संदेश

2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अंधभक्ति की शुरुआत इंदिरा गांधी के समय से हुई

चित्र
आज के समय में अंधभक्ति शब्द बड़े प्रचलन में है, सरकार के पक्षकारो को अंधभक्त की संज्ञा दे दी जाती है। यदि देश के राजनीतिक इतिहास के पन्नों को पढ़ा जाएगा तो अंधभक्ति के दौर की शुरुआत इंदिरा के प्रधानमंत्रित्व काल में हुई, जब हिंदी के आदिकाल में वर्णित दरबारी कवियों का स्थान नेताओं ने ले लिया, चारण नेताओं का समय यही था। तत्कालीन कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने कहा था, कि इंडिया इज इंदिरा एंड इंदिरा इज इंडिया यानि इंदिरा गांधी ही भारत है और भारत ही इंदिरा है। उनके इस वक्तव्य को हिटलर के समर्थकों द्वारा दिलाई जाने वाली शपथ से जोड़ा जा सकता है, जिसमें सैनिको को इसी तरीके की शपथ दिलाई जाती थी, कि हिटलर ही देश है। जब इंदिरा ने आपातकाल के दौरान भारत के लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाई थी, जब जयप्रकाश नारायण, मोरार जी सरीखे नेता जेल में बंद थे, तब उन्होंने कहा था कि मेरे पिता लंबे अरसे तक जेल में बंद रहे हैं और उन्होंने संघर्ष के दौरान किताबें लिखी है, आज इन नेताओं को भी संघर्ष करना चाहिए। भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री आज भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जयंती...

जब राजेंद्र प्रसाद के घर में छुआछुत का शिकार हुए महात्मा गांधी

चित्र
भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू भारत में राष्ट्रपति का पद कई बार रबर की मोहर जैसा प्रतीत होता है। आलोचक आलोचना करते हैं , कि कहने को तो यह देश के राजा है लेकिन यह मंत्रिमंडल की सलाह पर निर्भर है। सत्ताधारी पार्टी व प्रधानमंत्री को ताक पर रखकर यदि राष्ट्रपति कोई निर्णय ले ले ऐसी स्थिति भारतीय इतिहास में इक्का दुक्का ही दर्ज की गई है। वैसे आज हम ऐसे राष्ट्रपति की बात करने वाले हैं जिन्हें इस पद का प्रतिमान माना जा सकता है , उनकी शख्सियत इस पद से भी ऊंची थी। जीवनपर्यंत गांधीवादी कहलाने वाले राजेंद्र बाबू वह व्यक्ति थे , जिनके घर पर गांधीजी ने छूआछूत को   महसूस किया है। गांधीजी ने इस घटना को अपनी आत्मकथा में शामिल किया है , उन्होंने लिखा है कि "मैं (गांधी) और राजकुमार शुक्ल (चंपारण के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी) राजेंद्र बाबू के पटना स्थित घर गए वहां हमे बताया गया कि राजेंद्र प्रसाद किसी जरूरी काम से पुरी गए हुए हैं , हमने उनसे पूछा कि क्या हम थोड़ी   देर यहां बैठ सकते हैं ? वहां के सेवकों ने हमें ऊपर से नीचे तक देखा , जिसके बाद हमें मुख्य बैठक घर में न बिठाकर बा...

शब्द किताबों से मिलते हैं जिनका अर्थ हमें घूमने से मिलता है

चित्र
t शब्द किताबों से मिलते हैं जिनका अर्थ हमें घूमने में मिलता है, यह बात वरिष्ठ पत्रकार विष्णु प्रभाकर कहा करते थे। आज पत्रकारिता के दो पहलू नजर आते हैं, एक तबका किताबों की ओट से दुनिया को देखता है। वही दूसरी तरफ घाट-घाट का पानी पीने वाले कलमकार दिखते हैं। जबकि पत्रकारिता इन दोनों ही बातों के बीच का मध्यम मार्ग है। गांव जमीन को छानने से हमे भारत के जनजीवन की आंतरिक सतह को छूने का मौका मिलता है। हमें विविधताओं से भरे हमारे देश के आदिवासी, जनजाति और गरीब तबके को जाने बिना हम देश की आधी आबादी से अछूते रह जाते हैं। यह समाज का वह हिस्सा है, जो अपनी समस्याओं को सीधे  किसी अंजान से साझा नहीं करते हैं। वह चाहते हैं कि सामने वाला उनको मन की बात को समझें, उनके मुंह से माइक सटाने वाले पत्रकार से वह कभी अपनी पीड़ा नहीं बता सकते हैं। मैला आंचल लिखने वाले फणीश्वर नाथ रेणु ने 1975 में बिहार में आई बाढ़ और सूखे की भयावह त्रासदी की रिपोर्टिंग की थी, उनका रिपोर्ताज आगे जाकर ऋणजल धनजल नाम के शीर्षक के साथ छपा था। उन्होंने ऋणजल यानि पानी का घटना (सूखा) और धनजल यानि (बाढ़) का वर्णन इस तरीके से कि...

अयोध्या निर्णय के बाद इस मौलाना को याद करना जरूरी है

चित्र
अयोध्या केस का फैसला आ गया है , फैसले में किसी भी पक्ष की न जीत हुई है , न किसी पक्ष की हार हुई है। वर्षों तक विवादित र ही इस भूमि को हिंदू मुस्लिम एकता के लिए रोडा माना जाता रहा है ‌। जबकि यह सुप्रीम कोर्ट का दिया निर्णय इन दोनों ही धर्मों के मानने वालों के आपसी भाईचारे की अनोखी मिसाल कहा जा सकता है। इस फैसले के बीच देश के वातावरण से वह महीन सी विचारधारा झलक रही है , जिसे हमारे पूर्वज गंगा जमुनी तहजीब कहा करते हैं। इस तहजीब को विकसित करने में एक मौलाना का नाम उल्लेखनीय हैं , जिनका आज जन्मदिन भी है। मौलाना आजाद वह नीव का पत्थर है , जो ऐसे ही भारत की कल्पना करते थे , जहां यह दोनो धर्म एक भारतीयता के रंग में रंगे हुए दिखे।   भारत को नया नाम देने वाले आजाद मौलाना अबुल कलाम आजाद एक महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी , देश के पहले शिक्षा मंत्री के साथ - साथ एक धर्म गुरु मौलाना भी थे। इनका जन्म 11 नवंबर 1888 में मक्का सउदी अरब में हुआ था। वह इस्लाम की गहरी समझ रखते थे , जब देश का धर्म के नाम पर विभाजन हो रहा था , उस समय मौलाना आजाद इस्लामी मुल्क पाकिस्तान के साथ न होकर धर्मनि...

हरियाणा में जाटों ने बिगाड़ी बीजेपी की बिसात

चित्र
हरियाणा के चुनाव परिणाम चौंकाने वाले हैं, भाजपा के 75 पार के नारे को जनता ने सिरे से नकार दिया है और भाजपा को आइना दिखाने वाला जनाधार दिया है, कहा जा सकता है, कि बीजेपी ने गैरजाटों को एक कर सत्ता की कुर्सी फिर हथियाने की कोशिश की है, उस समीकरण को जाटों ने बिगाड़ कर रख दिया है। प्रदेश  में जहां 36 बिरादरी को साधने के जननायक जनता पार्टी और कांग्रेस लगी थी, वही बीजेपी की रणनीति 35 वर्सेज एक की दिख रही थी, मतलब जाट वर्सेज गैर जाट, इस राज्य के जाट भी थोड़े अलग है, वह गोत्रों में बंटे हुए हैं, जैसे पुनिया और संधु । इन गोत्रों में बंटे होने के बाद भी वह एकजुट होकर वोट देते हुए दिखे थे। हरियाणा कहने को छोटा राज्य है, यहां से सिर्फ 90 विधायक चुनकर विधानसभा पहुंचते हैं। पर इस बार भुपेंद्र हुड्डा और दुष्यंत चौटाला सरीखे नेता चौधर वापिस लानी है, जैसे नारे गढ़कर जाटों को सत्ता की कुंजी वापस दिलाने में आमादा थे, जिसका असर एक बड़े पैमाने पर दिखा है। इस राज्य में विधानसभा को हल्का कहा जाता है, हर हल्के में भाजपा ने राष्ट्रवाद और 370 को मुद्दा बनाया था, ऐसा लग भी रहा था, कि राष्ट्रीय मुद्...

समय के साथ बदलते गए चुनावी सर्वेक्षण

चित्र
चुनावी सर्वेक्षण एक कला है, वर्तमान पत्रकारिता जगत में यह एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर उभरा है। पहले पहल जब हमारे पत्रकार किसी लोकसभा क्षेत्र से रिपोर्टिंग करके आते थे, तो उनसे उस क्षेत्र की नब्ज क्या कहती है, यह जानने के प्रयास में सभी लोग लग जाते थे। अब माहौल ठीक उलटा है, अब पत्रकारों से कोई नतीजे जानने की कोशिश करता है। बल्कि वह खुद टेलीविजन स्क्रीन पर आकर चिल्ला चिल्ला कर चुनावी नतीजे बताने लग जाते हैं। पत्रकारिता की इस विधा में अध्ययन कम दिखता है और नाटकीयता अधिक नजर आती है। अभी हाल ही में हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे सामने आए हैं, जहां एक चुनावी सर्वेक्षण (इंडिया टुडे समूह, एक्सिस माई इंडिया)को छोड़कर लगभग सभी ने हरियाणा में अलग ही तस्वीर दिखाई थी, नतीजों में दिखाया गया था, कि भाजपा बड़ी आसानी से बहुमत को छू लेगी, जबकि नतीजों में भाजपा बहुमत से छह सीटें पीछे रह गई है| लोकसभा चुनाव 2019 के बाद टीवी स्क्रीन पर एग्जिट पोल करने वाले प्रदीप गुप्ता रोते हुए दिखे थे, क्योंकि उनका सर्वे चुनाव के नतीजों के सबसे नजदीक था, जिसकी काफी आलोचना की जा रही थी। यह सर्वे चुनावी पत्रका...

यारा तेरी यारी को मैंने तो खुदा माना गाना जीने वाली फिल्मी जोड़ियां

चित्र
सिनेमा और दोस्ती सिनेमा में हमने दोस्तियां तो खूब देखी है, रूपहर्ले पर्दे से हटकर कुछ दोस्तियां असल जिंदगी में भी होती है, यह दोस्त शोले के जय वीरू पर फिल्माएं गाने "यह दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे" का वास्तविक करण ही होता है, सिनेमा का मायाजाल रिश्ते बनाने से ज्यादा बिगाड़ने में यकीन रखता है, शैलेन्द्र और राज कपूर की दोस्ती हो या दिलीप कुमार और दादा मुनि अशोक कुमार का याराना यह वह कुछ अलहदा रिश्ते हैं, जिनकी दोस्ती के किस्से सुनकर यह विश्वास हो जाता है कि इस ग्लैमर भरी इंडस्ट्री में भी इंसान बसर करते हैं. वैसे मेरे पर्सनली फेवरेट देवानंद साहब है, वह एवरग्रीन तो हमेशा रहे ही पर अपने दोस्तों को उन्होंने कभी अकेला नहीं छोड़ा, उनके दो किस्से जो मुझे काफी प्रभावित करते हैं, वह दोनों वाक्या किसी फिल्मी हीरो के साथ नहीं घटा बल्कि, एक प्रसिद्ध संगीतकार के साथ घटा तो दूसरा एक गीतकार के साथ. वह दोनों ही शख्स काफी प्रसिद्ध हस्ती थे, जिनमें पहले थे त्रिपुरा के राजवंश से ताल्लुक रखने वाले सचिन देव बर्मन जिन्हें हम एसडी बर्मन के नाम से ज्यादा जानते हैं और दूसरे थे "कारवां गुज़र गया गुब...

मौत क्या है?

चित्र
मौत क्या है? जो भी है, जीवन से परे ही कोई बला है, जहां एक हंसता खेलता इंसान चुपचाप पड़ा होता है, न उसका दिल धड़कता है, न उसकी नब्ज चलती है, वह तो एक मिट्टी के  पुतले की तरह बेजान पड़ा होता है, जिसका शरीर बनावटी तौर पर तो उसको निहार रही आंखों वाले इंसान की तरह ही होता है. बस वह खुद के अस्तित्व को अपनी काया के साथ इस धरा पर छोड़ जाता है. खुशवंत सिंह लिखते है, "बिस्तर पर अकेला पड़ा-पड़ा इंसान मर सकता है और किसी को पता भी नहीं चलेगा, जब तक की चारों तरफ दुर्गन्ध न फैलने लगे, आंखों के गड्ढों में कीड़े न पड़ जाएं और मुंह पर छिपकलियां अपने लिजलिजे चिकने शरीर से रेंगने न‌ लगे." एक मृत शरीर और जीवित इंसान में क्या फर्क है, एक आत्मा ही तो है, जो जब जीवित व्यक्ति में होती है, तो उसे उसके उन्मुख नाम से बुलाया जाता है, उसके भाव होते है, उसकी आवाज होती है, उसकी नजर होती है, उसका खुद का नजरिया होता है, जब वह इस आत्मा को छोड़ देता है, तो सिर्फ और सिर्फ लाश होती है. आदि शंकराचार्य, मूलशंकर (दयानंद सरस्वती) , सिद्धार्थ इन सब सिद्ध पुरुषों में एक समानता है, इनके जीवन में मौत ही संन्यास क...

डायन अम्मा

चित्र
डायन अम्मा शुभम शर्मा सिंहपुर शहर में बसा एक गांव गोरखपुर जो खुद में कई रंग समेटे हुए है, वैसे तो यह गांव अन्नदाताओं का पनाहगार है पर धर्मों के बहुतरे रंग यह खुद में समेटे हुए है, गांव में तकरीबन ग्यारह सौ हिंदू है और यही तादाद इस्लाम को मानने वालों की भी है. हिंदू मुस्लिम के बराबर संख्या में होने पर भी यहां कभी दंगा फसाद नहीं हुआ है। 1992 में जब कारसेवकों का जत्था पूरे जिले के गांवों से जा रहा था, तब यहां के रहवासी नजदीकी पीर हैदरी की दरगाह पर सबकी सलामती की दुआएं मांग रहे थे, देश में जब भी यह दो कौमे आपस में लड़कर एक दूसरे के लहू को बहाने में आमादा होती है, यहां की गंगा जमुनी तहजीब के कारण यहां ऐसी स्थिति आज तक नहीं आई है, गांव के बुजर्ग बताते है, कि गांव में 18 वी सदी में पीर हैदरी आएं तो उन्होने अपने उस्ताद ख्वाजा मुईनोद्दीन चिश्ती के अमन के पैगाम को पूरे क्षेत्र में फैलाया, उनके कर्म से ही गांव में जो सर्राफा बाजार है, वह मस्जिद की तह में ही रचा बसा है और पीढियों से सुनार और बनियें अपनी दुकाने को यहां चला रहे है, वह हर महीने आठ सौ से डेढ़ हजार तक का किराया मस्जिद में जमा...

मर्द नहीं औरत बनो

दिल्ली के बिड़ला मंदिर परिसर में रहने की जगह भी है, जहां टूरिस्टों को ठहराया जाता है, तकरीबन बारह साल पुरानी बात है, मेरे साथ तीन महिलाएं वहां ठहरने गई, उनको यह कहकर वहां रूकने नहीं दिया गया कि यहां सिर्फ महिलाओं के रूकने की मनाही है, जबकि वह तीनों महिलाएं 80 वर्ष से अधिक आयु की रही होगी, उस दिन मेरे बालमन को बहुत ठेस पहुंची कि आखिर हम यहां क्यों नहीं रूक सकते? आगे ही आर्य समाज की धर्मशाला है वही हम लोग रूके, मेरे मन में रोष था लेकिन वह महिलाएं मुस्करा रही थी और रंग बिरंगे कांच लगी कलम खरीद रही थी, महिलाओं की यही खासियत होती है, उन्हें क्षमा करना आता है, दूसरे शब्दों में उनकी सहनशीलता बेहद होती है, हम पुरुष मर्दानगी का ढकोसला ओढ़े रहते है, वह हमसे  अलहदा होती है, भारत में नारीवादी आंदोलन में आधी आबादी को उनका हक बताने वाले पुरूष ही थे, वह तो बस खुद को खुद के नाम से नहीं अपने पुरष परिजनों के नाम से संबोधित होने में भी चहक उठती है, हर महिला के नाम के बाद  उसके पति का नाम दर्ज है, वह तो शादी के बाद अपने नाम का भी परित्याग करने में भी गुरेज नहीं करती है, संबिधान बनते समय महिलाओं ...

मैं तिरस्कारित हुं

चित्र
जीवन में कई बार हमें तिरस्कार मिलता है, कई बार तो हमें लगने लगता है कि हम बुरी किस्मत के शिकार है, यह भी सच है कि तिरस्कार यह शब्द कई मायनों में विशेष है, एक दिन एक मीडिया संस्था को इंटरव्यू दिया उसमें मेरा सिलेक्शन नहीं हुआ, घर आया तो सोचा लिखूंगा कि मैं तिरस्कारित हुं, कई घंटों तक अभी तक के जीवन को उल्टा कर देखा, एहसास हुआ कि हां तिरस्कार तो कई बार झेला है, अगर इस विषय में लिखने बैठता तो यकीनन बहुत सारे भाव उसमें शामिल होते, उसमें परिवार जन का तिरस्कार होता, उसमें धन, विद्या सहित गाड़ी, परिचित, अपरिचित सहित कई  छोटे-छोटे बिंदु होते जिन्हें मिलाकर एक बड़ा चित्र बन सकता था, उस दिमागी कसरत के दौरान एकदम से यह विचार दिमाग में आया, कि मैंने खोया अधिक या पाया अधिक? मेरा जो उत्तर था वह यक़ीनन काफी सकारात्मक था, मैंने जो भी पाया वह इसीलिए मुझे मिला क्योंकि मुझे तिरस्कार का स्वाद पसंद था, तिरस्कार हमारे घमंड को, हमारी व्यथा को तपा देता है, इस तपन में हमारे गुण अवगुण निखर जाते है, गुण अवगुण इसीलिए लिखा है क्योंकि दोनों में महीन सा फासला है, जितना अभिमान और स्वाभिमान में होता है, बहुतरे ...

चोरी मंजूर है

चित्र
मैंने अभी तक दो दफा चोरी की है और दोनों ही बार मेरी बहुत सुताई की गई है, पहली दफा केजी टू में पढ़ने के दौरान मम्मी के पर्स से पचास का नोट मारा था, उस समय मैं भागवत कथा सुनने मम्मी के साथ पाठशाला (पुराने भोपाल की धर्मशाला) गया था, वहां महाराज जी ने कहा था कि आप लोग भगवान कृष्ण को माखन चोर कहते हो, भला कोई बच्चा अपने घर की फ्रिज से मक्खन निकाल कर खाएगा तो आप उसे चोर कहोगे क्या? लोगों का तो पता नहीं मैं उनसे बहुत प्रभावित हो गया और पचास का नोट मारके स्कूल ले गया, वहां बुआजी (सफाई कर्मी) से एक चटर मटर मांगी, उन्होंने मेरे हाथ में वह थमा दी, जब मैंने उन्हें उसके बदले पचास का नोट दिया तो उनकी भाव भंगिमा बदल गई, उन्हें लगा कि लड़के ने किसी शिक्षक के पैसे गायब कर दिए हैं, वह मुझे क्लास टीचर के पास ले गई, घर पर फोन लगाकर मम्मी को बुलाया गया, (उन दिनों हमारे घर में नया नया टेलीफोन लगा था) मम्मी आई मैंने उन्हें बताया कि मम्मी आपके पर्स से यह निकाले है, उन्होंने वहां तो मेरा बचाव किया पर घर जाकर दो तीन तमाचे जड़ दिए, शायद पहली दफा मार देवी ने उसी दिन शरीर को स्पर्श किया था. दूसरी बार तब्बा म...

घर से निकलते ही

चित्र
आज सुबह गाडरवारा में टहलने निकले थे, वहां गाय माता के बच्चे लाचार सड़क पर पड़े थे, उनके पास दो कुत्ते उनको निहार रहे थे, हम चार लोग थे, मैं और मेरे दोस्त ने उनके पास जाकर उनका मुआयना किया, उनके पांव अकड़ गए थे, वह बदहवास धरती पर पड़े मिट्टी में अपने दर्द को महसूस कर रहे थे, मैंने उनके माथे पर हाथ फेरा तो उनके माथा गीला था, उनके असहनीय दर्द के कारण आएं अटैक से उनका वह पसीना निकल रहा था, हम चार लोग उनके शरीर में हाथ लगाकर उनकी चोटे देख रहे थे, पास की चाय की दुकान से लोटा भर पानी लाकर जबरदस्ती उनको पिलाया, वह अपना मुंह ही नहीं खोल रहे थे, हम क्या करते? उनके माथे पर उनके शरीर पर अपना स्पर्श कर उन्हें अपने पन का अहसास दिला रहे थे, चार लोगों में से सिर्फ दो व्यक्ति के पास ही उस क्षण मोबाइल था, गूगल पर जस्ट डायल किया, जानवर के डॉक्टर का नंबर ढूंढा पर निराश ही हाथ लगी, तब तक एक नंदी आकर अपने लाचार दोस्त का हाल चाल जानने की कोशिश करने लगा, वह अपने बेजुबान दोस्त के हाल चाल को हमसे बेहतर समझ सकता था, उसने जमीन पर लात मारकर अपने दोस्त का एक्सीडेंट करने वाले व्यक्ति के लिए गुस्सा जाहिर किया, फिर अ...

जो अन्याय का प्रतिकार करता है वह गांधी है

चित्र
मुझे आजकल बहुत से लोग मिलते है, जो यह कहते है तुम स्वतंत्रता सेनानी के नाती हो , उनके जैसा आचरण करों, संयोगवश मेरी दादी सेनानी थी, उसमें मेरा तनिक सा भी दोष नहीं है, मैं नहीं चाहता हूं किसी के घर में कोई भी देशभक्त पैदा हो, सभी को उनको मिलने वाली सम्मान निधि (पेंशन) दिखती थी, किसी ने उस दर्द को कभी महसूस ही नहीं किया जिससे वह रोजाना दो चार होती थी, साल में दो दिन (15 अगस्त और 26 जनवरी) ही वह जिंदा रहती थी, बाकि के दिन तो वह जिंदा लाश थी, जिसे देखकर लोग अपनी आंखें बंद कर लेते थे, रात के तीन  बजे वह बिस्तर से उठकर तड़पने लगती थी, वह बार बार पुलिस पुलिस चिल्लाने लगती थी, उनकी पीड़ा देखी नहीं जाती थी, कभी कभार उन्ही पर गुस्सा आता था, आखिर क्या पा लिया अंग्रेजों की जेल में बंद होकर, न अधिकारी स्वतंत्रता सेनानी का मतलब जानते है, न मेरी उम्र के लोग फ्रीडम फाइटर क्या होता है समझते है, कई लोगों को फ्रीडम फाइटर का मतलब कुश्ती लड़ने वाली महिला लगता था, वहीं कुछ लोग सेनानी बताने पर पूछते थे, अम्मा सरकारी नौकरी में थी क्या? इनको समझाते समझाते जुबान थक गई पर लोग समझ ही नहीं पाएं, राजधानी म...