मेरे साथ गांधी है
मेरे साथ मेरी गांधी है... मेरे साथ यह महिला केरल में पैदा हुई मर्सी है, जो छिंदवाड़ा में दया बाई के तौर पर विश्वभर में विख्यात है, अपना पूरा जीवन आदिम गोंड समाज को देने वाली दयाबाई को जानने के लिए आप गूगल कीजिए, मैं इनके एक सपने को साझा कर रहा हूं, जो केरल में 1940 में जन्मी मर्सी ने तीसरी क्लास में देखा था जो 1979 में छिंदवाड़ा की जमीन में हकीकत में बदला, इन्होंने मलयालम में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की वीरता के किस्से सुने थे, इन्हें उनके शौर्य में घोड़े का काफी योगदान लगा, तो क्या था? बाल मर्सी अपने स्वतंत्रता सेनानी पिताजी के पास गई कि पापा मुझे झांसी की रानी बनना है इसके लिए मुझे घोड़ा दिला दो, पिताजी बोले पहले लक्ष्मीबाई जैसा कुछ करो फिर घोड़ा मिलेगा, मां के पास जाकर जब मर्सी ने घोड़े की फरमाइश की तो माताजी ने कहा घोड़े में क्या रखा है ? हाथी लेना तुम.. माताजी की बात तो सही थी पर मर्सी को तो घोड़ा ही चाहिए था.. उनका बचपने का सपना उनकी युवावस्था में पूरा हुआ जब वह छिंदवाड़ा के हरई ब्लॉक में आदिवासियों के बीच काम करना शुरू कर गई थी, वहां आदिवासी बाजार और सैर सपाटे के लिए घोड़े का ही इस्तेमाल करते थे, आदिवासियों ने मर्सी से दयाबाई बनी इस गांधी को घुड़सवारी सीखा दी और दयाबाई का बचपन का सपना पूरा हो गया.
नोट :- दयाबाई जमीन पकड़ महिला है, उन्होंने अपना नाम भी मुझे नहीं बताया उनसे अचानक रेल में सामना होने पर मैंने उन्हें संयोगवश पहचाना.
नोट :- दयाबाई जमीन पकड़ महिला है, उन्होंने अपना नाम भी मुझे नहीं बताया उनसे अचानक रेल में सामना होने पर मैंने उन्हें संयोगवश पहचाना.

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