यारा तेरी यारी को मैंने तो खुदा माना गाना जीने वाली फिल्मी जोड़ियां

सिनेमा और दोस्ती
सिनेमा में हमने दोस्तियां तो खूब देखी है, रूपहर्ले पर्दे से हटकर कुछ दोस्तियां असल जिंदगी में भी होती है, यह दोस्त शोले के जय वीरू पर फिल्माएं गाने "यह दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे" का वास्तविक करण ही होता है, सिनेमा का मायाजाल रिश्ते बनाने से ज्यादा बिगाड़ने में यकीन रखता है, शैलेन्द्र और राज कपूर
की दोस्ती हो या दिलीप कुमार और दादा मुनि अशोक कुमार का याराना यह वह कुछ अलहदा रिश्ते हैं, जिनकी दोस्ती के किस्से सुनकर यह विश्वास हो जाता है कि इस ग्लैमर भरी इंडस्ट्री में भी इंसान बसर करते हैं. वैसे मेरे पर्सनली फेवरेट देवानंद साहब है, वह एवरग्रीन तो हमेशा रहे ही पर अपने दोस्तों को उन्होंने कभी अकेला नहीं छोड़ा, उनके दो किस्से जो मुझे काफी प्रभावित करते हैं, वह दोनों वाक्या किसी फिल्मी हीरो के साथ नहीं घटा बल्कि, एक प्रसिद्ध संगीतकार के साथ घटा तो दूसरा एक गीतकार के साथ. वह दोनों ही शख्स काफी प्रसिद्ध हस्ती थे, जिनमें पहले थे त्रिपुरा के राजवंश से ताल्लुक रखने वाले सचिन देव बर्मन जिन्हें हम एसडी बर्मन के नाम से ज्यादा जानते हैं और दूसरे थे "कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे"
लिखने वाले जनाब गोपालदास नीरज साहब.



 हुआ यूं कि एसडी दादा को हार्ड अटैक आया था और वह एक साल के लिए इंडस्ट्री से गायब हो गए, उन्होंने इस दौरान फिल्मों से दूरी अपना ली थी, अब जैसा कि इंडस्ट्री का असूल है वह चढ़ते सूरज को ही सलाम करते हैं, बादलों में खो चुके सूरज से उसका क्या वास्ता, जिन एसडी के घर में बॉलीवुड चहका करता था, अब वह वीराने सा हो गया और अंदर ही अंदर एसडी को अवसाद सा गया, जो एक शख्स इस दौरान उनके हाल चाल जानने उनके घर जाया करता थे, वह थे सिर्फ देवानंद. वही कवि गोपालदास नीरज जब बॉलीवुड की चमक में ठहराव को ढूंढ रहे थे तो उन्होंने एक दिन राजजी से जाकर कहा कि मैं अपने गृहजिले जाना चाहता हूं, वही जाकर कुछ करूंगा, अब राज साहब तो इस इंडस्ट्री के तौर तरीकों से वाकिफ थे, उन्होंने कहा नीरज वहां जाओगे तो बंबई तुम्हें भुला देगी, वह कवि बॉलीवुड की अपनी यादों को झोले में समेटकर अलीगढ़ चले गए, उन्होंने अगर किसी अभिनेता के लिए ताउम्र लिखा तो वह देवानंद थे, जो अपने बनाएं रिश्तों को ताउम्र सहेजने की कोशिश करते थे, उनकी आखरी मूवी (चार्जशीट) में भी नीरज का लिखा गाना था.



राज कपूर और शैलेन्द्र का याराना खट्टी, मीठी, कड़वी यादों का गुलिस्तां था, जिसे ताउम्र राज कपूर ने अपने सीने से लगाकर रखा, अपने जन्मदिन वाले दिन शैलेन्द्र को खोने वाले राज कपूर से जब शेलेंद्र सिंह नाम का एक युवा मिलने पहुंचा और उसने खुद को शैलेन्द्र सिंह बताया तो राजजी ने कहा तुम तो मेरे दोस्त शैलेन्द्र की नाम राशि के हो, जाओं तुम लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से मिलों, बाद में शैलेन्द्र सिंह को राज के मरे हुए दोस्त के नाम का होने से अपना पहला गाना "मैं शायर तो नहीं" मिला.



तीसरी जोड़ी दिलीप कुमार और अशोक कुमार साहब की थी, दिलीप और अशोक कुमार की पहली मुलाकात बॉम्बे टॉकीज में हुई थी, जहां देविका रानी ने दोनों को एक दूसरे से मिलवाया था, उनकी यह मुलाकात दोस्ती राम और श्याम फिल्मों के डिस्कशन से लेकर निजी जिंदगी में आने वाली तमाम दिक्कतों को बातें करके सुलझाने तक जारी रहा, दिलीप साहब अशोक जी को हमेशा अशोक भैया कहकर पुकारते थे, उनकी यह दोस्ती दादामुनी की मौत (10 दिसंबर 2001 ) तक जिंदगी भर रही.


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

न्याय की देवी की आंख पर पट्टी क्यों?

मथुरा की लड़की और गोकुल की गाय कर्म फूटे तो अंत ही जाएं (1930 के दशक की कहानी)

यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है,