हरियाणा चुनाव एक भोपाली की नजर से
पिछले दो दिनों से हरियाणा में हूं, यह राज्य मुझे बड़ा अनोखा लगता है, यहां के लोग हम मध्यप्रदेश वासियों की तरह सुस्त न होकर काफी फुर्तीले होते हैं. (मैं खुद सुस्त हूं, इसीलिए पूरे राज्य को लिख रहा हूं) मुझे जीवन में पहली बार मध्यप्रदेश के अलावा जिस दूसरे राज्य के मुख्यमंत्री का नाम याद हुआ था, वह हरियाणा था, तब भुपेंद्र हुड्डा मुख्यमंत्री हुआ करते थे, शायद उन्हें मुख्यमंत्री बने कुछ अरसा ही हुआ होगा, कि दिल्ली के बिड़ला मंदिर के नजदीक स्थित आर्य समाज भवन में इन्हें करीब से देखा था, ब्लैक वर्दी धारी अंगरक्षकों के साथ आएं हुड्डा वहां आएं कार्यक्रम में खाना परोसने लग गए, जब अंगरक्षक खाना परोसने के उनके काम में अड़ंगा बन गए तो उन्होंने उन्हें वहां से चलता किया, वह कार्यक्रम भुपेंद्र हुड्डा के पिता की अध्यक्षता में आयोजित किया गया था, तब मैंने पहली बार हुड्डा को खाना परोसते हुए देखा था, मेरे घर में एक दीवार घड़ी हुआ करती थी, जिसमें हुड्डा के पिता (चौधरी रणबीर सिंह हुड्डा) की फोटो चस्पा थी, उनका 1 फरवरी 2009 को देहावसान हो गया था.
वह रोहतक से 1952 के चुनाव में जीतने वाले प्रत्याशी थे, इंदिरा गांधी जब तत्कालीन पंजाब के दौरे में आई थी, तो उसका जिक्र करते हुए जब उन्होंने अपने पिता जवाहरलाल नेहरू को एक चिट्ठी लिखी थी. रणबीर सिंह संविधान सभा के आखरी जीवित सदस्य थे, मैंने चौधरी साहब को उनके सात जंतर मंतर स्थित कार्यालय (अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी संगठन) में नब्बे के लगभग उम्र में आते हुए दो तीन बार देखा लेकिन जब उनके बारे में जाना वह इस दुनिया से जा चुके थे, चौधरी साहब की जीवनी (स्वराज के स्वर) के मैंने 2010 - 11 में कुछ पन्ने पलटें थे, उस किताब में हरियाणा के कई चुनावों का अप्रत्यक्ष तौर पर वर्णन है, खेर यह तो मेरा निजी अनुभव है पर भुपेंद्र हुड्डा वह पहले नेता थे, जो 2005 में शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें गुलदस्ता लेकर बधाई देने पहुंचे थे, तब हुड्डा और शिवराज दिल्ली में पड़ोसी हुआ करते थे, यह बात 2018 में हुए इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में शिवराज सिंह चौहान ने बताई थी, वैसे हुड्डा का धीरे धीरे हरियाणा से प्रभाव कम हो गया है, मैं जब पहली बार रोहतक गया था, तब भुपेंद्र वहां के मुख्यमंत्री थे और इनके चारो ओर सियासी समीकरण साधे जाते थे, आज जब जींद जिले में जननायक जनता पार्टी की रैली में गया , तो वहां के
अध्यक्ष दुष्यंत चौटाला ने हुड्डा का नाम तक नहीं लिया, हरियाणा के अपने दो दिन के अनुभव में मुझे भुपेंद्र और कांग्रेस के दुर्दिन जरूर नजर आएं।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें