मुझे भीड़ पसंद नहीं है
मुझे भीड़ पसंद नहीं है, न मुझे भीड़ में खड़ा होना भाता है न ही मुझे भीड़ को ताकना पसंद है फिर भी मेरा सच यही है कि मैं भीड़ में ही कहीं शामिल हूं. लोग अक्सर गांव से शहर की ओर जाते हैं, मैं शहर से गांव गया था, वो भी पत्रकारिता करने मैंने गांव को जितना भी जाना समझा है इस तमगे के साथ जाना है.
पत्रकारिता करनी है, यह मैंने पांच साल पहले सोचा था. सोचते ही माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय में एडमिशन ले लिया, वहां गया तो पत्रकार बनने था पर वहां नेता (छात्र नेता) ज्यादा समझा गया. इस नेता शब्द को मिटाने के लिए अखबार, चैनल के दफ्तर खंगालने लग गया, आखिरकार मुझे देर सवेर इस शब्द से अब छुट्टी मिल चुकी है.
मैं किस्मत में बहुत मानता हूं, कई बार मेहनत से ज्यादा और कई बार उसके बराबर भी, मैंने किस्मत को कभी भी मेहनत से कम नहीं आंका है. ऐसा क्यों है? इसके पीछे अब तक की पूरी 23 साल की जिंदगी है. एक बात जो मेरे साथ परछाई की तरह जुडी है, हम अक्सर देखते हैं कि हमारे मम्मी पापा से झगडे होते हैं जो खत्म इस लाइन पर होते हैं कि आप मुझे नहीं समझ सकते.
यह लाइन मैंने कभी नहीं कहीं क्योंकि जिन्होंने मेरी परवरिश की वो उम्र में मुझसे 73 साल बड़ी थी, उन्हें यह पता था कि मैं उनकी उम्र की सोच नहीं समझ सकता और मैं यह समझता था कि वह मेरी पीढ़ी को ढंग से नहीं जानेंगी.
इस एक परवरिश वाले फैक्टर से मेरे में वह मूल्य और तौर तरीके जिंदा है जो हमारे पिताजी वाली पीढ़ी के होते हैं. अपन ने बचपन से बहुत से कैरेक्टर असल जिंदगी में जीएं है, जिनमें एक कैरेक्टर मेरा खुद का फेवरेट है.
अपन भोपाल के तब्बा मिया महल के सामने एक दुकान पर काम करते थे, उम्र तब मेरी दस साल की थी और दस रूपए रोज यानि तीन सौ रूपए महीना मेरी पगार थी. मुझे वहां दुकान के बाहर बैठकर एक लाइन बोलनी होती थी, "आइए बाजी सूट लीजिए डेलीवियर, पार्टीवेयर, फैंसी." दौड़ती भागती जिंदगी में सब कैसे पीछे छूट जाता है, कभी समझ नहीं आता.
आईआईएमसी में आने से पहले और बाद में मुझमें कोई अंतर तो नहीं आया है. मैं खुद के साथ बहुत तरकीबें करता रहता हूं, उन्ही तरकीबों में यह भी है. यहां आकर मेरा हौसला ओर बुलंद हो गया है क्योंकि मैं पहली दफा खुद की पढ़ाई या रहने पर खुद ही खर्चा कर रहा हूं. मैंने यहां आकर अपनी जमा-पूंजी दांव पर लगाई है. अभी देखना है क्या खोया क्या पाया में कौन सा तराजू का पलड़ा भारी साबित होता है. मेरे कुछ सपने हैं जो मैं चिंदियों में पूरे करते रहता हूं, जिनमें एक उम्र के बाद टॉल्स्टोय की तरह सब छोड़ना भी शामिल है. बस इतनी सी मेरी कहानी है.
(साभार Stories_iimc इंस्टाग्राम पेज)
मैं किस्मत में बहुत मानता हूं, कई बार मेहनत से ज्यादा और कई बार उसके बराबर भी, मैंने किस्मत को कभी भी मेहनत से कम नहीं आंका है. ऐसा क्यों है? इसके पीछे अब तक की पूरी 23 साल की जिंदगी है. एक बात जो मेरे साथ परछाई की तरह जुडी है, हम अक्सर देखते हैं कि हमारे मम्मी पापा से झगडे होते हैं जो खत्म इस लाइन पर होते हैं कि आप मुझे नहीं समझ सकते.
यह लाइन मैंने कभी नहीं कहीं क्योंकि जिन्होंने मेरी परवरिश की वो उम्र में मुझसे 73 साल बड़ी थी, उन्हें यह पता था कि मैं उनकी उम्र की सोच नहीं समझ सकता और मैं यह समझता था कि वह मेरी पीढ़ी को ढंग से नहीं जानेंगी.
इस एक परवरिश वाले फैक्टर से मेरे में वह मूल्य और तौर तरीके जिंदा है जो हमारे पिताजी वाली पीढ़ी के होते हैं. अपन ने बचपन से बहुत से कैरेक्टर असल जिंदगी में जीएं है, जिनमें एक कैरेक्टर मेरा खुद का फेवरेट है.
अपन भोपाल के तब्बा मिया महल के सामने एक दुकान पर काम करते थे, उम्र तब मेरी दस साल की थी और दस रूपए रोज यानि तीन सौ रूपए महीना मेरी पगार थी. मुझे वहां दुकान के बाहर बैठकर एक लाइन बोलनी होती थी, "आइए बाजी सूट लीजिए डेलीवियर, पार्टीवेयर, फैंसी." दौड़ती भागती जिंदगी में सब कैसे पीछे छूट जाता है, कभी समझ नहीं आता.
आईआईएमसी में आने से पहले और बाद में मुझमें कोई अंतर तो नहीं आया है. मैं खुद के साथ बहुत तरकीबें करता रहता हूं, उन्ही तरकीबों में यह भी है. यहां आकर मेरा हौसला ओर बुलंद हो गया है क्योंकि मैं पहली दफा खुद की पढ़ाई या रहने पर खुद ही खर्चा कर रहा हूं. मैंने यहां आकर अपनी जमा-पूंजी दांव पर लगाई है. अभी देखना है क्या खोया क्या पाया में कौन सा तराजू का पलड़ा भारी साबित होता है. मेरे कुछ सपने हैं जो मैं चिंदियों में पूरे करते रहता हूं, जिनमें एक उम्र के बाद टॉल्स्टोय की तरह सब छोड़ना भी शामिल है. बस इतनी सी मेरी कहानी है.
(साभार Stories_iimc इंस्टाग्राम पेज)
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