समय के साथ बदलते गए चुनावी सर्वेक्षण


चुनावी सर्वेक्षण एक कला है, वर्तमान पत्रकारिता जगत में यह एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर उभरा है। पहले पहल जब हमारे पत्रकार किसी लोकसभा क्षेत्र से रिपोर्टिंग करके आते थे, तो उनसे उस क्षेत्र की नब्ज क्या कहती है, यह जानने के प्रयास में सभी लोग लग जाते थे। अब माहौल ठीक उलटा है, अब पत्रकारों से कोई नतीजे जानने की कोशिश करता है। बल्कि वह खुद टेलीविजन स्क्रीन पर आकर चिल्ला चिल्ला कर चुनावी नतीजे बताने लग जाते हैं। पत्रकारिता की इस विधा में अध्ययन कम दिखता है और नाटकीयता अधिक नजर आती है।




अभी हाल ही में हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे सामने आए हैं, जहां एक चुनावी सर्वेक्षण (इंडिया टुडे समूह, एक्सिस माई इंडिया)को छोड़कर लगभग सभी ने हरियाणा में अलग ही तस्वीर दिखाई थी, नतीजों में दिखाया गया था, कि भाजपा बड़ी आसानी से बहुमत को छू लेगी, जबकि नतीजों में भाजपा बहुमत से छह सीटें पीछे रह गई है| लोकसभा चुनाव 2019 के बाद टीवी स्क्रीन पर एग्जिट पोल करने वाले प्रदीप गुप्ता रोते हुए दिखे थे, क्योंकि उनका सर्वे चुनाव के नतीजों के सबसे नजदीक था, जिसकी काफी आलोचना की जा रही थी। यह सर्वे चुनावी पत्रकारिता में सबसे ज्यादा आलोचना के शिकार होते हैं, जबकि इन सर्वेक्षणों में एक बहुत बड़ी टीम काम करती है, जो टूकडों में जाकर इस काम को अंजाम देती है, यह नतीजे जिस न्यूज चैनल या अखबार में प्रकाशित होते है, उनकी विश्वसनीयता भी इन चुनावी सर्वेक्षणों के सही या ग़लत होने से जुड़ी होती है।
प्रणय रॉय और दोराबजी सुपारीवाला अपनी किताब द वर्डिक्ट में लिखते हैं, कि साइलेंट वोटर इन नतीजों में बाधा बनता है, क्योंकि वह कभी नहीं बताता है कि मैं वोट किसे दूंगा, वह उल्टा सर्वेक्षण करने गए व्यक्तियों से पूछता है, आप बताइए में किसे वोट दूं। दरअसल हमारे देश में चुनावी सर्वेक्षण कोई आसान काम नहीं है, बड़ी प्रशिक्षित टीम होने के बाद भी वह काम इमानदारी से करेंगी यह कहना मुश्किल है। जिन ट्रेनी पत्रकारों को सर्वे करने के लिए फील्ड पर उतारा जाता है, जो गांव जाकर मतदाताओं से सैंपल इक्ट्ठा करते हैं, वह कई बार खुद ही प्रश्नोत्तरी भरकर अपने मनमुताबिक ज़बाब लिख देते है, जिससे यह सर्वे गलत हो जाते हैं। दूसरी दिक्कत है विविधता। कहने को विविधता में एकता हमारी ताकत है। पर यहां कई सौ किलोमीटर में बोली और मिट्टी के साथ साथ वोटरों का मिजाज भी बदलता जाता है। पश्चिम बंगाल का वोटर बौद्धिक मिजाज का होता है, उनसे आपको सर्वे में हिस्सेदारी करने के लिए एक घंटा देना होता है और दार्शनिक लहजे में उत्तर देना खोजना होता है। दूसरी तरफ बिहार के मतदाता राजनीतिक तौर पर काफी सक्रिय होते हैं, वह आपसे बातों ही बातों में कई नेताओं के किस्से साझा करने लगते हैं, उनकी इन बातों के बीच आपको अपने सर्वे से जुड़े प्रश्नों के उत्तर भरना एक बड़ी दुविधा होती है, इसीलिए यहां चतुरतआ दिखानी होती है। जब केरल में सर्वे करने हम जाते हैं तो वहां कोई साक्षरता दर जहां सर्वाधिक है, इसीलिए वहां पर दो सवालों के स्तर को ऊंचा रखना होता है। इन जटिलताओं का सामना करके सर्वेक्षण करना कठिन काम है पर इसमें कोई गुरेज नहीं है, कि जब यह पत्रकारिता जैसे पवित्र काम का हिस्सा है, तो इसमें भी शुचिता की उम्मीद की जाती है।



चुनावी सर्वेक्षण मूलतः इन तीन तरीकों में होते हैं
सबसे पहले बात करते हैं एग्जिट पोल की. इसे जारी करने के लिए पहले डेटा कलेक्ट किया जाता है. ये डेटा क्लेक्शन जिस दिन वोटिंग होती है उस दिन भी किया जाता है. आखिरी फेज की वोटिंग के दिन जब मतदाता वोट डालकर निकल रहा होता है तब उससे पूछा जाता है कि किसे वोट दिया. इस आधार पर किए गए सर्वेक्षण से जो नतीजे निकाले जाते हैं उसे ही एग्जिट पोल कहते हैं. आमतौर पर टीवी चैनल वोटिंग के आखिरी दिन एग्जिट पोल ही दिखाते हैं. एग्जिट पोल के नतीजे हमेशा मतदान के आखिरी दिन ही जारी किए जाते हैं।


दुसरा तरीका होता है पोस्ट पोल
एग्जिट पोल से पोस्ट पोल के परिणाम ज्यादा सटीक माने जाते हैं. जहां एग्जिट पोल में सर्वे एजेंसी वोटिंग के तुरंत बाद हिसाब लगाती है कौन जीत रहा है और कौन हार रहा है. वहीं पोस्ट पोल हमेशा मतदान के अगले दिन या फिर एक-दो दिन बाद होते हैं. इसमें फैसला हड़बड़ी में नहीं लिया जाता है। माना जाता है एग्जिट पोल का फैसला जल्दी में किया जाता है। ऐसे में ये जरूरी नहीं कि ये पूरी तरह से सही हों. एग्जिट पोल में मतदाताओं के वोट देने के तुरंत बाद उनकी राय जानने की कोशिश की जाती है।  सर्वे करने वाले पोलिंग बूथ के बाहर ही ऐसा सर्वे करने करते हैं। ऐसे में मतदाता अपनी पहचान छुपाते हुए हड़बड़ी में राय बता देते हैं। जिस वजह से जो सर्वे आता है वो गलत भी हो सकता है। वहीं पोस्ट पोल में एक दिन- दो बाद वोटर से बातचीत करके उसके मन को टटोलने की कोशिश की जाती है कि आखिर उसने किस प्रत्याशी को वोट दिया है. इस दौरान वह किसी कंफ्यूजन में नहीं होता है और लगभग सही-सही राय बता देता है।

तीसरा तरीका है ओपिनियन पोल, यहएग्जिट पोल से अलग होते हैं. ओपिनियन पोल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल पत्रकार, चुनावी सर्वे करने वाली एजेंसियां करती हैं. इसके जरिए पत्रकार विभिन्न मसलों, मुद्दों और चुनावों में जनता की नब्ज टटोलने के लिए किया करते हैं. जिसके आधार पर तय किया जाता है कि जीत किसकी होगी।



चुनावी सर्वेक्षणों में आम जनता इसे एक शब्द में तोलने का काम करती है, कि यह सर्वेक्षण बिकाऊ है, जबकि इन सर्वो में काफी बडी टीम महीनों की मेहनत के बाद अपना नतीजा सामने रखती है, जो कि पूर्णतः वैज्ञानिक तरीका है ‌। लेकिन इसमें एक पक्षीय गुण जब नजर आने लगते हैं, तो इसकी विश्वसनीयता वही गिर जाती है। प्रणय रॉय एंड टीम ने 1980 के दशक में चुनावी सर्वेक्षण किया था, जिसमें उन्होंने कांग्रेस को बहुमत मिलती हुई अपने नतीजों में दिखाई थी, तब वरिष्ठ नेता और जनता पार्टी में उद्योग मंत्री रहे जार्ज फर्नांडिस ने अपने घर में यह जानने के लिए बुलाया था कि आखिरकार उन्होंने किस आधार पर कांग्रेस को आम चुनाव में जीतता हुआ दिखाया है, जबकि कांग्रेस तो अपना वजूद खोती हुई नजर आ रही है, वहां कांग्रेस खेमे के विरोधी कई नेता उपस्थित थे, और उन्होंने भी उस सर्वे को ढकोसला बताया, तब प्रणय रॉय ने अपने सैंपल सर्वे को सामने रखकर तार्किक बहस करते हुए अपने सर्वे को वैज्ञानिक आधार पर सही बताया, जो कि बाद में नतीजों में तब्दील हुआ भी। पर आज इस किस्से के तीन दशक बाद हमारे पास तकीनके तो काफी आ गई पर विश्वसनीयता के मामले में हम काफी गिर गए हैं, अब चुनावी नतीजे पार्टी फैंडली होते ज्यादा दिखते हैं, जिनको दिखाकर पार्टियां नतीजों के पहले गठजोड़ के लिए मोहपाश फेंकती दिखती है।

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