सोचता हूं घर छोड़ दूं

सोच रहा हूं घर छोड़ दूं, घर में अब वह किवाड़ ढंग से खुलती नहीं है, चटखनी अंदर से बंद भी कर देता हूं, तो एक बार की जोर आजमाइश से दरवाजा धड़ाक से खुल जाता है. सोचता हूं घर छोड़ दूं, बारिश के कहर में घर का रंग कालिख में तब्दील हो गया है, दीवार पर टंगी सभी तस्वीरें दीमक की जद में हैं, मेरे घर का सोफ़ा पानी के बहाव में भीग गया है. सोचता हूं घर छोड़ दूं, मच्छरों ने दिमाग खराब करके रख दिया है, खुले बदन लेटता हूं, तो मेरे शरीर पर लाल रंग के चट्टे उभर आते हैं, इन मां के जनों ने मेरा खून चूस कर रख दिया है. सोचता हूं घर छोड़ दूं, घर में बिजली का मीटर उखड़ गया है, पंखे, टीवी सब सिर्फ साजों सामान बनकर रह गए हैं, मोबाइल चार्ज करने भी पड़ोसी के घर भागना होता है. सोचता हूं घर छोड़ दूं, मेरा घर अब मकान में तब्दील हो गया है, जहां अब सिर्फ वीराने का ही राज है, हर तरफ ईट सीमेंट के बने कमरों से रिश्ते गायब हो गए. सोचता हूं घर छोड़ दूं, मेरा दिन तो मोबाइल की अलार्म से वॉट्सएप की आखरी चेट तक ही है, दोस्तों के दिल भी फेसबुक के रिएक्शन में ढूंढना पड़ता है. सोचता हूं घर छोड़ दूं, क्योंकि अब मैं एक मशीन बन गया हूं, नई मशीनें पहले शोरूमों में ही चमका करती है. तो मुझे वही चार्ज होने दो. सोचता हूं घर छोड़ दूं.

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