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मई, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

डायन अम्मा

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डायन अम्मा शुभम शर्मा सिंहपुर शहर में बसा एक गांव गोरखपुर जो खुद में कई रंग समेटे हुए है, वैसे तो यह गांव अन्नदाताओं का पनाहगार है पर धर्मों के बहुतरे रंग यह खुद में समेटे हुए है, गांव में तकरीबन ग्यारह सौ हिंदू है और यही तादाद इस्लाम को मानने वालों की भी है. हिंदू मुस्लिम के बराबर संख्या में होने पर भी यहां कभी दंगा फसाद नहीं हुआ है। 1992 में जब कारसेवकों का जत्था पूरे जिले के गांवों से जा रहा था, तब यहां के रहवासी नजदीकी पीर हैदरी की दरगाह पर सबकी सलामती की दुआएं मांग रहे थे, देश में जब भी यह दो कौमे आपस में लड़कर एक दूसरे के लहू को बहाने में आमादा होती है, यहां की गंगा जमुनी तहजीब के कारण यहां ऐसी स्थिति आज तक नहीं आई है, गांव के बुजर्ग बताते है, कि गांव में 18 वी सदी में पीर हैदरी आएं तो उन्होने अपने उस्ताद ख्वाजा मुईनोद्दीन चिश्ती के अमन के पैगाम को पूरे क्षेत्र में फैलाया, उनके कर्म से ही गांव में जो सर्राफा बाजार है, वह मस्जिद की तह में ही रचा बसा है और पीढियों से सुनार और बनियें अपनी दुकाने को यहां चला रहे है, वह हर महीने आठ सौ से डेढ़ हजार तक का किराया मस्जिद में जमा...

मर्द नहीं औरत बनो

दिल्ली के बिड़ला मंदिर परिसर में रहने की जगह भी है, जहां टूरिस्टों को ठहराया जाता है, तकरीबन बारह साल पुरानी बात है, मेरे साथ तीन महिलाएं वहां ठहरने गई, उनको यह कहकर वहां रूकने नहीं दिया गया कि यहां सिर्फ महिलाओं के रूकने की मनाही है, जबकि वह तीनों महिलाएं 80 वर्ष से अधिक आयु की रही होगी, उस दिन मेरे बालमन को बहुत ठेस पहुंची कि आखिर हम यहां क्यों नहीं रूक सकते? आगे ही आर्य समाज की धर्मशाला है वही हम लोग रूके, मेरे मन में रोष था लेकिन वह महिलाएं मुस्करा रही थी और रंग बिरंगे कांच लगी कलम खरीद रही थी, महिलाओं की यही खासियत होती है, उन्हें क्षमा करना आता है, दूसरे शब्दों में उनकी सहनशीलता बेहद होती है, हम पुरुष मर्दानगी का ढकोसला ओढ़े रहते है, वह हमसे  अलहदा होती है, भारत में नारीवादी आंदोलन में आधी आबादी को उनका हक बताने वाले पुरूष ही थे, वह तो बस खुद को खुद के नाम से नहीं अपने पुरष परिजनों के नाम से संबोधित होने में भी चहक उठती है, हर महिला के नाम के बाद  उसके पति का नाम दर्ज है, वह तो शादी के बाद अपने नाम का भी परित्याग करने में भी गुरेज नहीं करती है, संबिधान बनते समय महिलाओं ...

मैं तिरस्कारित हुं

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जीवन में कई बार हमें तिरस्कार मिलता है, कई बार तो हमें लगने लगता है कि हम बुरी किस्मत के शिकार है, यह भी सच है कि तिरस्कार यह शब्द कई मायनों में विशेष है, एक दिन एक मीडिया संस्था को इंटरव्यू दिया उसमें मेरा सिलेक्शन नहीं हुआ, घर आया तो सोचा लिखूंगा कि मैं तिरस्कारित हुं, कई घंटों तक अभी तक के जीवन को उल्टा कर देखा, एहसास हुआ कि हां तिरस्कार तो कई बार झेला है, अगर इस विषय में लिखने बैठता तो यकीनन बहुत सारे भाव उसमें शामिल होते, उसमें परिवार जन का तिरस्कार होता, उसमें धन, विद्या सहित गाड़ी, परिचित, अपरिचित सहित कई  छोटे-छोटे बिंदु होते जिन्हें मिलाकर एक बड़ा चित्र बन सकता था, उस दिमागी कसरत के दौरान एकदम से यह विचार दिमाग में आया, कि मैंने खोया अधिक या पाया अधिक? मेरा जो उत्तर था वह यक़ीनन काफी सकारात्मक था, मैंने जो भी पाया वह इसीलिए मुझे मिला क्योंकि मुझे तिरस्कार का स्वाद पसंद था, तिरस्कार हमारे घमंड को, हमारी व्यथा को तपा देता है, इस तपन में हमारे गुण अवगुण निखर जाते है, गुण अवगुण इसीलिए लिखा है क्योंकि दोनों में महीन सा फासला है, जितना अभिमान और स्वाभिमान में होता है, बहुतरे ...

चोरी मंजूर है

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मैंने अभी तक दो दफा चोरी की है और दोनों ही बार मेरी बहुत सुताई की गई है, पहली दफा केजी टू में पढ़ने के दौरान मम्मी के पर्स से पचास का नोट मारा था, उस समय मैं भागवत कथा सुनने मम्मी के साथ पाठशाला (पुराने भोपाल की धर्मशाला) गया था, वहां महाराज जी ने कहा था कि आप लोग भगवान कृष्ण को माखन चोर कहते हो, भला कोई बच्चा अपने घर की फ्रिज से मक्खन निकाल कर खाएगा तो आप उसे चोर कहोगे क्या? लोगों का तो पता नहीं मैं उनसे बहुत प्रभावित हो गया और पचास का नोट मारके स्कूल ले गया, वहां बुआजी (सफाई कर्मी) से एक चटर मटर मांगी, उन्होंने मेरे हाथ में वह थमा दी, जब मैंने उन्हें उसके बदले पचास का नोट दिया तो उनकी भाव भंगिमा बदल गई, उन्हें लगा कि लड़के ने किसी शिक्षक के पैसे गायब कर दिए हैं, वह मुझे क्लास टीचर के पास ले गई, घर पर फोन लगाकर मम्मी को बुलाया गया, (उन दिनों हमारे घर में नया नया टेलीफोन लगा था) मम्मी आई मैंने उन्हें बताया कि मम्मी आपके पर्स से यह निकाले है, उन्होंने वहां तो मेरा बचाव किया पर घर जाकर दो तीन तमाचे जड़ दिए, शायद पहली दफा मार देवी ने उसी दिन शरीर को स्पर्श किया था. दूसरी बार तब्बा म...

घर से निकलते ही

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आज सुबह गाडरवारा में टहलने निकले थे, वहां गाय माता के बच्चे लाचार सड़क पर पड़े थे, उनके पास दो कुत्ते उनको निहार रहे थे, हम चार लोग थे, मैं और मेरे दोस्त ने उनके पास जाकर उनका मुआयना किया, उनके पांव अकड़ गए थे, वह बदहवास धरती पर पड़े मिट्टी में अपने दर्द को महसूस कर रहे थे, मैंने उनके माथे पर हाथ फेरा तो उनके माथा गीला था, उनके असहनीय दर्द के कारण आएं अटैक से उनका वह पसीना निकल रहा था, हम चार लोग उनके शरीर में हाथ लगाकर उनकी चोटे देख रहे थे, पास की चाय की दुकान से लोटा भर पानी लाकर जबरदस्ती उनको पिलाया, वह अपना मुंह ही नहीं खोल रहे थे, हम क्या करते? उनके माथे पर उनके शरीर पर अपना स्पर्श कर उन्हें अपने पन का अहसास दिला रहे थे, चार लोगों में से सिर्फ दो व्यक्ति के पास ही उस क्षण मोबाइल था, गूगल पर जस्ट डायल किया, जानवर के डॉक्टर का नंबर ढूंढा पर निराश ही हाथ लगी, तब तक एक नंदी आकर अपने लाचार दोस्त का हाल चाल जानने की कोशिश करने लगा, वह अपने बेजुबान दोस्त के हाल चाल को हमसे बेहतर समझ सकता था, उसने जमीन पर लात मारकर अपने दोस्त का एक्सीडेंट करने वाले व्यक्ति के लिए गुस्सा जाहिर किया, फिर अ...

जो अन्याय का प्रतिकार करता है वह गांधी है

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मुझे आजकल बहुत से लोग मिलते है, जो यह कहते है तुम स्वतंत्रता सेनानी के नाती हो , उनके जैसा आचरण करों, संयोगवश मेरी दादी सेनानी थी, उसमें मेरा तनिक सा भी दोष नहीं है, मैं नहीं चाहता हूं किसी के घर में कोई भी देशभक्त पैदा हो, सभी को उनको मिलने वाली सम्मान निधि (पेंशन) दिखती थी, किसी ने उस दर्द को कभी महसूस ही नहीं किया जिससे वह रोजाना दो चार होती थी, साल में दो दिन (15 अगस्त और 26 जनवरी) ही वह जिंदा रहती थी, बाकि के दिन तो वह जिंदा लाश थी, जिसे देखकर लोग अपनी आंखें बंद कर लेते थे, रात के तीन  बजे वह बिस्तर से उठकर तड़पने लगती थी, वह बार बार पुलिस पुलिस चिल्लाने लगती थी, उनकी पीड़ा देखी नहीं जाती थी, कभी कभार उन्ही पर गुस्सा आता था, आखिर क्या पा लिया अंग्रेजों की जेल में बंद होकर, न अधिकारी स्वतंत्रता सेनानी का मतलब जानते है, न मेरी उम्र के लोग फ्रीडम फाइटर क्या होता है समझते है, कई लोगों को फ्रीडम फाइटर का मतलब कुश्ती लड़ने वाली महिला लगता था, वहीं कुछ लोग सेनानी बताने पर पूछते थे, अम्मा सरकारी नौकरी में थी क्या? इनको समझाते समझाते जुबान थक गई पर लोग समझ ही नहीं पाएं, राजधानी म...

मेरे साथ गांधी है

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मेरे साथ मेरी गांधी है... मेरे साथ यह महिला केरल में पैदा हुई मर्सी है, जो छिंदवाड़ा में दया बाई के तौर पर विश्वभर में विख्यात है, अपना पूरा जीवन आदिम गोंड समाज को देने वाली दयाबाई को जानने के लिए आप गूगल कीजिए, मैं इनके एक सपने को साझा कर रहा हूं, जो केरल में 1940 में जन्मी मर्सी ने तीसरी क्लास में देखा था जो  1979 में छिंदवाड़ा की जमीन में हकीकत में बदला, इन्होंने मलयालम में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की वीरता के किस्से सुने थे, इन्हें उनके शौर्य में घोड़े का काफी योगदान लगा, तो क्या था? बाल मर्सी अपने स्वतंत्रता सेनानी पिताजी के पास गई कि पापा मुझे झांसी की रानी बनना है इसके लिए मुझे घोड़ा दिला दो, पिताजी बोले पहले लक्ष्मीबाई जैसा कुछ करो फिर घोड़ा मिलेगा, मां के पास जाकर जब मर्सी ने घोड़े की फरमाइश की तो माताजी ने कहा घोड़े में क्या रखा है ? हाथी लेना तुम.. माताजी की बात तो सही थी पर मर्सी को तो घोड़ा ही चाहिए था.. उनका बचपने का सपना उनकी युवावस्था में पूरा हुआ जब वह छिंदवाड़ा के हरई ब्लॉक में आदिवासियों के बीच काम करना शुरू कर गई थी, वहां आदिवासी बाजार और सैर सपाटे के लिए घोड़े...

साफ सुथरी राजनीति

राजनीति में शुचिता की बात अक्सर वह ही नेता करते दिखते है, जिनकी उम्र रिटायरमेंट की दहलीज पर होती है, बीजेपी में तो मोदी युग आने के बाद से नेताओं की पद पाने की उम्र 75 वर्ष तय हो गई है लेकिन कांग्रेस में दस जनपथ के खास होने तक राजनीति में सक्रिय रहा जा सकता है, मध्यप्रदेश के  मुख्यमंत्री रहे मोतीलाल वोरा दस जनपथ के पसंदीदा वरिष्ठ नेताओं के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है, जो लंबे समय तक ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के कोषाध्यक्ष रहे है. दूसरी तरफ बीजेपी में शत्रुघ्न सिन्हा के लफ्जों में वन मैन, टू आर्मी शो चलता है, पहले यह भारत के मानचित्र में शेर जैसे दिखने वाले प्रदेश में अपना एकछत्र दो सिंहासन का राज चलाते थे, अब यह राज देशभर में हावी हो चुका है. कांग्रेस में एकतरफ दरबारी तंत्र हावी दिखता है, जहां के क्षत्रप नेता सामंतों जैसा व्यवहार करते है, वही बीजेपी में शासन और दल पर दो गुजराती दबदबा बनाएं हुए है. अचरज की बात यह है कि हम लोकतंत्र में सांस ले रहे है, जहां जनता के शासन के कसीदे पढ़े जाते है, परिचर्चा में जब जोर देकर कहा जाता है कि हम युवा  लोकतंत्र है, तो सुनकर अच्छा लगता है, लेकिन संस...

2019 का मुद्दा विहीन चुनाव

देश में चुनावी माहौल है, यह वह समय होता है, जब सिर्फ नेता और उनके बयान सुर्खियों में होते है, उनके अलावा सारे मुद्दे शिथिल हो जाते है, पिछले दिनों में इटारसी तक ट्रेन से सफर कर रहा था, वहां मुझे एक छिंदवाड़ा कलेक्टर कार्यालय में काम करने वाला चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी मिला, वह बातो में ही खुद के द्वारा भ्रष्टाचार करने के नुस्खे मुझसे साझा कर रहा था, कि वह किस तरह अपनी शाखा में आएं बुर्जुगों के परिचय पत्र बनाने का काम बड़ी आसानी से कर देता है, उसके लिए वह चार सौ से पांच सौ रुपए जरूर ले लेता है, वह व्यक्ति बेईमानी के पैसों में खुश है लेकिन उसमें स्वीकारने की अच्छाई भी है, उसके पहले ट्रेन की यात्रा में मुझे एक जयपुर ग्रामीण का युवा वोटर मिला था, जो राजवर्धन सिंह द्वारा क्षेत्र में खेल को प्रमोट करने की नीतियों की तारीफ कर रहा था, वह भुसावल में प्रतियोगी परीक्षा में हिस्सा लेने गया था, जहां फीजिकल में रिजेक्शन झेलकर वह अपने घर जा रहा था, उसे बेरोजगारी परेशान करती है, उसे रोजगार चाहिए ताकि वह अपने गांव में खुद के परिवार की छवि दुरस्त कर सके, उसी यात्रा में मुझे एक पूर्व कॉन्स्टेबल मिला, जो...

जाति बताती साध्वी प्रज्ञा

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कबीरदास जी कहते है " जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान, मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।." संत कबीर और बाबा तुलसी वह कवि है, जो राजनीतिक, सामाजिक व्यवस्था से लेकर सौरमंडल तक कोड किए जा सकते है, 1896 में एक पश्चिमी विद्वान  ने पाया था, कि कबीर की वाणियां और बाबा तुलसी के दोहे north eastern province state में हर गांव घर में बोले जाते है .  पिछले तीन दिनों से एक प्रश्न मुझे परेशान कर रहा है, आखिरकार साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर संन्यास के बाद भी अपने उपनाम का प्रयोग किस प्रकार कर सकती है, संन्यास लेते समय व्यक्ति अपने जन्म लिए स्वरूप का पिंडदान कर देता है, प्रायः व्यक्ति को उसके संयासी नाम से ही पुकारा जाता है, नरेंद्र नाथ दत्त संन्यास के बाद विवेकानंद हो गये, बाबा रामदेव, साध्वी उमा भारती, योगी आदित्यनाथ सरीखे संत राजनीति करते है लेकिन इनके नाम के साथ इनका उपनाम प्रयोग में नहीं लाया जाता है, जब चुनाव में यह संत उतरते हैं, तब टीवी स्क्रीन से हमें पता चलता है कि उमा भारती जाति से लोधी है वही योगी आदित्यनाथ का पूरा नाम अजय सिंह बिष्ट है. यह राजनीति में जाति की बढ़...

आज की देशभक्ति में गांधी फिट नहीं

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मैं गांधीजी को देशभक्त नहीं मानता, आज की देशभक्ति नाथुराम जैसों के लिए ही बनी है, गांधी जी इस देशभक्ति के पैरामीटर में फिट नहीं बैठते, लेकिन जिस व्यक्ति ने गांधी जी की हत्या की उसको आरएसएस ने भी अपनी विचारधारा का मानने से इंकार ही किया है, उस हत्यारे की विचारधारा उसी समय गांधीजी की विचारधारा से हार गई थी, जब उसने गांधीजी के पांव पढ़कर उनपर गोली चलाई थी, जिस व्यक्ति ने आज के साम्प्रदायिकता धुव्रीकरण के शिकार पश्चिम बंगाल में कहा था कि मेरा जीवन ही मेरा संदेश है, उनके जीवन को तो एक भटके हुए मानसिकता के शिकार ने खत्म कर दिया पर उनके विचारों को आज भी तबाह नहीं किया जा सकता, पिछले दिनों एक भगवा वस्त्र पहने एक भटकी हुई महिला ने गांधी के पुतले को प्रतीकात्मक मौत देने की कोशिश की थी, क्या हुआ? गांधी के विचार न 30 जनवरी 1948 में मरे थे, न 30 जनवरी 2019 को, आज भोपाल से भाजपा प्रत्याशी ने नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताया है, उनका बताना लाजिमी भी है, आज के समय में गोडसे जैसे ही एक खास विचारधारा द्वारा महापुरुष बताएं जाते है. यह भी अचरज की बात है कि इस साल गांधी के जन्म के 150 वर्ष यह देश मना रहा ह...

कांग्रेस में दिक्कत क्या है?

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कांग्रेस में दिक्कत क्या है? इतनी अच्छी तो पार्टी है, सभी विचारों के धड़ों को एक साथ धोती है, स्वतंत्रता आंदोलन में तपी पार्टी है, लगभग 70 साल आजादी के लिए संघर्ष किया और तकरीबन उतने ही साल सत्ता के शीर्ष पर रही है, फिर ऐसा क्या हो गया कि देश इस पार्टी से चिढ़ने लग गया, गली चलते लोग कांग्रेस पार्टी की बुराई में दस बातें करते दिखते है, चाहे उनके विरोध के पांइट किसी खास विचारधारा के वॉट्सएप गुर्प से ही उपजे हो. सही मायने में उनके पाइंट जायज है, मेरे एक परिजन की मृत्यु की घड़ी नजदीक थी, उन्हें उसका पूर्वानुमान हुआ, उन्होंने अपने परिजनों को बुलाया और कहा कि तुम्हे मेरी सौगंध है, जब भी चुनाव हो दो बैलों की जोड़ी को ही वोट देना, तब कांग्रेस का चुनाव चिन्ह यही था, वह तो अपनी देह छोड़कर चले गए पर कांग्रेस तब दो बेलो की जोड़ी से आज गाय बछड़ा और पंजे तक का सफर तय कर चुकी है, कांग्रेस जिस गांधीवादी विचारधारा पर खरे उतरने की बात करती है, वह आजादी के बीस वर्षों में ही इस पार्टी से गायब हो गई, जब सत्ता का नशा चढ़ता है सबसे पहले घर को ही तबाह करता है, यही फॉर्मूला इस पार्टी के साथ हुआ, हमने सुना है...