मर्द नहीं औरत बनो
दिल्ली के बिड़ला मंदिर परिसर में रहने की जगह भी है, जहां टूरिस्टों को ठहराया जाता है, तकरीबन बारह साल पुरानी बात है, मेरे साथ तीन महिलाएं वहां ठहरने गई, उनको यह कहकर वहां रूकने नहीं दिया गया कि यहां सिर्फ महिलाओं के रूकने की मनाही है, जबकि वह तीनों महिलाएं 80 वर्ष से अधिक आयु की रही होगी, उस दिन मेरे बालमन को बहुत ठेस पहुंची कि आखिर हम यहां क्यों नहीं रूक सकते? आगे ही आर्य समाज की धर्मशाला है वही हम लोग रूके, मेरे मन में रोष था लेकिन वह महिलाएं मुस्करा रही थी और रंग बिरंगे कांच लगी कलम खरीद रही थी, महिलाओं की यही खासियत होती है, उन्हें क्षमा करना आता है, दूसरे शब्दों में उनकी सहनशीलता बेहद होती है, हम पुरुष मर्दानगी का ढकोसला ओढ़े रहते है, वह हमसे अलहदा होती है, भारत में नारीवादी आंदोलन में आधी आबादी को उनका हक बताने वाले पुरूष ही थे, वह तो बस खुद को खुद के नाम से नहीं अपने पुरष परिजनों के नाम से संबोधित होने में भी चहक उठती है, हर महिला के नाम के बाद उसके पति का नाम दर्ज है, वह तो शादी के बाद अपने नाम का भी परित्याग करने में भी गुरेज नहीं करती है, संबिधान बनते समय महिलाओं के आरक्षण की बात करने वाली राजकुमारी अमृत कौर सरीखी महिला भी खैरात में इसे नहीं पाना नहीं चाहती थी, शोध से पता चलता है कि बुजुर्गों में महिलाओं की तादाद पुरूषों से अधिक है, जब गहराई में जाते है तो पता चलता है,कि महिलाएं घर के प्रति समर्पित होती है वहीं पुरुष रिटायरमेंट की आयु के बाद खुद को असहज महसूस करने लगते है, इसीलिए उनका मन जीवन रस से ओझल होता जाता है, महिलाओं के लिए सिर्फ मां शब्द कहना ही पर्याप्त नहीं है, उनकी जैसी संवेदना लाने के लिए बड़ा मन का बनना होता है, जो कि सिर्फ अंदर की महिला को जगाकर ही संभव है, इसीलिए मर्द नहीं औरत बनो.
नोट :- यह पुरूषों को नीचा दिखाने के लिए नहीं लिखा गया है.
नोट :- यह पुरूषों को नीचा दिखाने के लिए नहीं लिखा गया है.
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें