प्रेम जंग में जीतना नहीं सिखाता
अभी अभी एक ख्याल आया, खुद को उन आंखों के भीतर महसूस किया, जिनमें कभी मैं समाता था, आंखों की भीतरी भृति से जब धीरे धीरे उसके दिल के नजदीक जाने की कोशिश की, तो उसके यादों के बंद संदूक में एक भी फोटो मेरी नहीं थी, उसमें ढेर सारे रंग बिरंगे चमक धमक वाले लोग कैद थे,
प्रेम में डूबी प्रकृति
जिनकी दुनिया लाल, हरे, नीले गहरे चटक रंगों से सजी हुई सी लगी, मैं तो पूर्णतः कोरा कागज जितना खाली हूं, वह भी पूरा सफेद कागज नहीं, रद्दी को गलाकर बनी रफ कांपी का कागज जैसा हूं, उन चमक भरे संदूक में खुद को खोजना घास के ढेर में सूई खोजने जितना मुश्किल काम है, मुझे उसके दिल की परत दर परत देखना अच्छा भी लग रहा था, पर इतनी रोशनी में मेरी आंखें बंद हो गई थी, अंधेरे में रहने वाली मेरी आंखें उस प्रकाश को देखकर बंद हो गई, बंद आंखों से जब मैंने गलती से उस संदूक को बंद कर दिया तो मुझे बंद आंखों से वह महसूस हुआ, जिसे अपनी असल जिंदगी में मैंने कभी महसूस ही नहीं किया था, वह सुराही के पानी जितना ठंडा कुछ था, जिसे देखकर पवित्रता का वह भाव पैदा हुआ, जो भाव छुटपन में मंदिर में महसूस होता था, मेरी समझ में वह उस खुदा का नूर था, जो हम सब के मन में समाया रहता है, इसीलिए इश्क को सूफी इश्क मिज़ाजी से इश्क मौसिकी की ओर ले जाने वाला रास्ता कहते हैं, जो एक इंसान के शरीर से प्यार करने से शुरू होकर खुदा की बनाई हर चीज से इश्क कराता है, प्यार में जोगी होना यही है, जैसे घनानंद सुजान से प्यार करते करते कृष्ण से दिल लगा बैठे और कृष्ण को भी सुजान कहकर बुलाने लगे. वारिसशाह की कहानी में भी यही प्रेम तत्व समाहित है, जो जंग से दुनिया जीतना नहीं सिखाता है.
प्रेम में डूबी प्रकृति
जिनकी दुनिया लाल, हरे, नीले गहरे चटक रंगों से सजी हुई सी लगी, मैं तो पूर्णतः कोरा कागज जितना खाली हूं, वह भी पूरा सफेद कागज नहीं, रद्दी को गलाकर बनी रफ कांपी का कागज जैसा हूं, उन चमक भरे संदूक में खुद को खोजना घास के ढेर में सूई खोजने जितना मुश्किल काम है, मुझे उसके दिल की परत दर परत देखना अच्छा भी लग रहा था, पर इतनी रोशनी में मेरी आंखें बंद हो गई थी, अंधेरे में रहने वाली मेरी आंखें उस प्रकाश को देखकर बंद हो गई, बंद आंखों से जब मैंने गलती से उस संदूक को बंद कर दिया तो मुझे बंद आंखों से वह महसूस हुआ, जिसे अपनी असल जिंदगी में मैंने कभी महसूस ही नहीं किया था, वह सुराही के पानी जितना ठंडा कुछ था, जिसे देखकर पवित्रता का वह भाव पैदा हुआ, जो भाव छुटपन में मंदिर में महसूस होता था, मेरी समझ में वह उस खुदा का नूर था, जो हम सब के मन में समाया रहता है, इसीलिए इश्क को सूफी इश्क मिज़ाजी से इश्क मौसिकी की ओर ले जाने वाला रास्ता कहते हैं, जो एक इंसान के शरीर से प्यार करने से शुरू होकर खुदा की बनाई हर चीज से इश्क कराता है, प्यार में जोगी होना यही है, जैसे घनानंद सुजान से प्यार करते करते कृष्ण से दिल लगा बैठे और कृष्ण को भी सुजान कहकर बुलाने लगे. वारिसशाह की कहानी में भी यही प्रेम तत्व समाहित है, जो जंग से दुनिया जीतना नहीं सिखाता है.
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