सांप्रदायिकता के रंग में रंगी दिल्ली ढूंढ रही इंसान
सांप्रदायिकता के रंग में रंगी दिल्ली ढूंढ रही इंसान
तू हिन्दु बनेगा ना मुसलमान बनेगा, इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा, यह लाइन यू तो फिल्म देवता के एक गीत की है. आज यह लाइन दिल्ली के उस दौर में काफी मार्मिक होती दिखती है, जहां सारी लड़ाई मजहब की दीवार पर साम्प्रदायिकता के रंग से रंगी गई थी. रह रह कर 72 घंटे चली इस हिंसा के ज्वार में हमने क्या खोया ? जब इस सवाल पर मंथन दिल्ली के दंगा प्रभावित क्षेत्रों में ढूंढने की कोशिश की जाती है, तो तिरंगे के रंग को भगवा और हरे से पाटने की गुस्ताखी साफ नजर आती है. हमारे पूर्वजों की गंगा जमुनी तहज़ीब 42 जिंदगियों के खून से धुल गई है. कहते हैं दिल्ली देश का दिल है, जब दिल धड़कता है, तो शरीर जिंदा है, यह अहसास होता है, वही दो रोज पहले जब देश के दिल की गलियां पत्थर और ईट के टूकडों से पटी पड़ी थी. तब देश चैन की सांस कैसे जी रहा होगा, देश खुश होने का दिखावा कर रहा होगा, वही वह भीतर ही भीतर दर्द से कराह रहा होगा, वह दर्द जो मन को कचोट देता है, किसी अपने के खोने की वह पीड़ा जो किसी अपने के चेहरे को बस यादों में ही देख सकती है. हकीकत में नहीं. कहते हैं दुनिया में सबसे भारी किसी परिजन की लाश होती है, जिसे कंधा देना सबसे डरावना एहसास होता है.
विरोध जायज है, खिलाफत की जा सकती है, सामने वाले को घेरना भी सही है, पर किसी के खून के एक कतरे के सामने सारे हठ छोटे हैं,चाहे वह कितना लोकतांत्रिक क्यों न हो? जब एक भी खून की बूंद इस धरती पर गिरती है, तब सिर्फ एक दर्द भरी आह नहीं निकलती है, उसके साथ उसके परिवार की कई चीखे भी निकलती है. हम किस ओर जा रहे हैं हमने तो चीखों के ज्वार को मौत के कभी न मिटने वाले अहसास से जोड़ दिया है, मौत भी कोई एक नही दो अंकों की इस मौत को हमने देश की राजधानी दिल्ली में भोगा है. क्या कोई कानून लाशों के ढेर पर लिखा जा सकता है ? किसी कानून के आधार में रक्त की स्याही भरी हो सकती है क्या? अगर ऐसा है तो हम लोकतंत्र में तो नहीं जी रहे हैं. हमारे पूर्वजों की भाईचारे और अहिंसा की सीखों को आज हमने खून के छींटों से धो दिया है. दुख होता है ऐसे लोगों को देखकर जिनके लिए जान की कीमत इतनी सस्ती है. आपको ऐसा भारत अच्छा लग सकता है. हमारे लिए एक जान की कीमत आज भी हिंदू- मुस्लिम के ढांचे से काफी ऊंची है, इस हिंसा में जितनी जाने हमने खोई है, उस हत्या के पाप को धोने के लिए चार धाम की यात्रा और हज करना भी नाकाफी है.जिन लोगों की दुकान जली हैं, जिनकी वर्षों की मेहनत हिंसा के ज्वार के आगे बौनी साबित हुई.
हमने इन दंगों में वो सब खो दिया है,जिसपर हम लाखों लाख भारतीय गर्व करते थे, जिनके लिए जनेऊ और जालीवाली टोपी से ऊपर तिरंगा होता था. इस शहर में मरे वह 42 लोग अपनी जिंदगी के खत्म होने के पहले दूसरो के हाथों मारे गए थे, उनके परिजनों के लिए दंगा शब्द कोई अखबार की सुर्खी जितना साधारण शब्द नहीं है, उनके लिए दंगा वह अहसास है, जहां सब कुछ चला जाता है, दुकान में आग लग जाती है, घर की दीवारों की ईंटों को तोड़ तोड़ कर दंगाई उन सड़कों पर फेंकते हैं, जिन राज्यों से उनके घर के चिराग स्कूल आते जाते हैं. उनके स्कूल, उनके प्रार्थना घर सब शमशान घाट की आग में तबाह हो जाते हैं. जब घर शमशान में तब्दील होता है, उसे दंगा कहते हैं. हिंसा की चिंगारी आज भी उत्तरी पूर्वी दिल्ली के क्षेत्र में भड़क रही है, मुस्तफाबाद, शिवनगर, जाफराबाद जैसे इलाके में अभी भी लोगों की आंखों में वह दर्दनाक मंजर बस सा गया है. इन दंगों में कही लोग हिन्दू मुस्लिम में बटे बटे से नजर आते हैं, तो की इन दुर्दिनो में उम्मीद की रोशनी बनकर उभरते हैं. शिवविहार इलाके में स्कूल में हुई हिंसा का चश्मदीद जो संयोग से एक हिंदू घर में पैदा हुआ था, कहता है "यहां मुस्लिमों ने छतों से गोलियां दागी है." जिस व्यक्ति ने यह कहा उसने दंगों में अपनी पूरी जमा-पूंजी एक दुकान के रूप में जलती हुई अपनी आंखों से देखी है. एक माथे पर बिंदी लगाए हुई हिंदू महिला कहती हैं " सोमवार हम पर कहर बनकर गुजरा है."
दंगों के बाद से अबतक कुछ लोग घर में बंद हैं, उनका बंद कमरा उस खौफ की जीती जागती गवाही है, जो वह जी रहे हैं, वह लोग धर्म से मुस्लिम है. घरों से आंसू जब चिल्लाहट में तब्दील होकर एक चश्मदीद की नजर एक खुली खिड़की से झांककर रही आंखों से मिली तो उसने कहा "हम सोमवार से घर में बंद हैं." बाहर फूटते उन्माद के ज्वालामुखी से घबराए वह मुस्लिम कहते हैं "हम घरों से भागने को मजबूर हैं, शिवविहार की हमारी मस्जिद को अपवित्र कर दिया गया है, एक क्षेत्रीय बीजेपी नेता के भतीजे को हमने आग लगाते हुए देखा है." कहते हैं जब दर्द हद से बढ़ जाएं तो खुदा की रहमत भी नहीं रहती है. कुछ घरों में नवजात बच्चों के लिए दूध ले जाने का काम भी पुलिस कर रही है, जिस पुलिस से लोगों को शिकायत है कि जब सोमवार को मौत यहां नंगा नाच कर रही थी. तब पुलिस के कान में जूं तक नहीं रेंगी. उनकी शिकायतों के साथ ही पुलिस चौकियों पर बाल्टी भर-भर कर सब्जी पुड़ी से रहवासी इन कर्मियों के खाना खिला रहे हैं.
वो सुबह हमी से आएगी
वो सुबह जिसका दिल्ली को इंतजार है, वह उम्मीदों वाली सुबह रविकांत उपाध्याय और रहमान जैसे लोगों के किस्सों में दिखती है. मुस्तफाबाद का रहने वाला रविकांत एक मुस्लिम दुकानदार के यहां काम करता है वह बताता है " दंगे में मेरे मालिक का तकरीबन दस लाख का नुक़सान हो गया है, तीन दिन से बाजार भी बंद हैं, मेरे मालिक और मैं एक परिवार के सदस्य हैं, हम एक दूसरे की सलामति की दुआएं मांगते हैं."
वही 28 वर्षीय रहमान जो दो नौनिहालों के पिता है, उन्होंने अपने हिंदू मालिक बाबूराम के लिए अपने घर उन्नाव जाने से मना कर दिया है, रहमान पिछले पन्द्रह वर्षों से यही रहता है और श्री राम कॉलोनी में पड़ने वाले बाबूराम के घर के नीचे बनी बैग बनाने की फैक्ट्री में काम करता है. यह इलाका मुस्लिम बाहुल्य इलाका है, बाबूराम बताते हैं जब हिंसा हमसे चंद दूरी पर भड़क रही थी तब मेरे पड़ोसी और रहमान ने मुझसे कहा "हम जान दे देंगे तुम्हारे लिए लेकिन तुम कहीं मत जाना." यह उस दौर की बात है जहां हिदू और मुस्लिम इन दोनों ही कौमों के लोग दंगो में घर छोड़ने को मजबूर हैं. रहमान कहता है मैं जानता हूं कि अगर मुझे कुछ हो गया तो मेरे मालिक ही सबसे पहले मुझे अस्पताल लेकर जाएंगे, जब तक मैं हूं उनपर आंच भी नहीं आएगी. आज दिल्ली में राम जिंदा क्योंकि कई रहमान अपने घर में उन्हें महफूज रखे हुए हैं. कई फातिमा सड़कों पर रहने को मजबूर नहीं है क्योंकि कई पुष्पा उन्हें अपने घर में महफूज रखे हुए दिल्ली तब तक जिंदा है जब तक यह छोटे छोटे फरिश्ते जिंदा है. दिल्ली की नई सुबह बस इन्हीं से आएगी. जिससे फिर से गर्व से लोग कहेंगे "गर फिरदौस बर रूये जमी अस्त हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त" मतलब दुनिया में कहीं स्वर्ग है, तो यही है, यही है यही है.
विरोध जायज है, खिलाफत की जा सकती है, सामने वाले को घेरना भी सही है, पर किसी के खून के एक कतरे के सामने सारे हठ छोटे हैं,चाहे वह कितना लोकतांत्रिक क्यों न हो? जब एक भी खून की बूंद इस धरती पर गिरती है, तब सिर्फ एक दर्द भरी आह नहीं निकलती है, उसके साथ उसके परिवार की कई चीखे भी निकलती है. हम किस ओर जा रहे हैं हमने तो चीखों के ज्वार को मौत के कभी न मिटने वाले अहसास से जोड़ दिया है, मौत भी कोई एक नही दो अंकों की इस मौत को हमने देश की राजधानी दिल्ली में भोगा है. क्या कोई कानून लाशों के ढेर पर लिखा जा सकता है ? किसी कानून के आधार में रक्त की स्याही भरी हो सकती है क्या? अगर ऐसा है तो हम लोकतंत्र में तो नहीं जी रहे हैं. हमारे पूर्वजों की भाईचारे और अहिंसा की सीखों को आज हमने खून के छींटों से धो दिया है. दुख होता है ऐसे लोगों को देखकर जिनके लिए जान की कीमत इतनी सस्ती है. आपको ऐसा भारत अच्छा लग सकता है. हमारे लिए एक जान की कीमत आज भी हिंदू- मुस्लिम के ढांचे से काफी ऊंची है, इस हिंसा में जितनी जाने हमने खोई है, उस हत्या के पाप को धोने के लिए चार धाम की यात्रा और हज करना भी नाकाफी है.जिन लोगों की दुकान जली हैं, जिनकी वर्षों की मेहनत हिंसा के ज्वार के आगे बौनी साबित हुई.
हमने इन दंगों में वो सब खो दिया है,जिसपर हम लाखों लाख भारतीय गर्व करते थे, जिनके लिए जनेऊ और जालीवाली टोपी से ऊपर तिरंगा होता था. इस शहर में मरे वह 42 लोग अपनी जिंदगी के खत्म होने के पहले दूसरो के हाथों मारे गए थे, उनके परिजनों के लिए दंगा शब्द कोई अखबार की सुर्खी जितना साधारण शब्द नहीं है, उनके लिए दंगा वह अहसास है, जहां सब कुछ चला जाता है, दुकान में आग लग जाती है, घर की दीवारों की ईंटों को तोड़ तोड़ कर दंगाई उन सड़कों पर फेंकते हैं, जिन राज्यों से उनके घर के चिराग स्कूल आते जाते हैं. उनके स्कूल, उनके प्रार्थना घर सब शमशान घाट की आग में तबाह हो जाते हैं. जब घर शमशान में तब्दील होता है, उसे दंगा कहते हैं. हिंसा की चिंगारी आज भी उत्तरी पूर्वी दिल्ली के क्षेत्र में भड़क रही है, मुस्तफाबाद, शिवनगर, जाफराबाद जैसे इलाके में अभी भी लोगों की आंखों में वह दर्दनाक मंजर बस सा गया है. इन दंगों में कही लोग हिन्दू मुस्लिम में बटे बटे से नजर आते हैं, तो की इन दुर्दिनो में उम्मीद की रोशनी बनकर उभरते हैं. शिवविहार इलाके में स्कूल में हुई हिंसा का चश्मदीद जो संयोग से एक हिंदू घर में पैदा हुआ था, कहता है "यहां मुस्लिमों ने छतों से गोलियां दागी है." जिस व्यक्ति ने यह कहा उसने दंगों में अपनी पूरी जमा-पूंजी एक दुकान के रूप में जलती हुई अपनी आंखों से देखी है. एक माथे पर बिंदी लगाए हुई हिंदू महिला कहती हैं " सोमवार हम पर कहर बनकर गुजरा है."
दंगों के बाद से अबतक कुछ लोग घर में बंद हैं, उनका बंद कमरा उस खौफ की जीती जागती गवाही है, जो वह जी रहे हैं, वह लोग धर्म से मुस्लिम है. घरों से आंसू जब चिल्लाहट में तब्दील होकर एक चश्मदीद की नजर एक खुली खिड़की से झांककर रही आंखों से मिली तो उसने कहा "हम सोमवार से घर में बंद हैं." बाहर फूटते उन्माद के ज्वालामुखी से घबराए वह मुस्लिम कहते हैं "हम घरों से भागने को मजबूर हैं, शिवविहार की हमारी मस्जिद को अपवित्र कर दिया गया है, एक क्षेत्रीय बीजेपी नेता के भतीजे को हमने आग लगाते हुए देखा है." कहते हैं जब दर्द हद से बढ़ जाएं तो खुदा की रहमत भी नहीं रहती है. कुछ घरों में नवजात बच्चों के लिए दूध ले जाने का काम भी पुलिस कर रही है, जिस पुलिस से लोगों को शिकायत है कि जब सोमवार को मौत यहां नंगा नाच कर रही थी. तब पुलिस के कान में जूं तक नहीं रेंगी. उनकी शिकायतों के साथ ही पुलिस चौकियों पर बाल्टी भर-भर कर सब्जी पुड़ी से रहवासी इन कर्मियों के खाना खिला रहे हैं.
वो सुबह हमी से आएगी
वो सुबह जिसका दिल्ली को इंतजार है, वह उम्मीदों वाली सुबह रविकांत उपाध्याय और रहमान जैसे लोगों के किस्सों में दिखती है. मुस्तफाबाद का रहने वाला रविकांत एक मुस्लिम दुकानदार के यहां काम करता है वह बताता है " दंगे में मेरे मालिक का तकरीबन दस लाख का नुक़सान हो गया है, तीन दिन से बाजार भी बंद हैं, मेरे मालिक और मैं एक परिवार के सदस्य हैं, हम एक दूसरे की सलामति की दुआएं मांगते हैं."
वही 28 वर्षीय रहमान जो दो नौनिहालों के पिता है, उन्होंने अपने हिंदू मालिक बाबूराम के लिए अपने घर उन्नाव जाने से मना कर दिया है, रहमान पिछले पन्द्रह वर्षों से यही रहता है और श्री राम कॉलोनी में पड़ने वाले बाबूराम के घर के नीचे बनी बैग बनाने की फैक्ट्री में काम करता है. यह इलाका मुस्लिम बाहुल्य इलाका है, बाबूराम बताते हैं जब हिंसा हमसे चंद दूरी पर भड़क रही थी तब मेरे पड़ोसी और रहमान ने मुझसे कहा "हम जान दे देंगे तुम्हारे लिए लेकिन तुम कहीं मत जाना." यह उस दौर की बात है जहां हिदू और मुस्लिम इन दोनों ही कौमों के लोग दंगो में घर छोड़ने को मजबूर हैं. रहमान कहता है मैं जानता हूं कि अगर मुझे कुछ हो गया तो मेरे मालिक ही सबसे पहले मुझे अस्पताल लेकर जाएंगे, जब तक मैं हूं उनपर आंच भी नहीं आएगी. आज दिल्ली में राम जिंदा क्योंकि कई रहमान अपने घर में उन्हें महफूज रखे हुए हैं. कई फातिमा सड़कों पर रहने को मजबूर नहीं है क्योंकि कई पुष्पा उन्हें अपने घर में महफूज रखे हुए दिल्ली तब तक जिंदा है जब तक यह छोटे छोटे फरिश्ते जिंदा है. दिल्ली की नई सुबह बस इन्हीं से आएगी. जिससे फिर से गर्व से लोग कहेंगे "गर फिरदौस बर रूये जमी अस्त हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त" मतलब दुनिया में कहीं स्वर्ग है, तो यही है, यही है यही है.
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