थप्पड़ फिल्म लाश को बोलते हुए दिखाती है

ओशो कहते हैं "सबको बीबी लाश जैसी चाहिए." थप्पड़ फिल्म उस लाश के बोलने की कहानी है. फिल्म में स्लो ड्रामा है, एक थप्पड़ के सीन में ही बस नाटकीय पक्ष दिखता है. फिल्म की हीरोइन अमृता है, जो अपनी मां जैसी हाउस वाइफ बनने की ओर है, वह अपनी मां के नुस्खों पर हंसती है, वही वह अपने पति की जरूरी मीटिंग से पहले उसकी जेब में पर्ची रखने की कोशिश करती है, क्योंकि उसे विश्वास है अपनी मां की उस बात पर कि ऐसा करने से उसका काम हो जाएगा. फिल्म का नाम थप्पड़ है, जो थप्पड़ अमृता के गाल के साथ - साथ उसकी अस्मिता पर भी पड़ता दिखता है. फिल्म के मैसेज को समझने के लिए सिर्फ महिला किरदारों के संवाद ही काफी है. एक अमृता के पिता को छोड़ दिया जाए तो यह पूरी मूवी महिलाओं की कहानी कही जा सकती है. ओशो की बात पर गौर करें तो बीबी तो एक लाश है, जो बच्चे पैदा करती है, अपनी सांस की डायबिटीज चेंक करती है, सुबह मोबाइल पर्स लिए अपने पति को कार तक बिठाने आती है. जब बात पत्नी की इच्छाओं की आती है, तो वह तो सिर्फ एक लाश है. लाश को कहा बुरा लगता है, बुरा लगेगा भी तो क्या कर लेंगी? थोड़ा सा रो लेंगी, घर का सामान बिखेर लेंगी, वैसे भी सामान जमाना भी तो उसी का ही काम है. वैसे अमृता ने उस थप्पड़ को खाकर चुप बैठना नहीं, पति से दूर तलाक का पथरीले रास्ते की डगर पकड़ी, उसमें वह कामयाब हुई या फेल यही फिल्म अपने तरीके से बताती है. थप्पड़ फिल्म के डॉयलॉग जो संजीदा भी है और हमारे आसपास की जिंदगियों में घटते हुए से लगते हैं. जैसे "ऐसे तो इंडिया की आधी औरतें घर चली जाएगी" जिसके ज़बाब में कहा जाता है "आधे से भी ज्यादा." "खुश रहना चाहती हूं मैं खुश रहने का झुठ नहीं बोलना चाहतीं" "घर समेट कर रखने के लिए औरत को बर्दाश्त करना पड़ता है मन मारना पड़ता है." "मुझे मेरी मां ने बोला घर जरूरी है, उसे उसकी मां ने बोला घर जरूरी है" "उस एक थप्पड़ से मुझे वो सारी अनफेयर चीज साफ-साफ दिखने लग गई, जिसको मैं अनदेखा करके मूवऑन किए जा रही थी" कहते हैं, हर जिंदगी फिल्म नहीं होती पर हर फिल्म में जिंदगी होती है. फिल्म में मां ने अपनी पूरी जिंदगी अपने पति के लिए इनवेस्ट कर दी, एक काबिल लड़की की सारी काबिलियत उसकी ससुराल की देन बताई जाती है, एक महिला अपने पति के लात घूसे इसीलिए सहती है क्योंकि पति इसे अपनी मर्दानगी की निशानी समझता है. मेरे लिए यह मर्दानगी की निशानी वाला हिस्सा ज्यादा घर करता है. बाकि अनुभव सिन्हा ऐसी फिल्में बनाते रहे, बड़े पर्दे पर ऐसी फिल्में देखकर अगर मर्दानगी का थोड़ा सा भी हिस्सा पिघलता है तो इससे बेहतर क्या होगा?

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