सच्ची दास्तां जिसके सारे शब्द सच की स्याही से लिखे होंगे

चलो एक सच्ची दास्तान लिखते हैं, जिसका एक- एक शब्द सच की स्याही से ही लिखा जाएगा, जिसे लिखने वाले ने भी कभी झूठ न कहा, न लिखा होगा, जिसको पढ़ने वाले ने भी न कभी झूठ सुना या पढ़ा होगा. यकीन मानिए यह कथ्य सिर्फ सच्चे लोगों के लिए है. आटे में नमक जितना या नमक में आटे जितना झूठ मिलाने वालों के लिए नहीं. जो झूठा होगा उसके लिए यहां लिखे शब्द ओझल हो जाएंगे. उसके सामने सच पड़ा होगा लेकिन उसे सिर्फ कोरा कागज दिखेगा. पढ़ने वाले की सच्चाई ही उसे वह शब्द महसूस करा सकती है, जो शब्द सच से उकरे गए हैं. उसी सच से जिसे भगवान की संज्ञा यह मानुष देता है. सब जानते हैं, फिर उस सच को कोई नहीं पढ़ पाएगा, सबसे बड़ा झूठ आज के समय का यही है, कि मैं झूठ नहीं बोलता. वकील अपने मुवक्किल को जिताने में झूठ बोलता है, डॉक्टर अपने मरीज में आस जगाने के लिए झूठ बोलता है. पंडित जी ग्रहों को आगे करके झूठ बोलते है और पुलिस अपने डंडे को दिखाकर करके झूठ बोलती है. बाकि नेताओं का तो सब जानते ही हैं, जीतकर पांच साल वह जिस एक चीज में सबसे अच्छी पर्फार्मेंस देते हैं. वह झूठ बोलने की कला ही है. वैसे एक धंधा बहुत ही अच्छा है, जहां न झूठ बोला जाता है, न सच.



 वहां तो इन दोनों ही रास्तों के बीच का दोराहा खोजा गया है. उन्होंने इसे अर्धसत्य नाम दिया है. इसे बोलने या लिखने वाले खुद को समाज का आईना मानते हैं. जबकि वह है उसी झूठ के सरोवर के कमल जो उसी दलदल में खिलकर भी खुद को उससे अलग बताने की चेष्टा करते हैं. प्रभाष जोशी (जनसत्ता के पूर्व संपादक) ने कहीं कहा था, कि यदि पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा खंभा है, तो मुझे व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को जज करने का अधिकार है. जोशी जी यह नहीं बताकर गए कि पत्रकारिता को जज कौन करेगा? जो भी करेगा तो किस पैमाने पर यहां सत्यता की जांच होगी? वह भद्दी भद्दी गालियां जिन्हें सुनकर लोग कान बंद करने को मजबूर हो जाए वह इन अर्द्धसत्य कहने वालों को दी जाती है. भरोसा कीजिए  हम भावी आधा सच कहने वालों को भी यही गालियां मिलने वाली है. इसलिए सच - झूठ के इस गोरखधंधे में झूठ से मंझना ज्यादा जरूरी है. ताकि झूठ के सरोवर में खिला कमल खुद को अलग न बताये.

नोट:- बोर हो रहा था, इसीलिए यह लिखा है, ज्यादा गंभीरता से न लें. 🙄

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