मिलने की ख्वाहिश
मेरा 22 वा बर्थडे 22 जुलाई को था और ठीक एक दिन पहले
मैं नरसिंहपुर स्टेशन पर खड़ा यह सोच रहा था, कि जयपुर जाने की जुगत कैसे बिठाई
जाए, यूं तो दो
महीने पहले तक जयपुर से मेरा कोई नाता नहीं था, पर अब मेरी दुनिया वहां बसती है, यू तो हमने फिल्मों में खूब प्यार
को देखा है, पर असल
जिंदगी में वह अब अनुभव हो रहा है, प्यार साथ में हो तो बेहिसाब खूशी
मिलती है, पर अगर दूर हो तो मिलने की तड़प भी होती है, यह शायद उस जंगल के पेड़ की प्यास
जैसी स्थिति है, जो एक लोटे
पानी में नहीं बुझती है जो सिर्फ बारिश में ही बुझती है, उसे सालभर इंतजार करना पड़ता है
अपनी तड़प को मिटाने के लिए मैं यह प्यास लेकर राजस्थान गया था| यू तो हम कनेक्टिविटी के नायाब
दौर में जी रहे है, पर वीडियो
कॉलिंग और मैसेज की दुनिया में मिलने का सुख कहां, न उनमें आलिंगन संभव है न हाथ
पकड़ पाने की खुशी| यह मिलने
की ख्वाहिश लिए जयपुर जाना था पर वहां के लिए मेरे नए ठिकाने नरसिंहपुर से कोई
ट्रेन नहीं है, तो मुझे
हमारे जन्मस्थान भोपाल से ट्रेन पकड़नी थी, यही हमारा प्यार भी परवान चढ़ा था, जहां तीन साल एक ही यूनिवर्सिटी
में पढ़कर भी हमने कभी बात नहीं की थी,
यू तो हम दोनो के डिपार्टमेंट में
एक मंजिल का फासला था,पर बात
करने में सोशल मीडिया एक कामगर माध्यम बना था, मैने अपनी प्रसंद शिवानी ( मेरा
बाबू) को सराह पर बताई थी फिर धीरे-धीरे शायद काफी लंबे अंतराल के बाद हम साथ आए, पर तब तक हमें बिछड़ना था, अब वह जयपुर में अपने सपने संजो
रही है और मैं नरसिंहपुर में नई दुनिया तलाश रहा हुं| उसी शहर भोपाल जाकर सभी लम्हों को
दुबारा जाना था, पर
नरसिंहपुर से भोपाल की ट्रेन भी शाम को थी और तब तक वहां से भी जयपुर के लिए कोई
साधन नहीं था, सोचा रहने
देते हैं, शिवानी से
बात की तो उसकी आवाज में न आने की वेदना सुनकर, मैने बोला जो भी हो कल जयपुर मैं
मिलुगां, बहुत दिमाग
के घोड़े दोड़ाए कुछ समझ नहीं आया फिर याद आया जबलपुर से 8 बजे दयोदरा एक्सप्रेस है, जो 12 बजे जयपुर पहुंचाती है, मरता क्या नहीं करता की तर्ज पर
नरसिंहपुर से ही टिकट करवायी और जनरल का जबलपुर तक का टिकट अलग से, शिवानी की खुशी उसके शब्दों से
झलक रही थी और कम समय मिलने का दर्द भी, पर खेर आखिरकार ट्रेन में बैठे पर
शुरुआती स्टेशन से ही ट्रेन लेट थी तो गंतव्य अब 1 घंटे बाद पहुंचना तय था, हम दोनो हर आधे घंटे बाद वॉटसएप, कॉल से संपर्क में थे, उसने मुझे चेताते हुए कहा कि 12 बजे के आसपास किसी का कॉल उठा मत
लेना और खुद 11.30 बजे से कॉल पर बात करने लगी पर नियति ने यहां भी मजाक कर दिया और
दमोह के नजदीक 11.50 के करीब मोबाइल नेटवर्क रहित हो गया और 12.10 पर जब मैंने दूसरे मोबाइल से कॉल
उठाया तो जन्मदिन की शुभकामनाएं देने वाला व्यक्ति शिवानी का क्लासमेट था, जिसे शिवानी प्यार से बाबुजी कहती
थी,पर जो भी
हो फिर शिवानी का फोन आया और उसने मुझपर वादाखिलाफी का आरोप गढ़ दिया. जैसे तैसे
जयपुर पहुंच गए, ट्रेन
अपेक्षाकृत लेट थी, और शिवानी
मेट्रो में उसने बोला नहालो तो भैया अपन नहा-धोकर रेड़ी हो गए पर उसकी मेट्रो
इंतजार की वेदना को बढ़ाने में उतारु थी, यह भी सही बात है,कि वह उसके पहले कभी अकेले मेट्रो
में नहीं आई थी, मैने
नाश्ता भी कर लिया और वह मेट्रो के स्टेशन पर बाबू खडी थी मैं गेट नंबर दो पर
पहुंचा सामने अपने प्रसंदीता ब्लेक रंग की भेष-भूषा में सजी खड़ी थी, मैं बेसुध था सीढ़ियां चढ़ रहा था
और वह उतर रही थी, दोनो एक
जगह रूककर गले मिले उस आलिंगन में वह खुशी थी, जिसे पाने हम दोनो 28 दिन से तड़प रहे थे, यह प्यार की वह पराकाष्ठा है, जो सिर्फ महसूस की जा सकती है, बयां नहीं. शायद मेरे पास वो वजह
है, जो दिल की
धड़कन को सामने खड़े हुए महसूस कर सकता है, उसे छू सकता है, उसे चूम सकता है और सबसे बढ़कर
दूर रहकर भी पास होने का भी अहसास करा सकता है.
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