भोपाल गैस त्रासदी और मुआवजा
गैस त्रासदी 3 दिसंबर को घटी, मेरे अधिकतर नातेदार उन दिनों शहर के उस हिस्से में थे, जो मिथाइल आइसोसाइनेट की जद में थे, सराफा चौंक इलाके में मेरी एक पीढ़ी पूर्वज और उनकी माताजी रहा करती थी, गैस निकली तो मिर्ची के धुंए की शक्ल में उनकी याददाश्त में कैद हो गई, उस दिन शादियों से लोग भूखे प्यासे घर आएं, चौक से कमला पार्क और फिर तालाब में डुबकी लगाते एक पीड़ित के किस्से हम सुनते बड़े हुए हैं, शायद अखबार में मुआवजे के लिए नाम ढुंढते उन चश्मदीदों से मेरा ज्यादा पाला पड़ा था, जो उस एक रात में सांस लेने का जुर्म अस्थमा जैसी बीमारियों के रूप में आजीवन भोग रहे थे,
उन्हें अपना नाम पढ़ना भी नहीं आता था, इसीलिए हम भास्कर में उनके नाम को खोजने की जुगत में लगते थे, उनका नाम जब चार पांच दिन तक अखबार में खोजबीन कर उभरता था तो उनके चेहरे की खुशी उस दर्द की याद को ताजा करती थी, जब छुटपन में उन नातेदारों से पूछा आपका नाम अखबार में क्यों छपा है तो वह कहते थे हमें गैस खाने के पैसे मिलेंगे इसीलिए, यह सुनकर दिमाग चकरा जाता था कि भई गैस खाने के कैसे पैसे? फिर बालमन ने खुद उत्तर खोजा कि रसोईगैस वाली गैस ही हम खाते है वही सिलेण्डर वाली गैस के कारण पैसे मिलते होंगे, जब कितने पैसे पूछा तो पता चला पच्चीस हजार, मैने सोचा कितनी अच्छी बात है हर महीने सिलेण्डर खरीदो फिर उसके पैसे भी पाओं वो भी हजारों में, यह भी गौरतलब है कि मैं उन बच्चों में था जो भोपाल रियासत के प्रधानमंत्री पंडित चतुर नारायण मालवीय जी और उनके बैरसिया स्थित घर से भी परिचित था, वही मालवीय जी कि मूर्ति के नजदीक यूनियन कार्बाइड का कारखाना है, जहां से गैस निकली थी पर इस नासमझी ने गैस त्रासदी की मुआवजे से लेकर उस समय पूड़ी और हल्दी बांट रहे स्वयंसेवी तक की जुबानी उस दास्तां को सुनने का मौका मिला उनमें से अधिकतर उस स्मार्ट कार्ड के सहारे भोपाल मेमोरियल अस्पताल में इलाज कराने रेगूलर जाते थे, या गिन्नोरी की बगिया के नजदीक अस्पताल या अन्य शाखाओं से दवाइयां लेकर आते थे। मुझे लगा उन्हें अच्छा पैसा मिलता है, कुछ ने बताया भी कि फलाने साहब ने द्वारका नगर का अपना घर गैस त्रासदी के मुआवजे से बना लिया है क्योंकि उनके घर में चार लोगों ने गैस खाई थी, धीरे धीरे जब दिमाग में थोड़ा भेजा आया तब पता चला कि यह मुआवजा उनके दर्द और उस पीड़ादायक रात के सामने एक धूल का कण सा था, उस रात लोगों ने गैस नहीं खाई थी मिथाइल आइसोसाइनेट गैस ने लोगों को खाया था। एक किस्सा जो उस रात की बर्बरता बता सकता है कि एक नवजात शिशु अपनी मां के आंचल से लगा रोया जा रहा है और उसकी मां उसको चुप कराने की कोशिश भी नहीं कर रही है, जब देखा तो पता चला कि वह मां लाश और नवजात लाश के आंचल से लिपटा बिलख रहा है। उस बच्चे से मां यमराज ने नहीं एक कीटनाशक बनाने वाली कंपनी ने छिनी थी। मैंने सोचा कि एक व्यक्ति का मर्डर करने वाले को उम्रकैद या फांसी की सजा होती है तो उस कंपनी के मालिक या उस कृत्य के जिम्मेदारों को तो फांसी ही हुई होगी पर यह भ्रम भी एक पोस्टर को देख खत्म हो गया जिसमें लिखा था एंडरसन को फांसी दो यह एंडरसन ही उस समय कंपनी का मालिक था, उस व्यक्ति को तब हनुमान गंज पुलिस ने गिरफ्तार कर जमानत देकर वापस अपने अमीर लोगों के देश यूएसए भेज दिया था और उस समय भोपाल में हमारे देश के गरीब लोगों की लाशे कफ़न को तरस रही थी। बहुत से दर्द यहां कि आवोहवा में उस सर्द रात को भोपाल के वाशिंदों ने सहे थे पर बचा क्या खैरात जितना मुआवजा, एक गैस राहत विभाग और ठगे से गैस पीड़ित .
उन्हें अपना नाम पढ़ना भी नहीं आता था, इसीलिए हम भास्कर में उनके नाम को खोजने की जुगत में लगते थे, उनका नाम जब चार पांच दिन तक अखबार में खोजबीन कर उभरता था तो उनके चेहरे की खुशी उस दर्द की याद को ताजा करती थी, जब छुटपन में उन नातेदारों से पूछा आपका नाम अखबार में क्यों छपा है तो वह कहते थे हमें गैस खाने के पैसे मिलेंगे इसीलिए, यह सुनकर दिमाग चकरा जाता था कि भई गैस खाने के कैसे पैसे? फिर बालमन ने खुद उत्तर खोजा कि रसोईगैस वाली गैस ही हम खाते है वही सिलेण्डर वाली गैस के कारण पैसे मिलते होंगे, जब कितने पैसे पूछा तो पता चला पच्चीस हजार, मैने सोचा कितनी अच्छी बात है हर महीने सिलेण्डर खरीदो फिर उसके पैसे भी पाओं वो भी हजारों में, यह भी गौरतलब है कि मैं उन बच्चों में था जो भोपाल रियासत के प्रधानमंत्री पंडित चतुर नारायण मालवीय जी और उनके बैरसिया स्थित घर से भी परिचित था, वही मालवीय जी कि मूर्ति के नजदीक यूनियन कार्बाइड का कारखाना है, जहां से गैस निकली थी पर इस नासमझी ने गैस त्रासदी की मुआवजे से लेकर उस समय पूड़ी और हल्दी बांट रहे स्वयंसेवी तक की जुबानी उस दास्तां को सुनने का मौका मिला उनमें से अधिकतर उस स्मार्ट कार्ड के सहारे भोपाल मेमोरियल अस्पताल में इलाज कराने रेगूलर जाते थे, या गिन्नोरी की बगिया के नजदीक अस्पताल या अन्य शाखाओं से दवाइयां लेकर आते थे। मुझे लगा उन्हें अच्छा पैसा मिलता है, कुछ ने बताया भी कि फलाने साहब ने द्वारका नगर का अपना घर गैस त्रासदी के मुआवजे से बना लिया है क्योंकि उनके घर में चार लोगों ने गैस खाई थी, धीरे धीरे जब दिमाग में थोड़ा भेजा आया तब पता चला कि यह मुआवजा उनके दर्द और उस पीड़ादायक रात के सामने एक धूल का कण सा था, उस रात लोगों ने गैस नहीं खाई थी मिथाइल आइसोसाइनेट गैस ने लोगों को खाया था। एक किस्सा जो उस रात की बर्बरता बता सकता है कि एक नवजात शिशु अपनी मां के आंचल से लगा रोया जा रहा है और उसकी मां उसको चुप कराने की कोशिश भी नहीं कर रही है, जब देखा तो पता चला कि वह मां लाश और नवजात लाश के आंचल से लिपटा बिलख रहा है। उस बच्चे से मां यमराज ने नहीं एक कीटनाशक बनाने वाली कंपनी ने छिनी थी। मैंने सोचा कि एक व्यक्ति का मर्डर करने वाले को उम्रकैद या फांसी की सजा होती है तो उस कंपनी के मालिक या उस कृत्य के जिम्मेदारों को तो फांसी ही हुई होगी पर यह भ्रम भी एक पोस्टर को देख खत्म हो गया जिसमें लिखा था एंडरसन को फांसी दो यह एंडरसन ही उस समय कंपनी का मालिक था, उस व्यक्ति को तब हनुमान गंज पुलिस ने गिरफ्तार कर जमानत देकर वापस अपने अमीर लोगों के देश यूएसए भेज दिया था और उस समय भोपाल में हमारे देश के गरीब लोगों की लाशे कफ़न को तरस रही थी। बहुत से दर्द यहां कि आवोहवा में उस सर्द रात को भोपाल के वाशिंदों ने सहे थे पर बचा क्या खैरात जितना मुआवजा, एक गैस राहत विभाग और ठगे से गैस पीड़ित .

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