कर्नाटक विधानसभा में हुए इस विवाद को समझने के लिए जानना होगा आखिर फर्जी/असली सेनानी क्या बला है?

कर्नाटक विधानसभा में एक अजीब वाकया घटा जब बीजेपी विधायक बासनगौड़ा पाटिल यतनाल के एक बयान पर विवाद खड़ा हो गया, विधायक यतनाल ने पिछले दिनों एच. एस दौरेस्वामी को फर्जी स्वतंत्रता सेनानी कहा था। यतनाल के शब्द थे, "कई फर्जी स्वतंत्रता सेनानी हैं, एक बैंगलोर में भी हैं, हमें अब बताना पड़ेगा कि दौरेस्वामी क्या हैं? वह वृद्ध कहा हैं? वह पाकिस्तान के एजेंट की तरह व्यवहार करते हैं." गौरतलब है कि दोरेस्वामी अक्सर राज्य की भाजपा सरकार के खिलाफ बयान देते रहते हैं. जिसको लेकर वह विधायक के निशाने पर थे, वैसे उन्होंने जिस फर्जी सेनानी कहकर दौरेस्वामी को घेरा है, वह समझने के यह फर्जी सेनानी क्या होता है? अगर विधायक फर्जी सेनानी हैं, तो फिर असली सेनानी क्या होता हैं? दरअसल हम हर साल स्वतंत्रता दिवस तो बड़े उत्साह से मना लेते हैं वहीं स्वतंत्रता सेनानी क्या होते हैं? इसका सही - सही ज़बाब हमारे पास नहीं है, जो हम थोड़ा बहुत उस शब्द का अर्थ लगा लेते हैं, वह यह है कि जो व्यक्ति अंग्रेजों के खिलाफ लड़ा था वह स्वतंत्रता सेनानी हैं. लेकिन सरकार की स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शब्द की परिभाषा थोड़ी अलग है, वह गांधीजी द्वारा शुरू किए आंदोलन मसलन असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में गिरफ्तार हुए व्यक्तियों को स्वतंत्रता सेनानी मानती है. इसके अलावा अंडमान निकोबार की जेल में बंद हुए व गोवा मुक्ति आंदोलन में शरीक हुए लोगों को भी स्वतंत्रता सेनानी मानती है. अभी सबसे नये स्वतंत्रता सेनानी शब्द उन लोगों के साथ जुड़ा है, जो आजाद हिंद फौज में सैनिक के तौर पर शामिल थे। इसके साथ ही उन लोगों को भी स्वतंत्रता सेनानी सरकार मानती है जो देश के एकीकरण के समय रियासतों के खिलाफ हुए प्रदर्शनों में जेल में गए थे, जैसे कि भोपाल भारत में 1949 में शामिल हुआ, जिसके लिए भोपाल विलीनीकरण आंदोलन में कई रणबांकुरे जेल गए थे. सरकार ने इस श्रेणी के लोगों को स्वतंत्रता सेनानी की मान्यता दी है. उनके पास स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का एक प्रमाणपत्र उनके जिले के कलेक्टर द्वारा जारी किया जाता है. जिसके सहारे वह कह सकते हैं कि हम स्वतंत्रता सेनानी हैं. लेकिन सरकार ने यहां भी लोगों को दो हिस्सों में बांटा है, स्वतंत्रता सेनानी दो प्रकार के पाए जाते हैं, पहले केंद्र सरकार से सम्माननिधी प्राप्त करने वाले स्वतंत्रता सेनानी जो कि मूलतः गांधीजी के आंदोलन में जेल में बंद हुए लोग हैं. दूसरे होते हैं राज्य सरकार से सम्माननिधी प्राप्त करने वाले स्वतंत्रता सेनानी. अब जब स्वतंत्रता सेनानी आप है, तो राज्य और केंद्र से सम्माननिधी का क्या चक्कर है? इसका उत्तर यह है कि आजादी की 25 वी वर्षगांठ होने के अवसर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सम्मानिधी 1972 की शुरुआत की थी, यहां सम्मान निधि का मतलब सीधे-सीधे पेंशन से है. जो लोग केंद्र सरकार से सम्माननिधी के पात्र सेनानी हैं, उन्हें केंद्र और राज्य दोनों पेंशन देते हैं. जैसे कि 2017 तक केंद्र सरकार सेनानियों को 25 हजार रुपए पेंशन देती थी. वही मध्यप्रदेश सरकार भी लगभग पच्चीस हजार रुपए ही पेंशन देती थी. अब जो केंद्र का सेनानी हैं उसे पचास हजार रुपए महीने मिलते थे. वही जो राज्य सरकार से सम्माननिधी के पात्र सेनानी होते हैं, उन्हें सिर्फ राज्य सरकार ही पेंशन देती है, यानि यदि भोपाल की आजादी के लिए कोई व्यक्ति जेल गया है, तो उसे 2017 की मध्यप्रदेश सरकार की ही पेंशन मिलेगी सिर्फ 25 हजार रुपए. यही नहीं सेनानियों को मिलने वाली अन्य महत्वपूर्ण सुविधा यानि आजीवन एक व्यक्ति के साथ सेकेंड एसी के पास से भी राज्य का सेनानी वंचित हो जाता हैं. देश में स्वतंत्रता सेनानी के मामले संभालने के लिए स्वतंत्रता सेनानी पुनर्वास विभाग है, जो गृह मंत्रालय के अधीन आता है, इसके साथ ही राज्यों में भी स्वतंत्रता सेनानियों के लिए विभाग बने हुए जो कि उनके पेंशन संबंधित मामले देखते हैं । अभी वर्तमान में इस समय इनका अधिकतर काम सेनानियों की फाइल बंद करने का होता है क्योंकि वर्तमान में जो भी सेनानी जीवित है वह लगभग 90 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुके हैं. और मरणासन्न है. सरकार की व्यवस्था होती है कि स्वतंत्रता सेनानी के मरने पर उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ किया जाएं. सेनानी परिवारों की माली हालत इतनी खराब होती है कि सेनानियों के अंतिम संस्कार के लिए 4 हजार की नकद राशि प्रशासन पहुंचाता है. लेकिन देश के लिए अपनी जवानी कुर्बान करने वाले इन वीरों को अंतिम समय में तिरंगा तक नसीब नहीं होता है. यदि कोई सेनानी भोपाल का रहने वाला है और अजमेर में जाकर उसकी मृत्यु होती है तो आपको वहां राजकीय सम्मान नहीं मिलेगा क्योंकि राजकीय सम्मान सेनानी के क्षेत्रीय जिले से ही उसे प्राप्त होता है, इस कारण कई सेनानी के परिजन बिना तिरंगे के सम्मान के अपने बुजुर्ग के अंतिम संस्कार को मजबूर हुए हैं. जो सेनानी जीवित है वह पन्द्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी के कार्यक्रमों में दिखावटी सामान बनकर रह गए हैं. बस यही दो दिन प्रशासन इनकी सुध लेता है. फर्जी सेनानी टर्म आई कहा से दरअसल स्वतंत्रता सेनानी उन्हें ही माना जाता है, जो अंग्रेजों के समय जेल में रहे थे, उसके लिए उन्हें जेल का प्रमाणपत्र दिखाना होता है, अब यह पेंशन मिलना शुरू हुई आज़ादी के 25 साल बाद, तब तक अंग्रेजी शासन की जेलें भारतीय रंग में ढ़ल चुकी थी. जब अंग्रेजों की जेल में बंद हुए थे, तब किसी ने जेल से प्रमाणपत्र लेने का सोचा नहीं था. जेल में जब वह लोग अपनी हाजरी देखने गए तो जेल में कई लोगों के जेल में जाने की तारीख तो दर्ज थी पर बाहर कब निकले वहां कुछ भी दर्ज नहीं था, कईयो के नाम की फाइल मिली नहीं, किसी की फाइल दीमक निगल गई. कुछ सेनानी कोर्ट में लड़कर अपने आंकड़े निकालकर लाएं. सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि देश के पूर्व राष्ट्रपति आर वेंकटरमण जो खुद स्वतंत्रता आंदोलन में वेल्लारी जेल में बंद थे, वह अपना जेल का प्रमाणपत्र प्राप्त नहीं कर पाए फिर आम नागरिक कैसे देश की जेल व्यवस्था से अपने रहने का सबूत मांग सकता था? इसीलिए कई सेनानी असली सेनानी होने के बाद भी कागज न होने के कारण फ़र्जी सेनानी बनकर रह गए.

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