तुम ही रखवाले हम बुजुर्गों के

निर्मल वर्मा ने एक किताब लिखी है, अंतिम अरण्य उस पुस्तक में एक अधिक उम्र का पात्र जिसे आप बुर्जुग कह सकते हैं, वह रंगमंच के नायक की तरह बार बार हमारे सामने अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है, उन्होंने उस उम्र के उपर अपनी कलम चलाई है, जिसको देखते समझते और महसूस सभी करते हैं पर लिखते, कम ही लोग हैं, कहते हैं न bed choice make good story बुर्जुगों की व्यथा अभी आपबीती से जगबीति बन चुकी है, मुझे श्रवण कुमार की कहानी बहुत पसंद हैं,एक बालक अपने माता पिता का जिस तरीके से ख्याल रखता है, उन्हें कांवड़ में बिठाकर तीर्थ घुमाता है, वह किसी आदर्श से कम नहीं है, उस श्रवण कुमार को मारने वाला एक युवा दशरथ था, जिसने आखेट के चक्कर में दो अंधे बुजुर्गों की दुनिया उजाड़ दी, यह भी लिखा हुआ मिलता है, कि वह दशरथ जब खुद के बुढ़ापे में आता है, तो अपने पुत्र के वियोग में उनकी मौत हो जाती है, अगर उस कहानी को मैं लिखता तो श्रवण के माता-पिता का पालन पोषण मैं दशरथ से करवाता खैर मैं लेखक नहीं था.
फिर

वृंदावन में मिली बुजुर्ग अम्मा


पुत्र वियोग का कथ्य दूसरी घटना से निकालने के लिए श्रवण कुमार का मरना भी जरूरी था, मुझे कृष्ण भी इसीलिए पसंद नहीं है, क्योंकि वह मेरे आदर्श की परिभाषा में फिट नहीं बैठते हैं, जिन यशोदा और नंद बाबा ने उनको अपने जिगर का टुकड़ा समझ कर पाला था, उन्होंने अपने असली मां बाप के मिलने के बाद उन्हें पूछा तक नहीं, मैं कृष्ण की द्वारका में जब दर्शन करने गया तो मैंने देखा कि वहां उनकी मां देवकी का मंदिर था पर उनको पालने वाली मां यशोदा का मंदिर नहीं था, बाद में थोड़ा छानबीन करने के बाद पता चला कि कृष्ण मथुरा जाने के बाद बस एक मर्तबा ही यशोदा जी से ही मिले हैं, यह सब मैं इसीलिए लिख रहा हूं कि कल इन्ही कृष्ण के मंदिर के बाहर (बांके बिहारी मंदिर) मुझे एक अम्मा मिली, एकदम पतला बदन, मुंह में एक भी दांत नहीं, ठोड़ी पर गुटखा लगा हुआ था, जो कि उसके मुंह से बाहर गिर गया होगा, वह मेरी तरफ आई और कुछ धीमी आवाज में कहने लगी, उसके हाथ में एक पचास का नोट और चंद रूपए दिख रहे थे, दूसरे हाथ से वह अपनी लाठी थामी हुई थी, कम दिखने के कारण वह लाठी का हैंडल गलत तरीके से पकड़ी थी, उसके हाथ में बंद रूपए बता रहे थे, कि वह मांगने का काम करती है, मैंने उसके एक हाथ को अपने हाथ से थाम लिया, कि हां अम्मा बताओ कैसी हो, बोली अच्छी हूं बेटा, उसने मुझे बताया कि वह आगरा कि रहने वाली है और उसके बच्चों ने उसे घर से बाहर निकाल दिया है, वह बता रही थी कि रोजाना दो ग्लास  चाय पी लेती हूं, थोड़ा सा दूध पीकर तो मेरा पेट ही भर जाता है, उस अम्मा को अंग्रेजी कैलेंडर समझ में नहीं आता है इसीलिए बता रही थी सावन में यहां आई थी, अभी कौन सा महीना चल रहा है? पर भारतीय कैलेंडर मुझे समझ नहीं आता है, लेकिन याद था कि अभी कार्तिक खत्म हुआ है, उसने बातों ही बातों में मुझसे कहा मैं जी तो रही हूं, यह समझ नहीं आता है, कि मरने के बाद मेरी लाश का क्या होगा? मेरे पास उसके सवाल का जवाब नहीं था. मैंने बहुत देर तक उस अम्मा को देखा, उसकी ढलती काया में अपने बुजुर्गो को महसूस किया, उस उम्र में मैं कैसे रह पाता, यदि उस अम्मा कि जगह होता, शायद इतनी जिंदादिली मुझ में नहीं है. उस अम्मा कि तरह मैं दुआएं नहीं दे पाता.

नोट: मैंने उस घटना पर वॉट्सएप पर स्टेटस डाला था, जिसे जीतू भैया ने देखकर मुझे सुलभ सर्विस फॉर विंडोज का नंबर दिया, उन्होंने खुद से उनसे संपर्क भी किया है, भैया इसी विषय पर पीएचडी कर रहे हैं, मेरी संस्था के प्रतिनिधि से फोन पर बात हुई है, वह इन अम्मा से बात करेंगे यदि वह इनके साथ रहने को राजी हुई तो, मरने के बाद उनकी लाश का क्या होगा? यह सवाल उन्हें सताएगा नहीं.

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