आईआईएमसी तक आने का रास्ता इतना आसान भी नहीं है

मैं आईआईएमसी का छात्र हूं, पिछले साल जब माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय से बैचलर करके पास हुआ, तो आगे क्या करना है? यह सवाल सर पर था, एक दोस्त ने बताया कि जामिया में पत्रकारिता का डिप्लोमा होता है, चले जाओ आगे का अच्छा स्कोप है, मैंने इंट्रेस दिया. जिस दोस्त के साथ में जामिया का इंट्रेस देने आया था, उसने कहा भाई आईआईएमसी उससे भी उम्दा संस्थान है, वहां का फार्म भर दे. मैंने यहां का प्रोस्पेक्टस उठाकर देखा तो 79,000 रूपए यहां की फीस थी, मेरी माली हालत ऐसी नहीं थी, कि मैं यहां पढ़ सकूं, सोचा फार्म भरकर तो देखते हैं, जब फार्म देखा तो एक हजार रूपए का एक पाठ्यक्रम का फार्म था, फिर अगर इंट्रेस निकल जाता तो दिल्ली जाने का खर्चा अलग से, अपनी जेब पढ़ने की इजाजत वैसे भी नहीं दे रही थी. दादी की मौत के बाद मेरे पास कोई आय का साधन भी नहीं था। दिमागी गणित फिट करके यहां फार्म नहीं भरा, उस समय विश्वविद्यालय से ईटीवी में प्लेसमेंट हो गया था. सोचा आगे कि पढ़ाई प्राइवेट इग्नू या भोज से डाल देंगे। पढ़ाई की पढ़ाई हो जाएंगी और नौकरी की नौकरी भी। अपन झोला उठाकर नरसिंहपुर चल दिए। वहां पर पत्रकारिता की हालत देखकर मन उबने लगा, मैं ग्रामीण अंचल के माहौल से खुश था लेकिन अपने काम से संतुष्ट नहीं। मैं वहां रह रहे पत्रकारों में खुद का भविष्य देखकर घबरा रहा था, या तो मुझे वसुली करना सीखना पड़ता या मुफलिसी में स्वाभिमान की झूठ-मूठ की रोटी खाकर सोना पड़ता। एक दिन ताव में आकर उस नौकरी को अलविदा कर दिया, नौकरी छोड़ने का कारण आगे पढ़ने को बताया था, उस समय मुंह से यही निकला कि आईआईएमसी जाकर आगे कि पढ़ाई करूंगा। इस काम करने के दौरान मुझे इस संस्थान की मीडिया में धाक की खबर लग गई थी। अब मेरे पास थोड़ी सी पूंजी इकट्ठी हो गई थी, सोचा इससे थोड़ी मदद मिल जाएंगी बाकी इधर- उधर से जुगाड़ लिया जाएगा।


यहां का फार्म भरा, इस बार जब प्रोस्पेक्टस देखा तो हिंदी पत्रकारिता पाठ्यक्रम की फीस 79000 से 95500 हो गई थी, फार्म भरकर एग्जाम देने से लेकर इंटरव्यू तक का सफर इतना कठिन नहीं था, जितना कठिन एडमिशन से पहले फीस की पहली किश्त 52000 के रुप में भरना था, जब अपना नाम यहां आएं रिजल्ट की पहली सूची में देखा तो इतनी खुशी नहीं हुई, जितना दुख बोल्ड अक्षरो में 52000 इतने दिनों में भरना है, देखकर हुई। खैर मैंने अपनी फीस दादी की पेंशन से बची जमापूंजी को जोड़कर बनाई एफडी को तोड़कर चुका ली, रिजल्ट में नाम उन संभावित बच्चों में था, जिन्हें होस्टल मिल सकता था, सोचा सरकारी संस्थान है, होस्टल फीस कम होगी. जब यहां आए तो ग्यारह हजार रुपए (लगभग) का एक लिफाफा संस्थान के खाते में जमा किया, जो कि यहां एक सेमेस्टर तक का हॉस्टल का किराया था. अभी मैं सालभर यहां पढ़ने का खर्च वहन कर सकता हूं, मुझे लगा यहां तक पढ़ने आना ही मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है, मेरा यहां तक का सफर मेरे खुद के लिए काफी प्रेरणादायक रहा, लेकिन मेरे जिन दोस्तों को हॉस्टल नहीं मिला था, उनके माता पिता भी अपना पेट कांट कांट कर यहां भारी रकम अपने बच्चे को पत्रकार बनाने के लिए भेजते हैं.  लेकिन अभी जनवरी में फिर पैंतालीस हजार के लगभग राशि जमा करनी है, कई दोस्तों के चेहरे अभी यहां मुरझा हुए से दिखते हैं. संस्थान में साथी इस संस्थान में गरीब के बच्चों के पढ़ने के लिए धरने पर हैं, उन्हें मीडिया ने भी अच्छी खासी कवरेज दी है। काश हमारे देश में पढ़ने के लिए सर्दी में स्टूडेंट को सुकुड़ना नहीं पड़ता, मुझे इन दोस्तों को देखकर लग रहा है किसी गरीब बच्चे को इस संस्थान में एडमिशन लेने से पहले महंगी फीस के बारे में सोचना नहीं पड़ेगा.



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