्तेदारों में देखी जा सकती है, इस उत्सव में ब्रिजों भुआ भी होलीगेट से आई है, वह मुझे बहुत प्यार करती है. वह बिचारी बहुत बहुत दिक्कत सहकर यहां आई होगी वह इतनी सीधी है, कि जब भरतपुर के मेले में वह पहली बार गई तो हमारे यहां आकर बताने लगी, लाली या बड़ो सो  जानवर पर राजा की सवारी निकले है वहां जाके सिंग यह बड़े-बड़े अपने हाथ दिखाकर बताने लगी वह भी सिर के उपर नहीं मुंह के नीचे से निकले थे, मैं बिचारी सोच में पड़ गई कि कौन से जानवर की बात यह कर रही है, जिसके सिंग नीचे की तरफ होते है, उतनें में दादजी बोल उठे हाथी की बात कर रही है यह बावरी और उतने में हम हंसी से लोटपोट हो गए. शादी ब्याह के घर में ऐसी हंसी ठिठोली चलती रहती है, अभी भुआ अकेली आई है, फुफाजी अंग्रेजों की ज्ल में बंद है, सुना है उन्होने एक अंग्रेजी मेडम की गाली से बौखला कर उसका कान खा लिया था, तो तब से वह जेल में है, बड़े मजाकिया है, हमारे फुफाजी , काश वह यहां होते पर वह जेल में भी मजे ही कर रहे होगे. पता नहीं एक दिन कैसे बीत गया, रात में सब औरते खाट बिछाएं आंगन में गाली गाते है और उसी में रात भी ढ़लने लगती है, मुझे उड़ गई धोती चमक गई... बहुत पसंद है, गालियों के बीच जब किसी के पांदने की हवा आई तो बहुत मजे में अम्मा बोल उठी हमरा पाद जलेबी पाद, तुम्हरा पाद इमरती पाद, ललुआ पाद या बबुआ पाद, यह पाद कहां से आया? बस इसी मस्तखोरी में दो दिन बीत गए, मैं जिझोतिया गोत्र से सनाढ़य गोत्र के घर जाने वाली हुं, मेरे पति अपने संगे संबंधियों के साथ छह: बेलगाडी से आये है, नजदीकि भगवती ताई के पल्ली पार वाले घर से गहने आ गये है, हम सभी एक कुल वाले परिवारों के गहने वही रहते है जो मांगलिक प्रसंग में दुल्हन पहनती है, गोने की रस्म गोसाई जी करवा रहे थे, कि इतने में ससुर जी बोल पड़े दोनो को मैं जबलपुर भेज रहा हुं, गोकुल में लठेतों की दादागिरी बढ़ गई है, वहां मेरा बड़ा लड़का भी रहता है, यह दोनो वही रहेगे, हलवाई की दुकान खुलवा देगे इसकी, नही फिर पंडित तो है ही पूजा पाठ से चूल्हा - चौका चल ही जायेगा. मैं उनके इतना कहते ही एक अंधेरे का बादल मेरे सामने मंडराने लगा कि अभी मैं घर से सात कोस दूर गोकुल जाने में ड़र रही थी अब मुझे कोसो दूर, दरिया पार जबलपुर जाना पड़ेगा. मेरे बहुत से संकल्प टूट जाएंगे सोच रही थी गोकुल रहुंगी तो क्रांतिक के व्रत ऱखकर रोजाना यमुना घाट पर पूजा कर लूंगी पर यह अब नहीं हो पाएंगा, अपने भाई की उम्र बढ़ाने यमद्वितिया पर मथुरा के यमुना जी के मंदिर में राधों के साथ नाही भी नहीं हुं पर ठीक है कर्म के आगे भली चलाई, मेरा गोना हुआ अम्मा और संतो बीबी से लिपट लिपट कर मैं खुब रोई, अब रेल में बैठी हुं, पहली बार पटरी पर चलने वाली गाड़ी में बैठकर ड़र तो लग रहा है पर गिरिराज धरण प्रभु तेरी शरण जप जप कर यह रास्ता भी कट जाएंगा. मुझे रहरह कर बाबा के शब्द याद आ रहे है मथुरा की लड़की और गोकुल की गाय कर्म फूटे तो अंत ही जाएं. क्या उनके मुंह मैं सरस्वती बैठी थी मेरी किस्मत अम्मा जैसा सच मैं है, हो सकता है, यह उनका वहम हो, जो भी हो पर मुझे गोने के बाद अपनी जन्मभूमि मथुरा छोड़ना पड़ रही है, जहां आकर परदेशी ब्रज की रज माथे से लगाते है, मुझे वह पवित्र मिट्टी छोड़ जबलपुर जाना पड़ रहा है, रास्ते भर अपनी सोलह साल बिताई जिंदगी मैने जाते देखा, ऐसा लग रहा था मानों वह मुझसे कह रही हो लाली पिअर छुटो जाएं. मैलों के झुले, मथुरा के पेड़े की सुंगध,मानसी गंगा में नहाकर मनसा देवी के दर्शन अब मैं न जाने कब करुगी, वह सब सहेलियां जिलके साथ आधा कोस दूर से हम पानी लाते थे, वह सब पीछे छूट गई है मैं अपनी भूमि के लिए अब परदेशी हो गई हुं, ऐसा कहते है मथुरा में जन्मी कन्या और गाय पर राधारानी की कृपा होती है लेकिन जब वह यहां के 84 कोस के बृजमंडल से दूर चली जाती है, तो उस जैसी अभागी कोई नहीं होती है. उस फेहरिस्त में अब में भी शामिल हो गई गई हुं। मथुरा में बचपन और परिवार है जबकि जबलपुर में पति और उनका नया संसार है. मायके और ससुराल के दो पासन में लड़की हमेशा ससुराल ही चुनती है. सो अब चाहे मैं अभागी रहूं पर मेरे पति का घर द्वार ही मेरा संसार है, यह ही मेरा तीर्थ है, भविष्य के सपनों को लेकर हम युगल यमुना किनारे बसी कृष्ण की नगरी से नर्मदा तट पर आश्रित शहर जबलपुर जा रहे है, खैर जाही बिंध राखे राम , ताहि बिंध रहिए. फिर मायके तो मैं वर्ष दो वर्ष में इनके साथ आती रहुंगी. दोनो खूंटी पर मेरा बसेरा रहेगा, यह ही हम गाय और बेटियों की नियति है।

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