हे वतनपरस्तों यह मरने का नहीं, देश के लिए जीने का दौर है....

हे वतनपरस्तों यह मरने का नहीं, देश के लिए जीने का दौर है....

अब इंकलाबी नारों से नहीं पटी यह जमीं,
पार्टियों की राजनीति से घायल है यह आसमां
अब शहीदों की शहादत एक मजे की बात न
बैठे कुर्सियों पर वह जो बांटते हिंदोस्तान.
काश वो दौर लौट आए, सुखदेव ने भगत से कहा
भगत बोला यार चल फिर जिंदा इंकलाब करते है
हे वतनपरस्तों यह मरने का नहीं, देश के लिए जीने का दौर है....

गांधी के सपनों का भारत, अब इंडिया बन गया
देख लाठी खा रहा वो युवक गांधी तो है
करुणा की कविता विनाश का नासूर बन
सड़कों पर देख किसान चिल्ला रहा
रो रो भारत माता का गला चुप हो गया
या लाउंडस्पीकर की आवाज में खो सा गया
मन की बाते छोड़ मेरा वतन
सांप्रदायिकता की आग में जल सा गया.
हे वतनपरस्तों यह मरने का नहीं, देश के लिए जीने का दौर है....

खुदीराम की आत्मा गई जब जेल में,
 वहां जाकर आत्मा भी मर सी गई
अब नेता देश के हमारे बिक से गए
मरते तो तब वह देश के लिए
जब जीते वो कभी इस धरा के लिए.
शायद उजाला होने को है
तभी तो अंधेरा हर तरफ पसरा हुआ.
हे वतनपरस्तों यह मरने का नहीं, देश के लिए जीने का दौर है....

वो बुढ़ी आंखे भी अब बुझ ही गई
जिसे रात में अंग्रेज पुलिस दिखा करती थी
तड़पते तड़पते उसकी अंगड़ाईयां,
लाठियां देश की खातिर खाई याद करती थी
वो दो दिन ही साल में जिया करती थी
बाकि दिन तो वो लाश बनकर रहा करती थी
बोलती कुछ तो किसे ए चमन
उसकी आवाज देश की भूमि की तरह गुम हो गई
जब संगोष्ठियों से वतन गायब है,
कैम्पस में लड़ाई नारों की है,
वह मरी भी तो एक गम राख में रह गया
सबने सत्य राम को कहा
 वह जय भारत माता की कहती रही.
दुश्मनों की जरुरत किसे जहां में,
मेरा भाई ही मेरा घर जला गया
हे वतनपरस्तों यह मरने का नहीं, देश के लिए जीने का दौर है....

तिरंगा भी अब हरा और कैसरियों में है पटा
मेरा मां का सीना टो टुकड़ों में है सटा
मैं क्यों न रोऊं ए यार तु मुझे यह बता,
जब युवा इस देश का, धर्मो से है घिरा
ईद की ईदी अब हिंदू घरों से महरूम हो गई
राजनीति इफ्तारों तक सीमित रह गई.
चलते चलते अंबेडकर पर निगाह जो पड़ी
रास्तों पर दलित सवर्ण जाति है खड़ी
 मुश्किलों में है हिन्द की परछाई अब
 देशभक्त है गायब, अंधभक्त हर जगह
पार्टियां है सभी मूल खो ही गई हे
 वतनपरस्तो यह मरने का नहीं
 देश के लिए जीने का दौर है....
एक समर 1857 का फिर कर दो बहादुर
लक्ष्मीबाई परेशान है झांसी में अब
पाण्डे सेना में मंगल को खो ही गया
सरकारें गदर की पनाहगाह है
टीवी मोबाइल की जद में मेरा जहां है,
स्कूलों में बच्चे परेशान अब
बाथरूमों में गुटखो की पींक पड़ी
देशभक्त और द्रोही यह दो कौमें है.
जो खुद को और दूजे को सर्टिफिकेट दे रही
हे वतनपरस्तो यह मरने का नहीं देश के लिए जीने का दौर है....

अब चंद्रशेखर आजाद कहा है बचा
उसको तिवारी जो तुमने बना ही दिया
अवंतीबाई की जाति थी भारतीय
तुमने उसको लोधी में भूला दिया
सरदार पटेल का गला अव रूद्ध सा गया
लौह पुरुष मूर्ति में ही रोने लगे
पटेल की लंबी मूर्त है जो बड़ी
यूनिटी को हर तरफ यह खोज रही
फिरकापरस्त राज करते है हिंदोस्तान
अलीगढ़ में जिन्ना अब हमें है दिखे,
शिवानी टोकरी में बैठ कर वापस
लुटियंस में औरंगजेब को खोज रहे
इतिहास लौट के आया मगर
वर्तमान में जीना सब भूल गए
नेहरू ने कहा टो टूक सुनो
मैंने वॉट्सएप पर तुमसे कुछ कब है कहा
वाजपेई और लोहिया की सीखे राख बन अब है रह गई
हे वतनपरस्तो यह मरने का नहीं देश के लिए जीने का दौर है....



उपनिषद का रूप है गीता पढ़ो
कृष्ण ने अर्जुन को है सब बतला दिया
चांद की चांदनी से ही सीखों ज़रा
व्रत करवा चौथ का है खुलवा दिया
कल ईद मनी थी इसे देखकर
आज सुहागिन उम्र पति की बढ़ा रही
अब अखबारों में कहा विद्यार्थी
जो कलम लहू से सींचते थे
अब टीवी में बैठे है मौलवी
फतवों से भरी सियासत बड़ी
हे वतनपरस्तो यह मरने का नहीं देश के लिए जीने का दौर है....



दारा शिकोह हो या गफ्फार खां
सभी को तुम पाकिस्तान भिजवा रहे
सोचना कभी फुरसत में तुम
पा रहे हो या सब खो चुके तुम
वादे किए स्मार्ट सिटी के
और बस नामों में अतीत बना रहे तुम
नाम अयोध्या तुमने पा लिया पर
राम को कहा से वापस लाओगे
माता सीता गई वन में जब
राम भी बस वही बस गए
हनुमान कहे तब सीता से तब
मां सिंदूर मुझ पर चढ़ा गई तुम
राम तो गए तुम्हारे साथ वही
मैं कैसे उम्र बढ़ाऊं यहां
हे वतनपरस्तो यह मरने का नहीं देश के लिए जीने का दौर है....

जिंदा कौमें वहीं जो नारों में नहीं
असलियत में जिया करते हैं
स्कूलों में पढ़ो, अखाड़ों में लड़ो
गलियों को देश की गाड़ियों से न भरो
जब सरकारें आती है वोट‌ मांगने
तब हाथ जोड़कर प्रश्न भी करों
यह याद रखना मेरे दोस्त ज़रा
जहां नमस्कार सूर्य को तुम करते हो
वही बैठकर भूमि को चूमकर
वह भाई तुम्हारा नमाज पढ़ता है
तुम खूब लड़ो पर बातों से
बातों में गया, आंखों में शर्म
दिल में देशभक्ति सदा रखना तुम
बस इतना जुल्म मत कर देना तुम
कि प्रलय आ जाएं यहां भूमि पर
हे वतनपरस्तो यह मरने का नहीं देश के लिए जीने का दौर है....

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