रिश्ते उलझे धागे से

रिश्तों को समझना सचमुच कितना मुश्किल है, एक पल में अपने पराये के एक शब्द से हम रिश्तों को पुकारने लग जाते हैं. मनुष्य रिश्तों की एक महीन सी डोर पर सवार होकर संबंधों को परखना चाहता है, उसे हर दम अपने मतलब का सामान बटोरना होता है, दुर्गा सप्तशती के दूसरे अध्याय में लिखा है, कि कुत्ता अपने खुद के बारे में सोचता है, पक्षी अपने बच्चों की चोंच में दाना डालकर खुश होते हैं पर मानव सभी के बारे में सोचता है. कुत्ते, पक्षी और मानव के बीच यह अंतर अगर लागू किया जाए, तो बहुतरे मानव कुत्तों और पक्षियों के रूप में बंट जाएंगे, जो थोड़े लोग दूसरों की पीड़ा को खुद का दुख और दूसरो की खुशी में मुस्कुराएंगे वह महात्मा ही कहलाएं जा सकते हैं.

वो सुबह कभी तो आएगी

मुझे समाज में इस समय दो मनोवृत्ति के लोग दिखते हैं, जब वह छोटे शहरों की बड़ी परंपराओं में बंधकर बड़े शहरों में जाते हैं, तो वह अपने पिता, माता, फुफा, ताई की नजर से उस शहर को देखने लग जाते हैं, उन्हें देखकर ऐसा लगता है, जैसे वह जहाज में खजाना लिए समुद्री डाकूओं से बच रहे हो, उनके मन में कुछ कहावतें घर कर जाती है, जैसे लड़की खुली तिजोरी की तरह होती है, लड़के हो भंगेडी, गंजेडी और नशेड़ियों से दूर रहना, वह कुछ समय तक तो अपने परिवार के मूल्यों की खातिर अपनी इच्छाओं की बलि देते रहते हैं, पर एक दिन वह उन उम्मीदों की नाव से कुदकर अथाह जल में अपनी दुनिया तलाशते हैं. परिवार में वह अपनी उन उमंगों को जाहिर नहीं कर सकते हैं फिर क्या है? वह उन साधनों को तलाशते हैं, जिन्हें हमारा समाज वर्जित मानता है. मुझे एक लड़की ट्रेन में मिली थी, वह जबलपुर की रहने वाली है, उसने अपने पिता से सालों इसीलिए बात नहीं की, क्योंकि उसके पिताजी उसे एक लड़के से ब्रेकअप के लिए बोलते थे, बाद में उनका जब ब्रेकअप हो गया तो उसके पापा ने उसे पुचकार कर कहा कोई नहीं बेटा, आगे से मुझसे हर बात शेयर करना, अब वह दोनों बाप बेटी दोस्त हैं. यह किस्सा इसीलिए साझा कर रहा हूं क्योंकि हमारी उम्र की पीढ़ी को परिवार में एक दोस्त की जरूरत होती है, जो कहे बेटा कोई नहीं.
अभी पिछले दिनों हमारी क्लास में एक चर्चा आयोजित हुई थी, वह डिस्कशन उस विषय पर था, जिसे हम स्वीकार कर ही नहीं सकते, मानसिक स्वास्थ्य।
हमारा समाज मानसिक स्वास्थ्य के लिए सिर्फ अध्यात्म की ही शरण में हैं, राजनीति नामा मध्यप्रदेश में जिक्र आया है, कि जब शिवराज सिंह चौहान का मुख्यमंत्री रहते दिमागी बोझ बढ़ने लगा, उनके शरीर का वजन और सिर के बाल धीरे धीरे घटने लगे तो अपने एक नौकरशाह की सलाह पर वह एक आध्यात्मिक गुरु की शरण में चले गए, मुझे मानसिक स्वास्थ्य के लिए अध्यात्म एक सही रास्ता दिखता है पर आज की एकला चले रो की दुनिया में यह पाखंड सरीखा माना जाता है. मुझे ईसाई धर्म का कंफेशन, इस्लाम का जिआरत, सिख धर्म की सेवा खूब भाते हैं, मंदिरों के संकीर्तन दिल को सुकून देते हैं, मेरी मम्मी लगभग रोजाना संकीर्तन में शामिल होती है और मुझे उनकी ताजगी का राज वह ही लगता है.
एक किस्सा जो मेरी आंखों के सामने का है और जिंदगीभर में उस किस्से से प्रेरित रहूंगा, वह एक कैदी की आपबीती है, जो उसने जेल में सुनाई थी, उस कैदी ने कुछ सालों पहले एक व्यापारी का मर्डर कर दिया था, उसका प्लान अपहरण कर पैसे लूटना था पर उसने मर्डर भी कर दिया, जब उसे गिरफ्तार कर जेल में ले जाया गया तो उसे गंभीर कैदियों की तरह पांव में बेड़ियों के साथ रखा गया, वह अपनी विधवा मां की इकलौती संतान था, गांव से आने वाले उस युवक को मां को हत्यारे की मां कहा जायेगा, अब मेरा जीवन खराब हो गया, जैसे ख्यालों में इस कदर जकड़ा कि उसने आत्महत्या की कोशिश की, वह इस कोशिश में तो फेल हो गया पर जेल में बने मंदिर की शिवलिंग से वह लिपटकर रोने लगा, उसने कहा भगवान तुमने अब जीवन दिया है, तो उसे में भोगुगा और उसने खुद को बदलना शुरू कर दिया, उसने जीवन में उससे पहले कभी कोई रचनात्मकता का काम नहीं किया था, पर आज वह पेंटिंग करता है, मूर्ति बनाता है और वह अपनी जेल में प्रसारित होने वाले रेडियो कार्यक्रम में उदघोषक के तौर पर काम कर रहा है, वह बता रहा था, भैया मेरी मां जेल में काम करती मेरी फोटो को अखबार से काटकर सहेजती है और अब मेरा जीवन बदल गया है.
(इति)


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