चोरी मंजूर है

मैंने अभी तक दो दफा चोरी की है और दोनों ही बार मेरी बहुत सुताई की गई है, पहली दफा केजी टू में पढ़ने के दौरान मम्मी के पर्स से पचास का नोट मारा था, उस समय मैं भागवत कथा सुनने मम्मी के साथ पाठशाला (पुराने भोपाल की धर्मशाला) गया था, वहां महाराज जी ने कहा था कि आप लोग भगवान कृष्ण को माखन चोर कहते हो, भला कोई बच्चा अपने घर की फ्रिज से मक्खन निकाल कर खाएगा तो आप उसे चोर कहोगे क्या? लोगों का तो पता नहीं मैं उनसे बहुत प्रभावित हो गया और पचास का नोट मारके स्कूल ले गया, वहां बुआजी (सफाई कर्मी) से एक चटर मटर मांगी, उन्होंने मेरे हाथ में वह थमा दी, जब मैंने उन्हें उसके बदले पचास का नोट दिया तो उनकी भाव भंगिमा बदल गई, उन्हें लगा कि लड़के ने किसी शिक्षक के पैसे गायब कर दिए हैं, वह मुझे क्लास टीचर के पास ले गई, घर पर फोन लगाकर मम्मी को बुलाया गया, (उन दिनों हमारे घर में नया नया टेलीफोन लगा था) मम्मी आई मैंने उन्हें बताया कि मम्मी आपके पर्स से यह निकाले है, उन्होंने वहां तो मेरा बचाव किया पर घर जाकर दो तीन तमाचे जड़ दिए, शायद पहली दफा मार देवी ने उसी दिन शरीर को स्पर्श किया था.

दूसरी बार तब्बा मियां महल के सामने एक दुकान थी, वहां मैं उन दिनों बैठा करता था, यही तकरीबन दस ग्यारह वर्ष का रहा होगा, वहां बाहर तख्त पर बैठकर सामान की निगरानी का काम मैं करता था, कभी कभार अंदर दुकान के भीतरी हिस्से में घूम आया करता था, एक दिन दुकान के गल्ले से मैंने 50 रूपए निकाले, अब इतना बड़ा बच्चा इतने सारे रूपए का क्या करेंगा, 5 रूपए की मूंगफली मैंने वहां से खरीद ली, बचें पैंतालीस रूपए अब उसका क्या करे, बड़ा प्रश्न था, तो अपने अंदर का कर्ण जिंदा हो गया,  2 रुपए, 3 रुपए, 1 रुपए करके बीसियों जरूरतमंदों को भिक्षा दे दी, जब मेरे हाथ से न्यौछावर जाते देख एक भैया ने देखा, तो उन्होंने पूछा क्यों बे इतने पैसे कहां से लाया तु, अपन क्या करते अपन तो ठहरे सत्यवादी, बता दिया अंदर गल्ले से निकाले है, उस दिन तीन चार तमाचे मुझे खैरात में मिले, खेर उसके बाद आज तक एक रूपया कभी अपनी गुल्लक से भी बिना किसी से पूछे नहीं निकाला, बचपन की सीखे इंसान के अवगुणों को दूर करती है।

नोट :- सच घटना पर आधारित लिखा गया है, पढ़ कर काल्पनिक समझे

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