मौत क्या है?
मौत क्या है? जो भी है, जीवन से परे ही कोई बला है, जहां एक हंसता खेलता इंसान चुपचाप पड़ा होता है, न उसका दिल धड़कता है, न उसकी नब्ज चलती है, वह तो एक मिट्टी के पुतले की तरह बेजान पड़ा होता है, जिसका शरीर बनावटी तौर पर तो उसको निहार रही आंखों वाले इंसान की तरह ही होता है. बस वह खुद के अस्तित्व को अपनी काया के साथ इस धरा पर छोड़ जाता है.
खुशवंत सिंह लिखते है, "बिस्तर पर अकेला पड़ा-पड़ा इंसान मर सकता है और किसी को पता भी नहीं चलेगा, जब तक की चारों तरफ दुर्गन्ध न फैलने लगे, आंखों के गड्ढों में कीड़े न पड़ जाएं और मुंह पर छिपकलियां अपने लिजलिजे चिकने शरीर से रेंगने न लगे."
एक मृत शरीर और जीवित इंसान में क्या फर्क है, एक आत्मा ही तो है, जो जब जीवित व्यक्ति में होती है, तो उसे उसके उन्मुख नाम से बुलाया जाता है, उसके भाव होते है, उसकी आवाज होती है, उसकी नजर होती है, उसका खुद का नजरिया होता है, जब वह इस आत्मा को छोड़ देता है, तो सिर्फ और सिर्फ लाश होती है. आदि शंकराचार्य, मूलशंकर (दयानंद सरस्वती) , सिद्धार्थ इन सब सिद्ध पुरुषों में एक समानता है, इनके जीवन में मौत ही संन्यास का कारण बनी है, इन्हें खुद की मौत ने नहीं परिजनों की मौत ने मोहमुक्ति दिलाई है, यह अवस्था वियोगी पुरूषों को मिलती है. यह वह स्थिति है, जिसमें परिजन की मौत से दुखी व्यक्ति उस ध्यान को पलभर में पा लेता है, जिसको पाने के लिए साधु वर्षों साधना करते है, वियोग उस शून्य को पाने का एक जरिया ही है. हमारे पूर्वज (ऋषि मुनि) बहुत चालाक थे, वह जंगलों में गहन रिसर्च कर रहे थे, उन्हें मालूम था, कि जिज्ञासु व्यक्ति के सबसे अधिक प्रश्न क्या होंगे? वह जानते थे कि परिजनों की मौत पर व्यक्ति दुनिया छोड़ देगा, वह नहीं चाहते थे, कि संन्यासियों की भारी तादाद यहां हो, इसीलिए उन्होंने मृत्यु के बाद की दुनिया की रचना की. उन्होंने दो श्रेणियों में बंटी उस दुनिया के बारे में कहानी गढ़ी, जिसमें सिर्फ आत्माएं प्रवेश पा सकती है. जहां मौत का एक देवता है, जो व्यक्ति के कर्मों के आधार पर उसे उच्च दर्जे और निम्न दर्जे में भेजता है.
वहां उनकी मदद के लिए एक मैनेजर भी तैनात है, जिसके पास हर जीवित व्यक्ति का बही-खाता है, वह लोगों के कर्मों को लगातार काउंट कर रहा है. यह वह कल्पना भरा संसार है, जिसके बारे में बताकर पूर्वजों ने कई मौत से जुड़े प्रश्नों को हल कर दिया, कल्पना कही न कही वास्तविकता की परछाई होती है. हमें इस लोक में जीवन चाहिए था, इसीलिए पुण्य और पाप की एक महीन लकीर खींची गई है, जिसका सीमाकंन कर्म से किया गया है, जो इसमें संतुलन करके चलेगा, उसे ही मौत और जीवन के कई रंगों से सराबोर मृत्युलोक में जीना आएंगा.
नोट:- खुशवंत सिंह जी ने के उधार के शब्द मूलतः अंग्रेजी में है.
खुशवंत सिंह लिखते है, "बिस्तर पर अकेला पड़ा-पड़ा इंसान मर सकता है और किसी को पता भी नहीं चलेगा, जब तक की चारों तरफ दुर्गन्ध न फैलने लगे, आंखों के गड्ढों में कीड़े न पड़ जाएं और मुंह पर छिपकलियां अपने लिजलिजे चिकने शरीर से रेंगने न लगे."
एक मृत शरीर और जीवित इंसान में क्या फर्क है, एक आत्मा ही तो है, जो जब जीवित व्यक्ति में होती है, तो उसे उसके उन्मुख नाम से बुलाया जाता है, उसके भाव होते है, उसकी आवाज होती है, उसकी नजर होती है, उसका खुद का नजरिया होता है, जब वह इस आत्मा को छोड़ देता है, तो सिर्फ और सिर्फ लाश होती है. आदि शंकराचार्य, मूलशंकर (दयानंद सरस्वती) , सिद्धार्थ इन सब सिद्ध पुरुषों में एक समानता है, इनके जीवन में मौत ही संन्यास का कारण बनी है, इन्हें खुद की मौत ने नहीं परिजनों की मौत ने मोहमुक्ति दिलाई है, यह अवस्था वियोगी पुरूषों को मिलती है. यह वह स्थिति है, जिसमें परिजन की मौत से दुखी व्यक्ति उस ध्यान को पलभर में पा लेता है, जिसको पाने के लिए साधु वर्षों साधना करते है, वियोग उस शून्य को पाने का एक जरिया ही है. हमारे पूर्वज (ऋषि मुनि) बहुत चालाक थे, वह जंगलों में गहन रिसर्च कर रहे थे, उन्हें मालूम था, कि जिज्ञासु व्यक्ति के सबसे अधिक प्रश्न क्या होंगे? वह जानते थे कि परिजनों की मौत पर व्यक्ति दुनिया छोड़ देगा, वह नहीं चाहते थे, कि संन्यासियों की भारी तादाद यहां हो, इसीलिए उन्होंने मृत्यु के बाद की दुनिया की रचना की. उन्होंने दो श्रेणियों में बंटी उस दुनिया के बारे में कहानी गढ़ी, जिसमें सिर्फ आत्माएं प्रवेश पा सकती है. जहां मौत का एक देवता है, जो व्यक्ति के कर्मों के आधार पर उसे उच्च दर्जे और निम्न दर्जे में भेजता है.
वहां उनकी मदद के लिए एक मैनेजर भी तैनात है, जिसके पास हर जीवित व्यक्ति का बही-खाता है, वह लोगों के कर्मों को लगातार काउंट कर रहा है. यह वह कल्पना भरा संसार है, जिसके बारे में बताकर पूर्वजों ने कई मौत से जुड़े प्रश्नों को हल कर दिया, कल्पना कही न कही वास्तविकता की परछाई होती है. हमें इस लोक में जीवन चाहिए था, इसीलिए पुण्य और पाप की एक महीन लकीर खींची गई है, जिसका सीमाकंन कर्म से किया गया है, जो इसमें संतुलन करके चलेगा, उसे ही मौत और जीवन के कई रंगों से सराबोर मृत्युलोक में जीना आएंगा.
नोट:- खुशवंत सिंह जी ने के उधार के शब्द मूलतः अंग्रेजी में है.


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें