साफ सुथरी राजनीति

राजनीति में शुचिता की बात अक्सर वह ही नेता करते दिखते है, जिनकी उम्र रिटायरमेंट की दहलीज पर होती है, बीजेपी में तो मोदी युग आने के बाद से नेताओं की पद पाने की उम्र 75 वर्ष तय हो गई है लेकिन कांग्रेस में दस जनपथ के खास होने तक राजनीति में सक्रिय रहा जा सकता है, मध्यप्रदेश के  मुख्यमंत्री रहे मोतीलाल वोरा दस जनपथ के पसंदीदा वरिष्ठ नेताओं के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है, जो लंबे समय तक ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के कोषाध्यक्ष रहे है. दूसरी तरफ बीजेपी में शत्रुघ्न सिन्हा के लफ्जों में वन मैन, टू आर्मी शो चलता है, पहले यह भारत के मानचित्र में शेर जैसे दिखने वाले प्रदेश में अपना एकछत्र दो सिंहासन का राज चलाते थे, अब यह राज देशभर में हावी हो चुका है. कांग्रेस में एकतरफ दरबारी तंत्र हावी दिखता है, जहां के क्षत्रप नेता सामंतों जैसा व्यवहार करते है, वही बीजेपी में शासन और दल पर दो गुजराती दबदबा बनाएं हुए है. अचरज की बात यह है कि हम लोकतंत्र में सांस ले रहे है, जहां जनता के शासन के कसीदे पढ़े जाते है, परिचर्चा में जब जोर देकर कहा जाता है कि हम युवा  लोकतंत्र है, तो सुनकर अच्छा लगता है, लेकिन संसद में चुने जाने के लिए जब युवा प्रत्याशियों की सूची खंगाली जाती है, तो उसमें युवा लोकतंत्र के बुजुर्ग प्रत्याशी जैसी इमेज़ उभर कर सामने आती है, जब चुनावी मैदान में हाथ में झंडा लिए कार्यकर्ताओं पर नजरें घुमाने का मन करता है, तो अधिकतर युवा ही नजर आते है, फिर टिकट देने में इनसे गुरेज क्यों किया जाता है? जिन तरूण अवस्था के व्यक्तियों को टिकट मिलती भी है, वह किसी बड़े परिवार के वारिस होते है, जिन्हें राजनीतिक कुर्सी भी पिता जी की छोड़ी गद्दी की तरह विरासत में मिल जाती है.
वैसे यहां बात राजनीतिक शुचिता की जानी चाहिए जो कि अपने आकाओं को खुश करने के लिए बार बार बली चढ़ाई जाती है, आडवाणी जी ने बीजेपी के स्थापना दिवस पर एक ब्लॉग लिखा था जिसका शीर्षक था Nation first, party next, self last . जब राजनेताओं की रीति नीति देखते है तो वह खुद को या अपने आका को देश से बड़ा बताने में लग जाते है, यह उन दरबारी कवियों की भांति बातें करते है, जिनके लिए उनके सम्राट ईश्वर है, इस समय राजनीति में भी भक्तिकाल जैसे आंदोलन की आवश्यकता है जो लोगों को अंधभक्ति की जगह धरातल की दिक्कतों को दिखा सके, उन्हें छिंदवाड़ा मॉडल के भीतर छुपे हुए हरई ब्लॉक के पानी को तरसते आदिवासी भी दिखे, उन्हें गुजरात मॉडल में ओछल हो चूके कबाट क्षेत्र के परिवारों की परेशानियां भी दिखे, उन्ही मुद्दों पर बातें हो, उन्ही मुद्दों पर चुनाव हो, सकारात्मक सूरज की रोशनी में यह समाज रोशन होगा और राजनीति का गिरता झंडा वास्तविक मुद्दों की हवा में लहरायेगा इसी उम्मीद के साथ इति.

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