न्याय की देवी की आंख पर पट्टी क्यों?

न्याय की देवी की आंख पर पट्टी है, उनके एक हाथ में तराजू है, तो दूसरे हाथ में तलवार. जिसको आंखों से दिखता नहीं है, वह तराजू के पलड़े पर सच के वजन को भी नहीं देख सकती, न ही तलवार से अपराधियों को दंड दे सकती है. फिर हम भारतीय न्याय व्यवस्था से इंसाफ की उम्मीद क्यों करते हैं. जिन जानवरों ने उस डॉक्टर का यौन शोषण कर उसको जलाया था, उनके लिए जंगल के कानून की ही जरूरत है. हम गांधीवादी होकर सबको न्याय की बात कर सकते हैं लेकिन सुधार गृह में इंसान भेजे जाते हैं, वहशी जानवर नहीं, उनकी तो बली ही चढनी चाहिए, मेरे विचार आक्रमक हो रहे हैं, मैं जानता हूं.

न्याय की देवी 


 जब पोर्न साईट पर देश के लाखों सरफिरे लोग  उस मासूम के साथ हुए दुष्कर्म की वीडियो तलाश रहे थे, तब मुझे दुख हुआ था, जब संसद रोड पर बैठी लड़की रो रही थी, तब मुझे दुख हुआ था.जब आज जनसत्ता अखबार में एक अध्ययन को पढ़ा और पता चला कि भोपाल, ग्वालियर और जोधपुर शहरों में 90 फीसद महिलाएं असुरक्षित महसूस करती है, तो मुझे दुख हुआ. जेल रूपी सुधार गृह में उन सभी लोगों को बंद कर देना चाहिए, जिनकी फब्तियों, नज़रों से लड़कियां असुरक्षित महसूस करती है. मुझे यकीन है, इन शरीर के मर्दों से हमारी जेले भर सकती है, जब तक के लिए नारी तू नारायणी जैसी सीखों को दरिया में बहा देना चाहिए, मैंने एक अकेले रहने वाली महिला को अपने बिस्तर के बगल में जंग लगी तलवार रखकर सोते हुए देखा है, उसका मरियल शरीर यह गवाही दे रहा था कि वह किसी मर्द के दुस्साहस के आगे दम नहीं तोड़ने वाली. क्या माल है, गरीब की जोरू सबकी भोजाई कहने वाले समाज से मैं कुछ उम्मीद नहीं रखता, आप और हम नज़रों से लडकी के उभार नापकर अपनी मर्दानगी साबित करने की होड़ में जिंदा रहेंगे,  अपने परिवार की आबरू को  बिस्तर पर दम तोड़ते देखना अखबारों की सुर्खियां बनते देखकर भी जो जिंदा है, वह इंसान तो कतई नहीं है. मैं रोजाना उस मुनिरका की सड़कों से गुजरकर शर्मिंदा होता हूं, जहां से उठाई गई निर्भया की सांसें चंद हवस ने छीन ली थी. जब वह घटना घटी तब मैं बचपने और किशोरावस्था की दहलीज में था, उस एक घटना के बाद मेरे स्कूल की लड़कियों की ड्रेस स्कर्ट से सलवार कमीज़ में बदल गई थी, पूरे मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों में लड़कियों को कपड़ों से ढंक दिया था, तब मेरे उस समय की अवस्था ने यही समझा था कि बढ़ते कपड़े बलात्कार रोकते हैं. अब फिर कपड़े बढ़ा लीजिए सलवार कमीज़ में दुपट्टे की जगह लड़कियों को चादर पहनना शुरू करवा दीजिए, आप जितना लड़कियों को चांदी की जंजीर पायल के नाम से पहनायेगे, उनकी बजते घूघरु सुनकर लड़के उनका पीछा करते जाएंगे. हम नहीं सुधरेंगे रटने वाले पुरूषों को अपनी नामर्दी मुबारक हो, दुख, पीड़ा, संवेदना खुद को और अपने आसपास बसे पुरूषों को सुधारने में लगाएं. बस.

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