हरियाणा में जाटों ने बिगाड़ी बीजेपी की बिसात



हरियाणा के चुनाव परिणाम चौंकाने वाले हैं, भाजपा के 75 पार के नारे को जनता ने सिरे से नकार दिया है और भाजपा को आइना दिखाने वाला जनाधार दिया है, कहा जा सकता है, कि बीजेपी ने गैरजाटों को एक कर सत्ता की कुर्सी फिर हथियाने की कोशिश की है, उस समीकरण को जाटों ने बिगाड़ कर रख दिया है। प्रदेश  में जहां 36 बिरादरी को साधने के जननायक जनता पार्टी और कांग्रेस लगी थी, वही बीजेपी की रणनीति 35 वर्सेज एक की दिख रही थी, मतलब जाट वर्सेज गैर जाट, इस राज्य के जाट भी थोड़े अलग है, वह गोत्रों में बंटे हुए हैं, जैसे पुनिया और संधु ।




इन गोत्रों में बंटे होने के बाद भी वह एकजुट होकर वोट देते हुए दिखे थे। हरियाणा कहने को छोटा राज्य है, यहां से सिर्फ 90 विधायक चुनकर विधानसभा पहुंचते हैं। पर इस बार भुपेंद्र हुड्डा और दुष्यंत चौटाला सरीखे नेता चौधर वापिस लानी है, जैसे नारे गढ़कर जाटों को सत्ता की कुंजी वापस दिलाने में आमादा थे, जिसका असर एक बड़े पैमाने पर दिखा है। इस राज्य में विधानसभा को हल्का कहा जाता है, हर हल्के में भाजपा ने राष्ट्रवाद और 370 को मुद्दा बनाया था, ऐसा लग भी रहा था, कि राष्ट्रीय मुद्दों के आगे यहां के सारी बिरादरी एक होकर बीजेपी के पाले में फिट बैठेगी पर ऐसा नतीजों में दिखा नहीं है। यह भी अचरज करने वाली बात है, कि कश्मीर में धारा 370 का हटना यहां घर घर का मुद्दा था, क्योंकि यहां हर कुटुम्ब के बालक फौज में है और कश्मीर में ही तैनात हैं।




 हरियाणा की राजनीति में जाट और गैर जाट के बीच यह खाई कैसे बनी है? यह यहां के उन तीन लालो की राजनीति के कारण ही हुआ है, जिन्हें हरियाणा की पहचान कहा जाता है। दरअसल इस राज्य की सियासत को तीन सालों लालो ने काफी प्रभावित किया है, जिनमें बंशीलाल, देवालाल और भजनलाल शामिल हैं, इन तीन लालो के रहते जाटलैंड कहे जाने वाले हरियाणा के उन्ही जिलों में अधिक विकास हुआ है, जिन जिलों से इन नेताओं की धुरी रहती थी, जिनमें सिरसा, जींद, रोहतक शामिल हैं, इसी क्षेत्र में विकास सिमट सा गया था वहीं फतेहगढ़, बहादुरगढ़ और फरीदाबाद इलाके के लोग अपने क्षेत्र में विकास न होने का रोना रोने को मजबूर थे। भुपेंद्र हुड्डा के दस साल मुख्यमंत्री रहते भी सारी योजनाएं इस तीस फीसदी आबादी को ही समर्पित थी, जिनमें जाट और सिंख जाट शामिल हैं। बीजेपी पिछले चुनाव में इन गैर जाट को निशाना साध कर सत्ता हासिल की थी, पर पिछले सालों हुए जाट आंदोलन ने हरियाणा में इस समुदाय को फिर इक्ट्ठा कर दिया था।




 इस राज्य में 30 प्रतिशत जाटों के साथ जब मुस्लिम और दलित वोट जुटते हैं, तो तकरीबन 55 विधानसभा क्षेत्र की पचास पीसद वोटर जुटते हैं। इन वोटों ने ही इस बार जेजेपी और कांग्रेस को राज्य में संजीवनी दी है। जेजेपी की रैली में ताऊ देवीलाल के अलावा भीमराव अम्बेडकर की फोटो भी रैलियों में चस्पा की गई थी, प्रतीकात्मक रुप से जेजेपी ने सभी समाजों के प्रतीक चिन्हों को अपनी रैलियों और प्रचार के तौर तरीकों में शामिल किया था, बीजेपी के राष्ट्रवाद के मुकाबले जेजेपी ने भगत सिंह और इंकलाब जिंदाबाद के नारों को भी चुनावी नारों में बदल दिया था। यही कारण रहा कि इस नई नवेली पार्टी ने दस सीटें जीतकर भाजपा को समर्थन दे दिया है, शपथ ग्रहण समारोह में दोनों ही पार्टियों के कार्यकर्ताओं का उत्साह देखने लायक था, उससे पहले जब मनोहर लाल खट्टर और दुष्यंत चौटाला एक साथ आएं, तो मनोहर लाल खट्टर का चेहरा कुछ उतरा उतरा था। दुष्यंत का गठबंधन के विषय में कहना है, कि उनके न्यूनतम मुद्दों  का समाधान भाजपानीत सरकार को करना होगा, उन्होंने चुनाव में घोषणा की थी, कि बुजुर्गों की पेंशन 51,00 रूपए वह करेंगे, साथ ही नौकरियों में सत्तर फीसदी सीटें हरियाणा के युवाओं के लिए आरक्षित रहेगी, इस न्यूनतम साझा कार्यक्रम का नाम लेकर जेजेपी ने खट्टर को लोहे के दस्ताने पहनने का प्रस्ताव दिया है, अब चुनौतियां बीजेपी के पास है, कि वह पांच साल सरकार और गठबंधन को किस प्रकार चला पाती है।



चाचा की बात मान गए दुष्यंत
हरियाणा का परिणाम किसी भी एक पार्टी के पक्ष में नहीं था, गुरुवार को सामने आए नतीजों में किसी दल को बहुमत नहीं मिला है. 90 सीटों में से भाजपा को 40, कांग्रेस को 31, जेजेपी को 10 और निर्दलीय उम्मीदवारों को सात सीटों पर जीत मिली है. इसके अलावा आईएनएलडी और हरियाणा लोकहित पार्टी (एचएलपी) के पास एक-एक सीट है। परिणाम आते ही कांग्रेस नेता भुपेंद्र हुड्डा ने कहा था कि वह गैर भाजपाई दलों को मिलाकर सरकार बनाने की अपील की थी। वही दूसरी तरफ आईएनएलडी से जीते एक मात्र विधायक और दुष्यंत के चाचा अभय चौटाला ने जेजेपी की जीत पर कहा था कि, उनके पिता ओमप्रकाश चौटाला और उनके भाई को शिक्षक भर्ती घोटाले में हुड्डा के मुख्यमंत्री रहते हुए ही गिरफ्तार किया गया था,



इसीलिए दुष्यंत को कांग्रेस से गठबंधन नहीं करना चाहिए। लगता है दुष्यंत ने राजनीतिक समीकरणों के साथ साथ अपनें चाचा की बात को भी माना है। दुष्यंत के सामने भी एक समस्या है कि वह सत्ता में रहते हुए 36 बिरादरियों को कितनी सुविधाएं दे पाते हैं।  हरियाणा की राजनीति में जाटों का प्रभुत्व रहा है। वहां यह कहावत है कि जाट एक वोट डालता है और चार डलवाता है। लिहाज़ा इंडियन नेशनल लोकदल और दुष्यंत की नई पार्टी के प्रदर्शन को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि जाटों का समर्थन उनके दादा और पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला की तरफ़ न जाकर दुष्यंत की पार्टी की तरफ़ मुड़ गया है। अब इन जाटों के वोट का सरकार में कितना हस्तक्षेप रहता है, यह भविष्य के गर्त में है।

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