जब राजेंद्र प्रसाद के घर में छुआछुत का शिकार हुए महात्मा गांधी
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| भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू |
भारत
में राष्ट्रपति का पद कई बार रबर की मोहर जैसा प्रतीत होता है। आलोचक आलोचना करते
हैं, कि कहने को तो यह देश के
राजा है लेकिन यह मंत्रिमंडल की सलाह पर निर्भर है। सत्ताधारी पार्टी व
प्रधानमंत्री को ताक पर रखकर यदि राष्ट्रपति कोई निर्णय ले ले ऐसी स्थिति भारतीय
इतिहास में इक्का दुक्का ही दर्ज की गई है। वैसे आज हम ऐसे राष्ट्रपति की बात करने
वाले हैं जिन्हें इस पद का प्रतिमान माना जा सकता है, उनकी शख्सियत इस पद से भी
ऊंची थी।जीवनपर्यंत गांधीवादी कहलाने
वाले राजेंद्र बाबू वह व्यक्ति थे, जिनके घर पर गांधीजी ने छूआछूत को महसूस किया है। गांधीजी ने
इस घटना को अपनी आत्मकथा में शामिल किया है, उन्होंने लिखा है कि "मैं (गांधी) और
राजकुमार शुक्ल (चंपारण के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी) राजेंद्र बाबू के पटना
स्थित घर गए वहां हमे बताया गया कि राजेंद्र प्रसाद किसी जरूरी काम से पुरी गए हुए
हैं, हमने उनसे पूछा कि क्या हम
थोड़ी
देर
यहां बैठ सकते हैं? वहां के सेवकों ने हमें ऊपर
से नीचे तक देखा, जिसके बाद हमें मुख्य बैठक
घर में न बिठाकर बाहर बिठाया गया, जब हम शोंच आदि काम के लिए जाने के लिए उन
लोगों से पूछा तो उन्होंने वहां भी हमें दूसरी श्रेणी के शौचालय में ले जाया
गया।" गांधी व
राजेंद्र
बाबू से मदद के लिए गए थे, कि वह चंपारण में नील खेती
करने को मजबूर किसानों के लिए कानूनी तौर पर क्या कर सकते हैं, लेकिन वहां जाकर हुए उनके
अनुभव जातिगत भेदभाव की सच्ची तस्वीर थें|
राजेंद्र
बाबू संविधान सभा के अध्यक्ष थे, उनके इस पद रहते हुए ही भारत के संविधान की
महत्वपूर्ण बहसें हुईं, उन्होंने सदन में अध्यक्ष
किस प्रकार आचरण करना चाहिए, उसकी मिसाल उन्होंने कायम की, नीति निर्देशक तत्व सरीखे कई
महत्वपूर्ण संविधान की विशेषताएं उनकी सलाह पर ही शामिल की गई।
जब वह
राष्ट्रपति बन गए तो सोमनाथ के मंदिर के शिलान्यास का न्यौता उन्हें मिला, यह मंदिर अनेकों बार विदेश
आक्रामणकारियों द्वारा तोड़ा गया था, उन्होंने वहां जाने का निर्णय लिया, जिसकी खबर तत्कालीन
प्रधानमंत्री नेहरू को मिलते ही उन्होंने उस बात का विरोध किया, उन्होंने राजेंद्र जी को
वहां न जाते हुए सलाह दी कि यदि आप वहां जाएंगे तो हमारी पंथनिरपेक्षता को धक्का
लगेगा। लेकिन राजेंद्र बाबू वहां गए, बेराबल जिले के सोमनाथ मंदिर इलाके में जाकर
उन्होंने कहा कि यह मंदिर भारत के इतिहास का झरोखा है, इस मंदिर की तरह देश पर कई
बार विदेशियों ने हमला कर इसे नुकसान पहुंचाया, इसके बावजूद यह बार बार बना और अपनी वैभवता को
इसने दोबारा प्राप्त किया है। गौरतलब है कि ऐसे महत्वपूर्ण पद पर रहते हुए
उन्होंने सिर्फ एक रुपए वेतन के रूप में स्वीकार किया, जब उनकी मृत्यु हुई तो पंजाब
नेशनल बैंक के उनके खाते में सिर्फ पांच हजार रुपए ही थें। आज भी उनके खाते को
बैंक ने संरक्षित करके रखा है। देशरत्न राजेंद्र बाबू को उनकी जन्मजयंती पर नमन्।


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