जाति बताती साध्वी प्रज्ञा

कबीरदास जी कहते है " जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान, मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।."

संत कबीर और बाबा तुलसी वह कवि है, जो राजनीतिक, सामाजिक व्यवस्था से लेकर सौरमंडल तक कोड किए जा सकते है, 1896 में एक पश्चिमी विद्वान  ने पाया था, कि
कबीर की वाणियां और बाबा तुलसी के दोहे north eastern province state में हर गांव घर में बोले जाते है
.



 पिछले तीन दिनों से एक प्रश्न मुझे परेशान कर रहा है, आखिरकार साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर संन्यास के बाद भी अपने उपनाम का प्रयोग किस प्रकार कर सकती है, संन्यास लेते समय व्यक्ति अपने जन्म लिए स्वरूप का पिंडदान कर देता है, प्रायः व्यक्ति को उसके संयासी नाम से ही पुकारा जाता है, नरेंद्र नाथ दत्त संन्यास के बाद विवेकानंद
हो गये, बाबा रामदेव, साध्वी उमा भारती, योगी आदित्यनाथ सरीखे संत राजनीति करते है लेकिन इनके नाम के साथ इनका उपनाम प्रयोग में नहीं लाया जाता है, जब चुनाव में यह संत उतरते हैं, तब टीवी स्क्रीन से हमें पता चलता है कि उमा भारती जाति से लोधी है वही योगी आदित्यनाथ का पूरा नाम अजय सिंह बिष्ट है. यह राजनीति में जाति की बढ़ती सत्ता के कारण ही हमें पता चलता है, वहीं बाबा रामदेव चुनावी राजनीति से दूर है, इसलिए उनके संन्यास से पहले के उपनाम यादव से हम इतने परिचित नहीं है. लेकिन एक संयासी (साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर) आखिरकार अपने संन्यास के पूर्व और बाद के जीवन में एक ही नाम से कैसे रह सकती है? वह अपने उपनाम (सिंह ठाकुर) को हमेशा अपने नाम के साथ लगाती है, जबकि अन्य संन्यासी अपने उपनाम का प्रयोग नहीं करते है. यह कैसा संन्यास है?

नोट:- जिस दिन साध्वी जी को भोपाल से भाजपा उम्मीदवार के रूप में टिकट मिली थी, उस दिन प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रेस कांफ्रेंस में उनका नाम साध्वी प्रज्ञा भारती संबोधित किया था, जिस पर उन्हें साध्वी द्वारा टोकते हुए, प्रज्ञा सिंह ठाकुर कहते हुए देखा जा सकता है.

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