जो अन्याय का प्रतिकार करता है वह गांधी है

मुझे आजकल बहुत से लोग मिलते है, जो यह कहते है तुम स्वतंत्रता सेनानी के नाती हो , उनके जैसा आचरण करों, संयोगवश मेरी दादी सेनानी थी, उसमें मेरा तनिक सा भी दोष नहीं है, मैं नहीं चाहता हूं किसी के घर में कोई भी देशभक्त पैदा हो, सभी को उनको मिलने वाली सम्मान निधि (पेंशन) दिखती थी, किसी ने उस दर्द को कभी महसूस ही नहीं किया जिससे वह रोजाना दो चार होती थी, साल में दो दिन (15 अगस्त और 26 जनवरी) ही वह जिंदा रहती थी, बाकि के दिन तो वह जिंदा लाश थी, जिसे देखकर लोग अपनी आंखें बंद कर लेते थे, रात के तीन  बजे वह बिस्तर से उठकर तड़पने लगती थी, वह बार बार पुलिस पुलिस चिल्लाने लगती थी, उनकी पीड़ा देखी नहीं जाती थी, कभी कभार उन्ही पर गुस्सा आता था, आखिर क्या पा लिया अंग्रेजों की जेल में बंद होकर, न अधिकारी स्वतंत्रता सेनानी का मतलब जानते है, न मेरी उम्र के लोग फ्रीडम फाइटर क्या होता है समझते है, कई लोगों को फ्रीडम फाइटर का मतलब कुश्ती लड़ने वाली महिला लगता था, वहीं कुछ लोग सेनानी बताने पर पूछते थे, अम्मा सरकारी नौकरी में थी क्या? इनको समझाते समझाते जुबान थक गई पर लोग समझ ही नहीं पाएं, राजधानी में हमारा घर जिस  विधानसभा में आता है, दादी उस विधानसभा की इकलौती बची सेनानी थी, जिले में मात्र दो महिला सेनानी में एक वह थी, लोगों को तो वह सजावटी सामान लगती थी, जिन्हें देखकर या दिखाकर आजादी की भूली बिसरी यादों को कुछ क्षण एक माला, एक नारियल से तोला जा सके, उस दर्द को कोई नहीं जानना चाहता था, जो तीन मंजिल के उपर स्थित घर में चढ़ने उतरने में लगता था, जब वह मर भी गई तब उनकी लाश पर चढ़े तिरंगे को देखकर जरूर कुछ लोगों को लगा कि इस महिला ने कुछ अलग काम किया है, लेकिन क्या अलग किया उन्होंने? अपने देश के प्रति कर्तव्य ही तो निभाया न, वह तो सभी को निभाना चाहिए, तब परिस्थिति अलग थी, इसीलिए वह जेल गई अब तो वह भी झेलने की दिक्कत नहीं है, हमारे आस पास बिखरी सुर्खियों में वह ही बातें सामने आती है, जहां हम अपने कर्तव्यों से परहेज़ करते है, सब खुद को सही साबित करने के लिए दूसरे को नीचा दिखाने की मशीन का इस्तेमाल करते है, इस मशीन से दूसरों पर निंदा रस की बौछारें उड़ाई जाती है और खुद को हम अच्छाई की धूप से सूखा इंसान बताते है, दिल में वह दर्द है जो बैंक की लाइन में खड़े बुर्जुगों को उनके हक के पैसे के लिए परेशान होता देखता हूं, रास्ते में भीख मांगते बेसहारों का सहारा बनने का मन होता है, लेकिन ईश्वर जितनी महानता हममें कहा है, पैसों के चक्कर में सही को गलत और गलत को सही बताते धंधे करते लोग अलग ही मिट्टी से बने इंसान है, उनके शरीर में हाड़ मांस तो है, बस दिल वाली जगह ख़ाली है,  सबकी संवेदना सोशल मीडिया तक ही सीमित है, धर्म के सहारे दुनिया जीतने में सभी लगे है जबकि उनका धर्म पैसा और सिर्फ पैसा तक ही सीमित है, मैं बहुत सकारात्मक व्यक्ति हुं लेकिन दिल बहुत दुखता है, कहते है अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, सच है लोहिया ने एक मर्तबा गांधी के लिए कहा था, जो अन्याय का प्रतिकार करता है, वह ही गांधी है, इस समय न्याय किसी को नहीं पसंद सबको दण्ड का रास्ता पसंद है, जो इस रास्ते पर चलने वाले है वह असुर है, असुरों में संवेदना वैसे भी नहीं होती है, इस लिए असुरों की वृद्धि दर में हमारे नैतिक मूल्यों का पतन होना साफ झलकता है, इसीलिए क्या हम संवेदनाओं के दौर को कभी वापस ला पाएंगे ? इसी प्रश्न के साथ, इति।

नोट :- शुद्ध अंतःकरण से लिखा गया है.

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