बरसी या वर्षगाठ
मुझे नहीं पता मुझे चलना किसने सिखाया
यूं तो ठीक एक वर्ष पहले 10 अक्टूबर को वह मुझे छोड़ गई पर
आज भी यदि सपने मैं उनकी छलक दिखती है, तो मेरे दिन की शुरुआत रोने से होती है,
मेरे पर्स में दो फोटो है, एक सिंखों के गुरु गोविंद सिंह की और दूसरी अम्मा मंगों
देवी शर्मा की, याददाश्तन दो हफ्ते पुरानी बात है, जब उनकी फोटो में मुंह वाला
हिस्सा संयोगवश बिगड़ गया था और मैं खूब रोया, क्योकि अम्मा दमा की मरीज थी और
अक्सर उन्हे सांस लेने में दिक्कत होती थी उनकी हर स्वास्थ्य संबंधी समस्या से
मुझे दो चार होना ही पड़ता था
और मुझे घबराते देख वो बोलती थी, कि ‘चित्ता
मत कर मैं अभी नहीं मर रही’ पर उनका यह वादा एक दिन टूट ही
गया और वह अब नहीं है, मुझे वो अक्सर समझाती थी, कि बेटा जब मैं मरु तो यह यह
करना, इतने लोटे, इतने ब्लाउज, इतनी मट्ठरी बनवा लेना, उन्होने यह भी बताया हुआ
था, कि जब जाउं तो इन इन को फोन लगा देना, जिनमें एक दादी की ननद थी और एक दादी की
भतीजी, एक उनके स्वतंत्रता सेनानी साथी थे, जिनके नंबर उन्होने खुद से एक कागज में
लिखकर दे रखे थे, मेरे पास जबाब नहीं होता था और मैं उनसे गले मिल लेता था, हर
महीने में दो बार वह बैंक जाती थी, कभी कभार तीन बार क्योकि यह ही वह अवसर होते
थे, जब वह घर से बाहर घुमने निकलती थी, वह बैंक गई और वहां पर उन्होने नामीनेशन
फार्म में मेरा नाम डलवा दिया, मुझे समझ नहीं आया अम्मा चाहती क्या है, पर वह
पिछले दस सालों से मौत की तैयारी कर रही थी, पड़ोस में रहने वाली एक जैनिन अम्मा
नहीं रही और अम्मा ने मुझे उनकी अंतेष्टि में जाने को कहां, मैं तब आठवी कक्षा में
रहा होगा, अब सोचता हुं, तो लगता है, कि वह मुझे तैयार कर रही थी, हर परिस्थिती के
लिए जो उन्होने छोटी उम्र में अपनी मां (किरण देवी शर्मा) और अपने पति ( छोटे लाल
शर्मा ) को खोने पर भोगा होगा वह नहीं चाहती थी
वह असहनीय पीड़ा में भी सहू पर अम्मा आप हार गई हो, मेरे में आप जैसी हिम्मत नहीं है, नही मैं वो दर्द संवेदना झेल सकता हुं, जब आप कहती थी कि ‘मेरे जाने पर तु बहुत रोएगा’ वो बात भी मैने झुठी कर दी, मैने आपकी निरर्जीव लाश देखकर एक आंसू नहीं बहाया, वास्तविकता मैं आंसू आया ही नहीं, क्योकि नजदीक में कोई था, ही नहीं जो बहते आंसू को पोछने वाला, हां मैं रोया वहां जहां आपकों लेकर वर्षों वरस जाता रहा था, उसी बैंक की शाखा में जहां आप अंगूठा लगाकर अपने पैसे निकालती थी, साइन करने वाली एक महिला जो शारीरिक अस्वस्था के कारण अंगूठा लगाने पर मजबूर हुई थी, हां उसी बैंक में मैं आपकी मौत के बात जब बचे पैसे निकालने गया, तो मैं अपनी पारी का इंतजार करते हुए बैठा था, वही काउंटर पर एक महिला जिसके हाथ भी कांप रहे थे, उसे देखकर आपके ध्यान में चला गया, यह वही ध्यान है, जिसका जिक्र अज्ञेय ने अपनी किताब शेखर एक जीवनी में किया है, यह वह ध्यान है, जो ऋर्षियों को भी नहीं होता है पर वियोग में डुबे हुए परिजन को इसका आभास होता है, आप उस शून्य को भोगते है, जो पृथ्वी के अस्तित्व में है, उस शून्य से निकलते ही में रो पड़ा, रोया नहीं बस अश्रुधारा निकल पड़ी, आसपास अजनबी थे और उन्हे मेरे आंसू बैंक व्यवस्था प्रताड़ित के नजर आए पर मैं एक बोझ से मुक्त था क्योंकि मेरे आंसूओं को पोछने वाला हाथ मेरा खुद का था। आज आपकों गये एकवर्ष हो गया है, शायद इस समय आपकी चितता की राख गर्म थी, उसमें बहुत सी कहांनिया जल गई जिनसे मेरे सपनों के भारत की नींव पड़ी थी, उस चित्ता में अम्मा के साथ-साथ उनकी ममता, उनकी जिंदगी में की गई गलतियां उनकी अच्छाई की सीखे सब गुम हो गई,
मैं अब उन यादों के झरोखे से (भोपाल) से 289 किलोमीटर दूर नरसिंहपुर में हुं, उस नदी के किनारे जिसके नाम पर आपका नाम नर्मदा रखा गया था, यह भी संयोग है, कि यमुना किनारे मथुरा में जन्मी अम्मा के अस्थिपंजर नर्मदा नदी में ही विसर्जित हुए, जब जन्मी थी तब मंगल वार था, जिसके कारण नाम मंगों पड़ा और जब देहत्यागी तब भी मंगल वार ही था, इतनी सार्थकता आपके जीवन में ही हो सकती थी, आप कहती थी, कि मथुरा की लड़की और गोकुल की गाय कर्म फूटे तो अंत ही जाएं। पर आपकी किस्मत उस तिरंगे जैसी ही है जिसमें लिपटकर आप अंतिम यात्रा को गई, बस कोई शिकायत नहीं है, आपसे बय एक है, वो भी यह कि अब आपको न मैं सुन सकता हुं, न आपको अपनी सुना सकता हुं। खेर मौत की सच्चाई बस इतनी समझ आती है, कि ताउम्र यह ड़राती है और जब आती है, तो बहुत रुलाती है।
वह असहनीय पीड़ा में भी सहू पर अम्मा आप हार गई हो, मेरे में आप जैसी हिम्मत नहीं है, नही मैं वो दर्द संवेदना झेल सकता हुं, जब आप कहती थी कि ‘मेरे जाने पर तु बहुत रोएगा’ वो बात भी मैने झुठी कर दी, मैने आपकी निरर्जीव लाश देखकर एक आंसू नहीं बहाया, वास्तविकता मैं आंसू आया ही नहीं, क्योकि नजदीक में कोई था, ही नहीं जो बहते आंसू को पोछने वाला, हां मैं रोया वहां जहां आपकों लेकर वर्षों वरस जाता रहा था, उसी बैंक की शाखा में जहां आप अंगूठा लगाकर अपने पैसे निकालती थी, साइन करने वाली एक महिला जो शारीरिक अस्वस्था के कारण अंगूठा लगाने पर मजबूर हुई थी, हां उसी बैंक में मैं आपकी मौत के बात जब बचे पैसे निकालने गया, तो मैं अपनी पारी का इंतजार करते हुए बैठा था, वही काउंटर पर एक महिला जिसके हाथ भी कांप रहे थे, उसे देखकर आपके ध्यान में चला गया, यह वही ध्यान है, जिसका जिक्र अज्ञेय ने अपनी किताब शेखर एक जीवनी में किया है, यह वह ध्यान है, जो ऋर्षियों को भी नहीं होता है पर वियोग में डुबे हुए परिजन को इसका आभास होता है, आप उस शून्य को भोगते है, जो पृथ्वी के अस्तित्व में है, उस शून्य से निकलते ही में रो पड़ा, रोया नहीं बस अश्रुधारा निकल पड़ी, आसपास अजनबी थे और उन्हे मेरे आंसू बैंक व्यवस्था प्रताड़ित के नजर आए पर मैं एक बोझ से मुक्त था क्योंकि मेरे आंसूओं को पोछने वाला हाथ मेरा खुद का था। आज आपकों गये एकवर्ष हो गया है, शायद इस समय आपकी चितता की राख गर्म थी, उसमें बहुत सी कहांनिया जल गई जिनसे मेरे सपनों के भारत की नींव पड़ी थी, उस चित्ता में अम्मा के साथ-साथ उनकी ममता, उनकी जिंदगी में की गई गलतियां उनकी अच्छाई की सीखे सब गुम हो गई,
मैं अब उन यादों के झरोखे से (भोपाल) से 289 किलोमीटर दूर नरसिंहपुर में हुं, उस नदी के किनारे जिसके नाम पर आपका नाम नर्मदा रखा गया था, यह भी संयोग है, कि यमुना किनारे मथुरा में जन्मी अम्मा के अस्थिपंजर नर्मदा नदी में ही विसर्जित हुए, जब जन्मी थी तब मंगल वार था, जिसके कारण नाम मंगों पड़ा और जब देहत्यागी तब भी मंगल वार ही था, इतनी सार्थकता आपके जीवन में ही हो सकती थी, आप कहती थी, कि मथुरा की लड़की और गोकुल की गाय कर्म फूटे तो अंत ही जाएं। पर आपकी किस्मत उस तिरंगे जैसी ही है जिसमें लिपटकर आप अंतिम यात्रा को गई, बस कोई शिकायत नहीं है, आपसे बय एक है, वो भी यह कि अब आपको न मैं सुन सकता हुं, न आपको अपनी सुना सकता हुं। खेर मौत की सच्चाई बस इतनी समझ आती है, कि ताउम्र यह ड़राती है और जब आती है, तो बहुत रुलाती है।




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