मां खादी की चादर दे दे मैं गांधी बन जाऊं

मां खादी की चादर देदे मैं गांधी बन जाऊं, सभी के जीवन में एक प्रेरक प्रसंग या घटना होती है, जो उनके जीवन को बदल कर रख देती है, मैं अक्सर  गांधी बनने की ख्वाहिश को दिल में समाये रहता हूं, जब अंकूरावस्था में थे और पहले स्कूल में दाखिला लिया  तो वह गांधी ज्ञान मंदिर हाई स्कूल था, जहां दसवी कक्षा तक ही कक्षाएं लगती थी, शायद जिज्ञासावश ही गांधीजी को वहां देखा, सुना, समझा था, पर वह सतही ज्ञान था, जिसका कोई ठोर ठिकाना नहीं था, गांधी बापू की पहली छवि जो उभरी थी, वह हाथ में लाठी लिए खादी की धोती पहने हुए थी, शायद यहां ख्वाहिश गांधी बनने की नहीं, उनका जैसा दिखने की थी|



अस्सी प्रतिशत लोग विचार को नहीं वेशभूषा को अपनाते हैं, गांधी जी ने एक टोपी का प्रयोग प्रतीक के रूप में किया, भारत छोड़ो आंदोलन में हर 17 या 18 साल का बच्चा गांधी टोपी पहने खुद को गांधीजी जैसा महसूस करता होगा, शायद इसीलिए यह गांधी टोपी कहलायी, आज संघ के स्वयंसेवक काली टोपी पहनते है, कांग्रेस के कार्यकर्ता सफेद टोपी, भाजपाई भगवा और समाजवादी लाल टोपी में खुद के सर को ढ़के हुए है|



अन्ना के 2013 में हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के कारण गांधी टोपी का नाम बदलकर अन्ना हजारे के नाम पर अन्ना टोपी हो गया, जिस पर तो वाकायदा लिखा भी होता था, कि "मैं अन्ना हूं" खैर हर आंदोलन की एक अवधि होती है और उस अवधि को पुरा कर आंदोलन आम आदमी पार्टी का रूप इख्तयार कर चूका है अगर कुछ नहीं बदला है, तो टोपी प्रेम अब पार्टी कार्यकर्ता खुद को अन्ना नहीं आम आदमी कहलाना प्रसंद करते हैं वो ही उनकी टोपी पर लिखा हुआ भी है|




अभी हाल ही में यूपीए सरकार में मंत्री रहे शशि थरूर ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर टिप्पणी करते हुए कहा कि "मोदीजी अजीब सी दिखने वाली नागालैंड की टोपी पहन लेते हैं फिर मुस्लिम समुदाय की टोपी पहनने में क्या गुरेज |" वैसे नागालैंड के मुख्यमंत्री ने उनके बयान पर रोष भी जताया है, लेकिन जब गहराई में उतरते हैं, तो गांधीजी के महान अनुयाई सच में महान लगते हैं, क्योंकि वह पहले से गांधी टोपी पहने रखते थे, तो फिर दूसरी टोपी पहनने का ड़र ही नहीं, फिर आप किसी भी फिरके के प्रतीक से बचते हुए दिखते हैं, जश्न ए आजादी के महीने में पहली संसद की कल्पना कीजिए, राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद, प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, बाबु जगजीवन राम, लाल बहादुर शास्त्री, मोरार जी देसाई सरीखे सभी बड़े नेता गांधी टोपी पहने दिखते हैं| खादी की चादर पहन कर फकीरों जैसा जीना सब के बस की बात नहीं थी, इसीलिए गांधीजी की टोपी सबने उधार ले रखी थी|





यही हाल नेहरु जैकट का हुआ है, हम उन बड़े प्रतीक चिह्नों को खुद से जोड़कर अपनी छवि को निखारना चाहते हैं, जो क्रांति या गांधी जी से जुड़ी हुई है, गांधीजी ने चौरा- चौरी में हुई हिंसा के बाद असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था क्योंकि तब उक्साई भीड़ ने एक थाने में आग लगा दी थी उनका अंदेशा था कि भविष्य में सब आपस लड़ कट मिटेगे,इस हिंसा के ड़र से उन्होंने स्वतंत्रता तक से परहेज कर लिया, शायद यही कारण था, कि गांधीजी के इतने बड़े जन आंदोलन में भीड़ द्वारा हत्या न के बराबर हुई, उस समय देश में लोकतंत्र भले ही नहीं था, पर गांधीजी जैसी महान व्यक्तित्व के कारण भीड़ तंत्र जैसी बुराई भारत से कोसों दूर थी, विभाजन के दौर में जब साम्प्रदायिक संगठनों ने लोगो के दिल में नफरत की आग भरने का काम किया, तब भी गांधीजी बंगाल में अपनी कोमल काया लिए जमीन पर लोगों के रोष को झेलने गए थे| हमारा लोकतंत्र इसीलिए आज स्थायी है, क्योंकि हमने गांधीजी जैसे विचार को देखा है, विभाजन के दौर में पंजाब के गवर्नर ने कहा था, कि एक तरफ पंजाब में भारी तादाद में सुरक्षा बल मौजूद है और उनके सामने अकेला गांधी बंगाल में हिंसा रोकने में सफल हो पा रहा है, हमेशा देश में नारे लगते है, "अन्ना नहीं यह आंधी है,देश का दुसरा गांधी है|" पर दूसरा गांधी न कोई था, न कोई होगा, मेरे बचपन की इच्छा थी, कि खादी की चादर ओढ़ कर गांधी जैसा दिखु पर न गांधी टोपी में वसते है, न उस खादी की चादर में, उनके जैसा बनने के लिए दुबारा सत्य के प्रयोग करने होंगे, जिसमें अब सदियां व्यतीत होगी|

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