राहुल गांधी चोर है
माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय में कल एक प्रदर्शन हुआ, जो कि अधिकारिक तौर पर एनएसयूआई ( कांग्रेस की छात्र इकाई) का प्रदर्शन था, जिसका मुद्दा कुलपति के द्वारा ट्वीटर पर राहुल गांधी चोर है ट्वीट को रीट्वीट करने से जुड़ा हुआ था.
सोशल मीडिया पर विचार की लड़ाई जमीनी लड़ाई में तब्दील होती यहां दिखी. गौरतलब है, कि यहां कुलपति के समर्थन में छात्रों ने भी नारेबाजी की, जो कि उनकी कम समय में लोकप्रियता दिखाती है, पर फिर भी छात्रों का जोश अलीगढ़ विश्वविद्यालय और जेएनयू जैसा दिखा, जिसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू है, नारेबाजी अक्सर तनाव को कम करती है, जब आप किसी व्यवस्था की खिलाफत में नारेबाजी करते है, तो हम बताते है, कि हम व्यवस्था के कितने शिकार है, और सच मानिए जब आप भारत माता की जय, मातरम मातरम वंदे मातरम, शिक्षा के दलालों को जूते मारो सालों को जैसे नारे लगाते है, तो आपके चिल्लाने से निकले नारे से आपकी पीड़ा नारों की शक्ल में बाहर निकल जाती है. एक भोपाल से स्वतंत्रता सेनानी थे, पंडित रविशंकर भारतीय नाम था दादा का( अभी दिवंगत है) उन्हे अंग्रेजी जेल में इसीलिए बंद किया गया था क्योंकि उन्होंने वंदे मातरम का नारा स्कूल में लगाया था, वह तब आठवी कक्षा में पढ़ते थे और उनकी पढ़ाई भी उस दौरान बंद हुई. शायद इन्हीं नारेबाजी को विरोध का प्रतीक मानकर आज तक इस्तेमाल किया जाता है.
कल एक वाकया मंदसौर में भी हुआ जहां शासकीय राजीव गांधी महाविद्यालय में एबीवीपी (संघ का अनुसांगिक संगठन) कार्यकर्ता जायज मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे, उन्होने भारत माता की जय के नारे लगाए, प्रोफेसर ने नारेबाजी के लिए मनाही की, तो छात्रों ने भारत माता की जय बोलने में क्या दिक्कत है पूछा, उन्होने उसे देशद्रोह जैसा बताया (भीड़ में किसी ने कहा होगा) प्रोफेसर सकपका गए और वह भाग भाग कर छात्रों के पांव पढ़ने लग गए उनको दूसरे साथी ने जादू की झप्पी दी तब वह शांत हुए, उनपर तनाव साफ झलक रहा था, खैर इस घटनाक्रम में उनकी प्रतिक्रिया गांधीगिरी करार दिया गया, और देखा जाए तो उनकी यह प्रतिक्रिया उनपर बढ़ते तनाव को दिखाती है, एबीवीपी को गुंडागर्दी का गढ़ कुछ लोगों ने कहना प्रारंभ कर दिया पर एबीवीपी ही एकमात्र ऐसा छात्रसंगठन है|
जिसमें छात्र क्या करेंगे इसका फैसला लेने के हर महानगर, प्रांत और राष्ट्रीय इकाई का अध्यक्ष एक शिक्षक ही होता है, उनके मार्गदर्शन में चलते वाला यह एक मात्र संगठन है, दूसरी तरफ मंदसौर में उस घटना के बाद प्रोफेसर के समर्थन में अन्य शिक्षकों ने भी इस्तीफा दिया है , पर यहां उस आनंद मंत्रालय को जमीन ढुंढने की आवश्यकता है, जिसके सहारे छात्र और शिक्षक तनाव को छोड़ कर अपनी खुद की मुस्कान हंस सके अभी हाल फिलहाल एक शिक्षक जो दो साल बाद रिटायर्ड होने वाला था, वह एक अधिकारी के पास यह मांग लेकर गया कि सर मुझे प्रिंसीपल बना दिया गया है मेरी योग्यता इस पद के लायक नहीं है कृप्या मेरे ऊपर अपने कार्य के अंतिम दिनों में कोई दाग न लगने दें वह अधिकारी बोला आपको दिक्कत क्या है यह तो अच्छा है न कि आपके घर के बाहर सेवानिवृत्त प्राचार्य की तख्ती लगेगी वह बोला साहब मैंने हमेशा छोटे बच्चों को पढ़ाया है मैं अंग्रेजी और कंप्यूटर से अंजान हुं मैं आपके सामने मीटिंग में कैसे बात कर पाउंगा. वो शिक्षक तो वहां से चला गया पर उसकी निष्ठता और उसकी बताई कमजोरी (जो कमजोरी कतई नहीं कही जानी चाहिए) ने शिक्षा जगत की नब्ज खोल दी, एक सरकारी शिक्षक ने मुझे कहा भैया पढ़ाने के लिए शिक्षक बने थे पर वो छोड़कर सारे काम सरकार हमसे करवा रही है, उनके इसी उत्तर की गहराई में सोचिएगा , शायद शिक्षा माफिया से छुटकारा मिल जाएं.
सोशल मीडिया पर विचार की लड़ाई जमीनी लड़ाई में तब्दील होती यहां दिखी. गौरतलब है, कि यहां कुलपति के समर्थन में छात्रों ने भी नारेबाजी की, जो कि उनकी कम समय में लोकप्रियता दिखाती है, पर फिर भी छात्रों का जोश अलीगढ़ विश्वविद्यालय और जेएनयू जैसा दिखा, जिसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू है, नारेबाजी अक्सर तनाव को कम करती है, जब आप किसी व्यवस्था की खिलाफत में नारेबाजी करते है, तो हम बताते है, कि हम व्यवस्था के कितने शिकार है, और सच मानिए जब आप भारत माता की जय, मातरम मातरम वंदे मातरम, शिक्षा के दलालों को जूते मारो सालों को जैसे नारे लगाते है, तो आपके चिल्लाने से निकले नारे से आपकी पीड़ा नारों की शक्ल में बाहर निकल जाती है. एक भोपाल से स्वतंत्रता सेनानी थे, पंडित रविशंकर भारतीय नाम था दादा का( अभी दिवंगत है) उन्हे अंग्रेजी जेल में इसीलिए बंद किया गया था क्योंकि उन्होंने वंदे मातरम का नारा स्कूल में लगाया था, वह तब आठवी कक्षा में पढ़ते थे और उनकी पढ़ाई भी उस दौरान बंद हुई. शायद इन्हीं नारेबाजी को विरोध का प्रतीक मानकर आज तक इस्तेमाल किया जाता है.
कल एक वाकया मंदसौर में भी हुआ जहां शासकीय राजीव गांधी महाविद्यालय में एबीवीपी (संघ का अनुसांगिक संगठन) कार्यकर्ता जायज मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे, उन्होने भारत माता की जय के नारे लगाए, प्रोफेसर ने नारेबाजी के लिए मनाही की, तो छात्रों ने भारत माता की जय बोलने में क्या दिक्कत है पूछा, उन्होने उसे देशद्रोह जैसा बताया (भीड़ में किसी ने कहा होगा) प्रोफेसर सकपका गए और वह भाग भाग कर छात्रों के पांव पढ़ने लग गए उनको दूसरे साथी ने जादू की झप्पी दी तब वह शांत हुए, उनपर तनाव साफ झलक रहा था, खैर इस घटनाक्रम में उनकी प्रतिक्रिया गांधीगिरी करार दिया गया, और देखा जाए तो उनकी यह प्रतिक्रिया उनपर बढ़ते तनाव को दिखाती है, एबीवीपी को गुंडागर्दी का गढ़ कुछ लोगों ने कहना प्रारंभ कर दिया पर एबीवीपी ही एकमात्र ऐसा छात्रसंगठन है|
जिसमें छात्र क्या करेंगे इसका फैसला लेने के हर महानगर, प्रांत और राष्ट्रीय इकाई का अध्यक्ष एक शिक्षक ही होता है, उनके मार्गदर्शन में चलते वाला यह एक मात्र संगठन है, दूसरी तरफ मंदसौर में उस घटना के बाद प्रोफेसर के समर्थन में अन्य शिक्षकों ने भी इस्तीफा दिया है , पर यहां उस आनंद मंत्रालय को जमीन ढुंढने की आवश्यकता है, जिसके सहारे छात्र और शिक्षक तनाव को छोड़ कर अपनी खुद की मुस्कान हंस सके अभी हाल फिलहाल एक शिक्षक जो दो साल बाद रिटायर्ड होने वाला था, वह एक अधिकारी के पास यह मांग लेकर गया कि सर मुझे प्रिंसीपल बना दिया गया है मेरी योग्यता इस पद के लायक नहीं है कृप्या मेरे ऊपर अपने कार्य के अंतिम दिनों में कोई दाग न लगने दें वह अधिकारी बोला आपको दिक्कत क्या है यह तो अच्छा है न कि आपके घर के बाहर सेवानिवृत्त प्राचार्य की तख्ती लगेगी वह बोला साहब मैंने हमेशा छोटे बच्चों को पढ़ाया है मैं अंग्रेजी और कंप्यूटर से अंजान हुं मैं आपके सामने मीटिंग में कैसे बात कर पाउंगा. वो शिक्षक तो वहां से चला गया पर उसकी निष्ठता और उसकी बताई कमजोरी (जो कमजोरी कतई नहीं कही जानी चाहिए) ने शिक्षा जगत की नब्ज खोल दी, एक सरकारी शिक्षक ने मुझे कहा भैया पढ़ाने के लिए शिक्षक बने थे पर वो छोड़कर सारे काम सरकार हमसे करवा रही है, उनके इसी उत्तर की गहराई में सोचिएगा , शायद शिक्षा माफिया से छुटकारा मिल जाएं.



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