अठखेलियां
नींद मानो खो सी गई है, कोई प्रश्न नहीं है जिसका उत्तर खोजने की जिज्ञासा हो, न ही प्रेम में मन वसा है, एक अजीब सा अहसास अंदर ही अंदर परेशान कर रहा है, शायद यह एकांत या अकेलेपन का लक्षण है, कभी लगता है, डॉक्टर से परामर्श लु, कभी मन करता है यहां से भाग जाऊं, बिना लक्ष्य के जीवन का कोई मोल नहीं है, आशा और निराशा के बंधन से मुझे मुक्त होना है, पर मेरी पतंग पता नहीं किस डोर से बंधी हुई है और उसकी ढ़ील न जाने कौन दे रहा है, मैं बोरियत के फिशटेक में फंसी मछली की स्थिति में हुं, मेरे पास जीने लायक सभी सुविधाएं है, पर मुझे समुद्र चाहिए जिसकी अथाह लहरों में मैं अठखेलियां कर सकू, हां बड़ी मछलियां मेरा शिकार कर सकती है, मछुआरों का ड़र भी मुझे सताएगा पर मैं अपनी खुद की मौत मरना चाहता हूं, मैं खुद के चश्मे से दुनिया देखना चाहता हूं, दूसरे के बताए नजारों को मैं उसकी सोच सा ही पाउंगा|
जब आठवी कक्षा में था, तब एक शिक्षिका खाली पीरियड में आई, खाली पीरियड में आये शिक्षक हमेशा सबको अपनी मनमर्जी करने की छूट देते है, मनमर्जी वह भी अनुशासन की दहलीज में पर वह नई उम्र की शिक्षिका कुछ नया सिखाने आई थी, उन्होने सब से क्या बनना चाहते है पूछा, सबने उत्तर दिया किसीने पायलेट बोला तो पूरी क्लास हंस पड़ी किसी ने धीमी आवाज में बोला सोचा नहीं जब मेरी बारी आई तो मेरे दिल से शब्द निकले मैं प्रधानमंत्री बनना चाहता हूं, पूरी क्लास के बच्चों ने तालियां बजा दी, मुझे नहीं पता वो मेरी बड़ी सोच पर बजी ताली थी या मेरे उपहास में बजी, पर उन करतल आवाजों ने मेरा आत्मविश्वास जरूर बढ़ाया, एक ऋतु मेंम थी रसायन पढ़ाया करती थी, वह अक्सर मेरे थोड़े अलग स्वभाव के कारण मुझे प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करती थी, मुझे मंच पर बोलने में ड़र लगता था, आज भी लगता है, जब मैंने स्कूल के फेयरवेल में अपनी स्पीच दी तो सब अवाक थे और उन ऋतुमेंम के शब्द थे यही मैं तुम से चाहती थी, मैं थोड़ा विचित्र स्वभाव का व्यक्ति रहा हूं, मेरा व्यवहार ही यही है, लोगों की सुनता ज्यादा हुं खुद की कहता कम हुं, मैं हिंदी माध्यम का व्यक्ति रहा हूं, अंग्रेजी भाषा में मेरा हाथ थोड़ा कमजोर है, पर मुझे यह मेरी कमजोरी नहीं ताकत ही लगती है, मैं खुद को दुसरों से इतर मानता हूं क्योंकि मेरा सोचने का नजरिया ही अलग है, हां मैं मेहनती नहीं हुं पर मैने मजदूरी तो नहीं पर उसके समान दर्जे के काम जरूर करे है और मुझे फर्क है, कि 10 साल की उम्र में मेरी कमाई 300 रूपए महीने थी, तब सोच थी, कि अधीकतम दसवीं तक पढ़ाई हो जाए तो बहुत है आज ग्रेजुएट है, खराब समय आपको तराशता है| श्री राम को रावण को मारने से पहले 14 साल तक वन में अपनी शक्तियों को संजोना पड़ा था, हमारा संघर्ष ही हमारी ताकत होती है, हम बुरे दौर के साथी को ही हनुमान मान बैठते है, क्योंकि वह संकटमोचक होता है| सोचता हूं जिंदगी में कुछ ऐसा हासिल करना है, कि मेरे नाम से मेरे परिवार को जाना जाए, अभी वनवास का समय चल रहा है एक दिन उपलब्धि भी यकीनन हाथ लगेगी |
जब आठवी कक्षा में था, तब एक शिक्षिका खाली पीरियड में आई, खाली पीरियड में आये शिक्षक हमेशा सबको अपनी मनमर्जी करने की छूट देते है, मनमर्जी वह भी अनुशासन की दहलीज में पर वह नई उम्र की शिक्षिका कुछ नया सिखाने आई थी, उन्होने सब से क्या बनना चाहते है पूछा, सबने उत्तर दिया किसीने पायलेट बोला तो पूरी क्लास हंस पड़ी किसी ने धीमी आवाज में बोला सोचा नहीं जब मेरी बारी आई तो मेरे दिल से शब्द निकले मैं प्रधानमंत्री बनना चाहता हूं, पूरी क्लास के बच्चों ने तालियां बजा दी, मुझे नहीं पता वो मेरी बड़ी सोच पर बजी ताली थी या मेरे उपहास में बजी, पर उन करतल आवाजों ने मेरा आत्मविश्वास जरूर बढ़ाया, एक ऋतु मेंम थी रसायन पढ़ाया करती थी, वह अक्सर मेरे थोड़े अलग स्वभाव के कारण मुझे प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करती थी, मुझे मंच पर बोलने में ड़र लगता था, आज भी लगता है, जब मैंने स्कूल के फेयरवेल में अपनी स्पीच दी तो सब अवाक थे और उन ऋतुमेंम के शब्द थे यही मैं तुम से चाहती थी, मैं थोड़ा विचित्र स्वभाव का व्यक्ति रहा हूं, मेरा व्यवहार ही यही है, लोगों की सुनता ज्यादा हुं खुद की कहता कम हुं, मैं हिंदी माध्यम का व्यक्ति रहा हूं, अंग्रेजी भाषा में मेरा हाथ थोड़ा कमजोर है, पर मुझे यह मेरी कमजोरी नहीं ताकत ही लगती है, मैं खुद को दुसरों से इतर मानता हूं क्योंकि मेरा सोचने का नजरिया ही अलग है, हां मैं मेहनती नहीं हुं पर मैने मजदूरी तो नहीं पर उसके समान दर्जे के काम जरूर करे है और मुझे फर्क है, कि 10 साल की उम्र में मेरी कमाई 300 रूपए महीने थी, तब सोच थी, कि अधीकतम दसवीं तक पढ़ाई हो जाए तो बहुत है आज ग्रेजुएट है, खराब समय आपको तराशता है| श्री राम को रावण को मारने से पहले 14 साल तक वन में अपनी शक्तियों को संजोना पड़ा था, हमारा संघर्ष ही हमारी ताकत होती है, हम बुरे दौर के साथी को ही हनुमान मान बैठते है, क्योंकि वह संकटमोचक होता है| सोचता हूं जिंदगी में कुछ ऐसा हासिल करना है, कि मेरे नाम से मेरे परिवार को जाना जाए, अभी वनवास का समय चल रहा है एक दिन उपलब्धि भी यकीनन हाथ लगेगी |

जीवन के अर्थ को समेटे हुए भावुकता से भरा लेख
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