शाहीन बाग तुम्हें सलाम

हर मोहल्ले में एक दो महिलाएं ऐसी होती है, जिन्हें पूरे मोहल्ले की खबर होती है,वह हर मकान की खिड़की के अंदर की बातों को बड़े चाव से बताती है. उन्हें पता होता है, कि पुष्पा अपनी आई सरला के साथ आज नया हीटर खरीदने गई है. वह फिर अपने सामाजिक विश्लेषण करने के हुनर से बताती है, देखना सरला  बारह सौ रूपए तक का ही हीटर खरीद कर लाएंगी, फालतू की फिजूलखर्ची पुष्पा उसे करने ही नहीं देंगी. ऐसी ही एक मोहल्ले के कान कहे जाने वाली अम्मा के मुंह से मैंने एक महिला की आपबीती सुनी है, जो सुनकर मुझे संवेदना और आक्रोश का भाव एक साथ महसूस हुआ. दरअसल यह एक ऐसी महिला है, जो अधेड़ उम्र की है और अभी आईसीयू में भर्ती होकर आई है, उसे दिक्कत या साफ लफ्जों में उसकी बीमारी का एक ही नाम है, उसका शराबी पति. वह पति जो अपनी पत्नी को इस कदर डराता है, कि वह उसकी मार चिल्ला चोंट से सहम कर बेहोश हो गई. जब मेरे से दो तीन साल छोटा उसका बेटा उसे अस्पताल लेकर गया तो उसकी मां उस अवस्था में थी, जिसे डॉक्टरी भाषा में कोमा कहा जाता है. वैसे अभी वह होश में आकर घर आ गई है, लेकिन यह हमारे समाज में महिलाओं की स्थिति है. जो अपनी स्वाभिमान की आवाज को पति और बच्चों के लगाव और शोषण के चलते दबा देती है. हम लाख महिला थाने या महिला हेल्पलाइन बना ले, लेकिन उन जिम्मेदारियों के चलते मर चुकी आजाद महिलाओं को हम कैसे आजाद करवाएं? यह सवाल उठकर सामने आता है. यह सवाल जब परेशान करने लगता है, तब देश की राजधानी दिल्ली से कुछ अच्छी तस्वीरें सामने आ रही है, जहां शाहीन बाग में पिछले 30 दिनों से महिलाएं नागरिक संशोधन कानून के विरोध में बैठी हुई है. हम चाहे लाख इस कानून के पक्ष या विपक्ष में हो लेकिन उन महिलाओं को सर्द रातों में इस जज्बे से बैठे देखकर दिल खुश हो जाता है. एक खबर में मैंने वहां  बैठी एक मां के अल्फ़ाज़ सुने थे कि "मैं साइकॉलजी पढ़ना चाहती थी, मजबूरीवश पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी, आज मैं यहां पिछले लंबे अरसे से इस कानून के विरोध में बैठने आती हूं, लोग सोचते हैं कि हमारी कम्यूनिटी की महिलाएं मुखर नहीं है लेकिन अब बोलने का समय आ गया है."

शाहीन बाग तुम्हें न भूल पाएंगे



मुझे भी लगता है कि अब हमारे घर की मां बहनों को इन जुल्म करने वालों के खिलाफ बोलने की जरूरत है. उनका जुल्म सहना ही इन वहशियों को बढ़ावा देता है. बहुत हद तक शिक्षा के जरिए हम हमारे घर की बेटियों को आगे आने वाली कठिन परिस्थितियों के लिए तैयार कर सकते हैं. 
वैसे मुझे एक सवाल हमेशा परेशान करता था कि जब हमारे भोपाल में महिलाएं चादर ओढ़कर घर से बाहर निकला करती थी तो फिर मेरी अम्मा कैसे उस स्थिति को तोड़कर अंग्रेजी शासन में जेल गई होगी? पांव में पायल से शुरू हुई बेड़ियों से साड़ी के उपर दासता की चादर का पर्दा पहनने वाली मेरी अम्मा जैसी महिलाएं कैसे अपनी आवाज बुलंद कर पाई होगी? मुझे इस सवाल का जबाव भी मिला लेकिन काफी देर से वह शाहीन बाग में बैठी महिलाओं के होंसले जैसी ही चीज रही होगी जो उन्हें रसोई से, घर की दहलीज से, आस पड़ोस की नजरों से, चौराहों पर घूरती नज़रों से लड़कर अपने हक के साथ साथ दूसरे के हक की आवाज बनने की हिम्मत दे गई होगी.  उनके इस जज्बे को सलाम.

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