अंधभक्ति की शुरुआत इंदिरा गांधी के समय से हुई


आज के समय में अंधभक्ति शब्द बड़े प्रचलन में है, सरकार के पक्षकारो को अंधभक्त की संज्ञा दे दी जाती है। यदि देश के राजनीतिक इतिहास के पन्नों को पढ़ा जाएगा तो अंधभक्ति के दौर की शुरुआत इंदिरा के प्रधानमंत्रित्व काल में हुई, जब हिंदी के आदिकाल में वर्णित दरबारी कवियों का स्थान नेताओं ने ले लिया, चारण नेताओं का समय यही था। तत्कालीन कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने कहा था, कि इंडिया इज इंदिरा एंड इंदिरा इज इंडिया यानि इंदिरा गांधी ही भारत है और भारत ही इंदिरा है। उनके इस वक्तव्य को हिटलर के समर्थकों द्वारा दिलाई जाने वाली शपथ से जोड़ा जा सकता है, जिसमें सैनिको को इसी तरीके की शपथ दिलाई जाती थी, कि हिटलर ही देश है। जब इंदिरा ने आपातकाल के दौरान भारत के लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाई थी, जब जयप्रकाश नारायण, मोरार जी सरीखे नेता जेल में बंद थे, तब उन्होंने कहा था कि मेरे पिता लंबे अरसे तक जेल में बंद रहे हैं और उन्होंने संघर्ष के दौरान किताबें लिखी है, आज इन नेताओं को भी संघर्ष करना चाहिए।

भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री


आज भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जयंती है। 19 नवंबर 1917 को इलाहाबाद में जन्मी इंदिरा का पूरा नाम इंदिरा प्रियदर्शिनी नेहरू था, वह बचपन से ही शांत और खुद में ही रहने वाली महिला थी, दरअसल उन्होंने कम उम्र में दादा मोतीलाल नेहरू के निधन के बाद उनके घर में उनकी मां कमला नेहरू व पिता जवाहरलाल नेहरू ही शेष थे, उनकी मां अक्सर बीमार रहा करती थी, वही पिता जवाहरलाल देश के दौरों में व्यस्त रहते थे, जिस कारण वह अंतर्मुखी हो गई थी। अपने स्वराज्य भवन स्थित घर में उन्होंने शुरू से ही उस समय के राष्ट्रीय फलक के नेताओं की बैठकें देखी थी, इंदिरा ने बचपन में वानर सेना बनाई थी, जो नेताओं के संदेशों को इधर उधर ले जाने का काम करती थी, बच्चों का समुह होने के कारण उनपर अंग्रेज पुलिस की नजर भी नहीं जाती थी।

पिता नेहरु के साथ  इंदिरा गांधी


इंदिरा गांधी की कहानी गुगी गुड़िया से दुर्गा बनने की कहानी है, जब के कामकाज और ओल्डमैन के समर्थन से इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी तो सियासी फलक पर उन्हें कमजोर नेता के तौर पर देखा जा रहा था, वास्तविकता में उनके पास नेहरू की विरासत के अलावा कोई करिश्मा नहीं था। सदन में कम बोलने के कारण समाजवादी पुरोधा राममनोहर लोहिया ने उन्हें गुगी गुड़िया तक कह दिया था। यह उनकी इच्छाशक्ति ही थी, कि एक महान पिता की बेटी में भी महान होने के गुण थे, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, राजाओं को मिलने वाली पेंशन प्रिवी पर्स बंद करके उन्होंने अपने कड़े फैसले लेने की क्षमता को साबित कर दिया था। उनकी सबसे बड़ी परीक्षा भारत और पाकिस्तान के 1971 के युद्ध के समय घटी जब उन्होंने अमेरिका जैसी महाशक्ति के खिलाफ जाकर बांग्लादेश के रूप में एक नए देश को बनवाने में अहम भूमिका निभाई। दुनिया में चुनिंदा ही नेता हुएं हैं, जिन्होंने राजनीति ही नहीं बल्कि दुनिया के मानचित्र पर अपनी छाप छोड़ी है। ऐसी जनश्रुति है कि इसी उपलब्धि के बाद इंदिरा गांधी को विपक्षी नेता अटल बिहारी वाजपेई ने दुर्गा कहा था, यह भी तथ्य है कि अपने एक साक्षात्कार में वाजपेई ने खण्डन किया है कि उन्होंने कभी दुर्गा नहीं कहा था। पर दुर्गा शब्द उनकी शख्सियत के साथ जुड़ सा गया था।

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