मैं तिरस्कारित हुं
जीवन में कई बार हमें तिरस्कार मिलता है, कई बार तो हमें लगने
लगता है कि हम बुरी किस्मत के शिकार है, यह भी सच है कि तिरस्कार यह शब्द कई मायनों में विशेष है, एक दिन एक मीडिया संस्था को इंटरव्यू दिया उसमें मेरा सिलेक्शन नहीं हुआ, घर आया तो सोचा लिखूंगा कि मैं तिरस्कारित हुं, कई घंटों तक अभी तक के जीवन को उल्टा कर देखा, एहसास हुआ कि हां तिरस्कार तो कई बार झेला है, अगर इस विषय में लिखने बैठता तो यकीनन बहुत सारे भाव उसमें शामिल होते, उसमें परिवार जन का तिरस्कार होता, उसमें धन, विद्या सहित गाड़ी, परिचित, अपरिचित सहित कई छोटे-छोटे बिंदु होते जिन्हें मिलाकर एक बड़ा चित्र बन सकता था, उस दिमागी कसरत के दौरान एकदम से यह विचार दिमाग में आया, कि मैंने खोया अधिक या पाया अधिक? मेरा जो उत्तर था वह यक़ीनन काफी सकारात्मक था, मैंने जो भी पाया वह इसीलिए मुझे मिला क्योंकि मुझे तिरस्कार का स्वाद पसंद था, तिरस्कार हमारे घमंड को, हमारी व्यथा को तपा देता है, इस तपन में हमारे गुण अवगुण निखर जाते है, गुण अवगुण इसीलिए लिखा है क्योंकि दोनों में महीन सा फासला है, जितना अभिमान और स्वाभिमान में होता है, बहुतरे बार हम खुद समझ नहीं पाते कि हम फलां व्यक्ति से यह शब्द स्वाभिमान के चलते कह रहे है या हमारे घमंड में यह वाक्य फूट पड़ रहे है,
मोदी जी ने अपने साक्षात्कार में कहा कि वह एक समय घटनाओं की कागज पर पुनरावृत्ति करते थे, उन्हें फिर अहसास होने लगता कि उस घटना में गलती उन्ही की थी, खेर यह आदत तो उन्होंने अब तिरस्कार कर रखी है लेकिन कई बार मैंने अपने परिचितों से दो दो साल बाद माफी मांगी है क्योंकि मुझे बहुत बाद में एहसास हुआ कि मैं गलत था, मन करता है कि अब माफी से क्या मिलेगा? फिर जब अपने किए की क्षमा मांगता हूं तो बहुत सुकून मिलता है, रहीमदास जी ने क्षमा को बड़ा होने की निशानी बताया है, एक बड़े पुलिस अधिकारी ने एक बार मुझे बताया था कि जब वह हत्या के आरोपियों को पकड़ते हैं तो हम से ज्यादा रिलीफ़ उन्हें मिलता है, उन्हें एक हत्यारे ने कहा था कि साहब अच्छा हुआ आपने पकड़ लिया, नहीं फिर अंदर ही अंदर इतने लंबे समय से घुटा जा रहा था, अब आप लोगों को सब बता दिया तो अब कलेजे को ठंडक मिल रही है, मर्म यह है कि तिरस्कार को जीना एक कला है, हम जब इस भाव में जीते है तो नियति हमे भी तिरस्कार करने का अवसर देती है, फिर जब हम उस समय कर्म करने की स्थिति में होते है तो उस समय इस शब्द से परहेज़ कर लेते है हमे यह भान होता है कि हम जिस स्तिथि से गुजर चुके है वहां दूसरे को पहुंचने में कितना दर्द होगा, बाकि तिरस्कार तो तिरस्कार है, अपना मज़ा है इसे जीने में.नोट :- यहां ज्ञान बघारने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है, पढ़ कर तिरस्कार कर सकते है.
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें