किसी के सच्चे हमदर्द बनो
ऑखो से ऑसू भी नहीं निकलते और रोना भी है ....मन करता है खुलकर रो जैसे बचपन मैं छोटी सी बात पर खूब रोते थे .... पर यह दिमाग हमे रोने नहीं देते यह दिमाग ही हमे बतलाता है कि हम बड़े हो गए है रोना हमारे लिए शोभनीय नहीं है पर कोन बतलाएँ इस मन को बहुत ही घुमक्कड हैं यह हर दम घुमता रहता है और पता नहीं कैसी कैसी यादे हमारे सामने जीव़त कर देता है जो हम याद भी नहीं करना चाहते ..आँखे मन का आयना होती हैं और मन जज्बातो का घर और आँखे नम होने के बाबजूद एक भी आँसू गिरने नहीं देती ............ कई लोग पूछते है इतने गुमसूम क्यो रहते हो?
इस बनाबटी हँसी के पीछे क्या राज है? क्या मालूम तुम्हे कि समुन्द्र कितना गहरा है ...तुम किनारे पर बैठकर सिर्फ अंदाजा ही लगा सकते हो अगर वास्तविकता मैं तुम्हे समुन्द्र की गहराई का अंदाजा लगाना है तो उसमे उतर कर देखो क्या पता गहराई मैं तुम्हे खजाना ही मिल जाए........ आप किसी के व्यक्तित्व का उसके व्यवहार (Nathur) का सिर्फ कमेन्ट कर सकते हो हॉस का प्रात्र बना सकते हो या इगनोर कर सकते हो अगर सही मैं उसका व्यवहार आपको कहीं ना कहीं प्रभावित करता हैं तो यह मत पूछो की तुम उदास क्यो हो बल्कि यह पता करो कि वह उदास क्यो हो सकता है......किसी का दर्द छुपाएँ नही छिपता किसी की खुशी छिपाएँ नहीं छिपती वह प्रकट हो ही जाती है ....... प्रेमचंद जी को जीते जी इतनी प्रसद्धि नहीं मिली जितनी उनको मरने के बाद मिली .......किसी कद्र करनी हैं तो सहीं समय पर करो बाद मैं तो सब सोचते ही रह जाते है...........किसी की दिनचयॉ ,उसकी thought प्रोसेस का आपको क्या मालूम जो आप किसी की आलोचना अवहेलना कर रहे हो....................
हम उन लोगो के बारे मैं सोचते हुए अधिक समय बिताते जिनके लिए हम कोइ मायने नहीं रखते और जिनके लिए हम कीमती है उनकी हमें कद्र ही नहीं है किसी को खाने के लिए संघर्ष करना पडता है और कोई खाने को संघर्ष कराता है.... हमारी संवेदनाएँ आधुनिकता मैं खो गई है ....बचपन में हम जानवरो ,भिखारीओ के लिए रोते थे और अब हमे किसी की संवेदना से कोई मतलव नही हम 50 रूपएँ यू ही दोस्तो के साथ खर्च कर देते है और उसी 50 रूपए के लिए एक बच्चा दिनभर धूप मैं पर्चे बांटता हैं ताकि अपनी बीमार मॉ को वह 50 रूपएँ देकर उसके चेहरे पर खुशी देख सके ...........कहॉ खो गई हमारी संवेदना दिल के किस कोने मैं पडी है यह अगर हम अपने बारे मैं सोचते है तो हमारा जीवन कुत्ते के समान है अगर हम अपने परिजनो के बारे मैं सोचते हैं तो हमारा जीवन पच्छी के समान हैं .......,...........
मन करता हैं फिर से बच्चो की तरह रोऊ क्यो कि यह जमाना किसी को खुशी रहने नहीं देता ....और मेरी समवेदनाएँ खो गई है जमाने है में तबही तो रोते हुए असहाय को देखकर भी मेरा मन पसींजता नहीं ,जिओ दिल से पर किसी का दिल दुखाकर जीना भी क्या जीना हैं..|
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