कल्पनाओं के पक्षी

चलिए कल्पना के पक्षियों की उड़ान को नापते हैं, पिछले दिनों एक किताब पढ़ी उसमें ककनूस पक्षी का जिक्र आया था, चील की लंबाई - चौड़ाई का यह पक्षी थोड़ा अलहदा है, इसके पंख चमकीले, किरमिची और सुनहरे होते हैं। इसके स्वर में संगीत होता है। इसकी आयु कम से कम पांच सौ वर्ष होती है। कुछ विद्वान इसकी आयु का अनुमान सत्तानवे हजार दो सौ वर्ष लगाते है। जब इसकी आयु की अवधि शेष रहने लगती है, यह सुगंधित वृक्षों की टहनियां इकट्ठी करके एक घोंसला बनाता है और यह घोंसला सहित उसमें जल जाता है। इसकी राख में से एक ककनूस जन्म लेता है, जो सारी सुगंधित राख को समेटकर सूरज के मंदिर की ओर जाकर राख को सूरज के सामने चढ़ा देता है। मिस्र के पुरातन पक्षी का घर उधर बताया जाता है, जिधर सूरज उदय होता है, इसीलिए लोग इस पक्षी का स्थान अरब या हिंदुस्तान मानते हैं, हिंदुस्तान अधिक क्योंकि सुगंधित वृक्षों की टहनियां हिंदुस्तान की भूमि के साथ जुडती है। ककनूस को लैटिन के एक कवि ने रोमन राज्य से संबंधित किया है, कुछ पादरियों ने इसे क्राइस्ट की मृत्यु और उसके पुनजीर्वित होने की वार्ता से जोड़ा है। जब मैं यह पढ़ रहा था मुझे हमारे आध्यात्मिक पक्षी जटायु की याद आई, जो बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म में पक्षीराज है इंडोनेशिया से लेकर मॉरिशस तक यह विष्णु के वाहन के तौर पर पूजे जाते हैं, घरों में पूजास्थल में रखी घंटियां इन्हीं का प्रतीक है. इस पक्षी के एक भाई है, जिनका नाम अरूण है, वह सूरज के रथ पर हमेशा सार्थी के तौर पर तैनात रहते हैं, इनके दोनों बेटे जटायु और सम्पाति रामायण के पात्र हैं, जो सूरज की ओर उड़कर जाने की कोशिश करते हैं और इस कोशिश में संपाति के पंख जल जाते हैं, वही जटायु वह व्यक्ति हैं, जिसका राम ने दंडकारण्य के जंगल में अंतिम संस्कार किया था। इन पक्षियों की उड़ान की कल्पना के बारे में जब सोचता हूं, मुझे मानव की वह अधूरी ख्वाहिश याद है, जिसमें वह पक्षियों से इसलिए इर्ष्या करता है क्योंकि वह उनकी तरह उड़ नहीं सकता, धरती तो उसने सारी कब्जा ली हैं पर मुक्त गगन को देखकर उसको वहां भी अपनी पहुंच बनानी है.

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