मैंने कलम और तमंचे में से कलम चुनी


 जिंदगी में सुख-दुख एक हिस्सा है, जिसे सहकर ही कोई इंसान पुरा हो सकता है. कोई भी समाजशास्त्री इन दोनों ही भावों की कोई तय परिभाषा दे नहीं सकता हैं. वही जिसने इसके चरम को  छुआ है। या तो वह साधू हो सकता हैं या अपराधी बन जाता हैं. आईआईएमसी में भी एक छात्र ऐसा है, जिसके सामने उसकी छोटी सी उम्र में एक ऐसा पड़ाव आया, जहां उसे तमंचे और कलम में से किसी एक चीज को हाथ में पकड़ना था. कलम उसका भविष्य बना सकती थी, वही तमंचा उसको वह बदला दिला सकता है, जिसके सहारे वह उस खाई को पाट सकता था, जिसने उसे उसके पिता से उस उम्र में दूर किया, जब उसके लिए उसकी मां का आंचल ही उसकी दुनिया थी. उस नौनिहाल को आज भी अपने पिता की यादें उस वर्षों पुराने सपने जैसी लगती है, जिसमें हकीकत और कल्पना का अंतर देखने वाला व्यक्ति नहीं बता सकता है.

रेडियो बुलेटिन पढ़ता यतेंद्र


वह बच्चा आज आईआईएमसी का छात्र है. जिसके पिता आज से बीस साल पहले गोलीबारी की एक घटना में घायल हो गए. वह गांव के प्रधान थे. उनकी लाश खेत में पड़ी थी. उनको मारने वाला पास के गांव का ही एक व्यक्ति था. जिसे वह बच्चा पहचानने लायक उम्र का होने के बाद अपने बाप के कातिल के तौर पर जानता था. वह छात्र आज रेडियो टीवी पत्रकारिता विभाग में पढ़ता है, वहां अपराध पत्रकारिता की क्लास में जब शिक्षक उन्हें हत्या की खबरों को कवर करते समय ध्यान रखने योग्य बातें बताते हैं. तो उसका मन कितना कचोटता होंगा। सोचिए क्या गुजरती होगी? उस जवान हो चुके लड़के पर जब वह उस रास्ते से गुजरता होगा जहां उसके पिता की हत्या होने की बात उसे लोग बताते हैं. वह लड़का मेरठ के अटोला गांव का यतेंद्र पुनिया है. जिसकी फेसबुक पर कवर फोटो आज भी उसके पिताजी की वह फोटो है, जो उन्होंने वैष्णो देवी जाकर खिंचाई थी. अज्ञेय अपनी किताब शेखर एक जीवनी में लिखते हैं कि  “किसी परिजन के जाने का वियोग व्यक्ति को वह शून्य दिला सकता है, जो ऋषि मुनियों को सदियों के ध्यान के बाद भी नहीं मिलता हैं.” उस शून्य में यतेंद्र भी खूब डुबा होगा, जहां उसने अपने पिता को महसूस किया होगा, स्कूल की पैंरेस मीटिग में उनके न आने का कारण पूछा होगा. उसने अपने पिता को बस घर में लगी उन तस्वीरों में देखा है, जहां वह उन्हे अपने मन की सुना तो सकता है पर घंटो के इंतजार के बाद भी वहां से उत्तर में सिर्फ मौन ही मिलेगा। यतेंद्र के दोस्त धुव्र मिश्रा बताते हैं कि "मैं पुनिया के घर गया हूं उसकी मम्मी से मिला हूं, वह उस माहौल से आता हूं जहां लोग पढ़ाई से कट्टी करके बैठे हैं, पुनिया इसीलिए पढ़ता है, क्योंकि उसे अपनी मम्मी को कुछ बनकर दिखाना है."

यतेंद्र की फेसबुक वॉल पर उसके पापा की कवर फोटो जो अभी भी लगी हुई है

हमारे समाज में पिता को आकाश रूपी उस छत के रूप में देखते हैं, जिसके बिना बच्चा उस फुटपाथ पर पड़े राहगीर जैसा होता है, जिसे लू की गर्मी सीधे लगती है और सर्दी के दिनों में कड़ाके की ठंड भी. कहते हैं, जिसके पांव न फटी बिवाई वह क्या जाने पीर पराई. जहां आजकल की युवा पीढ़ी गैंग्स ऑफ वासेपुर के उस संवाद को जीती दिखती है, जिसमें नायक की मां कहती हैं, ” फैजू तेरा खून कब खोलेगा?”  जिसके ज़बाब मैं नायक कहता है. “बाप का , दादा का, भाई का सबका बदला लेगा रे तेरा फैजू.” यह संवाद पढ़ने वाले इस लाइन को मजाक के तौर पर ले सकते हैं. वही यतेंद्र और फिल्म के नायक मैं यही बारीक सा अंतर है. परवरिश और मां. पुनिया बताते हैं कि उनकी मां संधु गोत्र से आती है, जो गोत्र भगत सिंह का भी था. भगत सिंह के गोत्र वाली उनकी मां ने बचपन से उन्हे वह परवरिश दी है, जो कलम और किताब को दुनिया में सबसे बड़ी ताकत मानती है. यही कारण है कि आज पुनिया संस्थान में जब गांधी जयंती पर गांधी की सीखों को बोलते हैं, तो वह भी नहीं जानते हैं, कि उनमें एक गांधी रहता है, जो मुझ जैसे कई लोगों को प्रेरित करता है.

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