50 वर्ष तक द्रविड आंदोलन के नेता रहे करुणानिधि की कहानी, 94 वर्ष की आयु तक जीवित रहे तीन ट्रेंड सेंटर नेताओं की कहानी

94 वर्ष की उम्र में देह त्यागने वाले तीसरे नेता जो ट्रेंड सेंटर के तौर पर तमिलनाडु ही नहीं अपितु पूरे देश पर छाप छोड़ गए है, वह 94 वर्ष के उन तीन ट्रेंड सेंटर नेताओं में तीसरे और महत्वपूर्ण नेता रहे है, जिन्होने तमिल जनमानस के दिलों पर राज किया| 3 जून 1924 को जन्मे मुत्तुवेल करुणानिधि वह शख्सियत थे जो 2012 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद 5 वर्षों तक विधानसभा नहीं गए थे (विधायक के रूप में शपथ लेने के अवसर को छोड़कर) कारण यह था, कि वह अधिक उम्र हो जाने के कारण शारीरिक अपंगता के कारण विधानसभा जाने में सक्षम नहीं थे उसके बावजूद भी वह 2016 में हुए विधानसभा चुनाव में पूरे तमिलनाडु में सर्वाधिक वोटों से थिरूवरूर सीट से विजयी हुए थे| यह वह जनसमर्थन था जो उनके साथ उम्रभर जारी रहा, जब वह चेन्नई के कांवेरी हॉस्पिटल में अस्वस्थता के कारण दाखिल हुए थे, अस्पताल के बाहर खड़ी हजारों की तादाद में भीड़ उस द्रविड नेता की सुख दुख की साथी थी, जो 50 वर्षों से या यू कहे कि अन्नादुरई और पेरियार की मौत के बाद द्रविड़ आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा था| वह 13 बार विधायक 5 बार मुख्यमंत्री और अपराजित राजनेता थे जो कभी चुनाव नहीं हारे थे|


उन्हे कलागिरी कहा गया था, जिसका मतलब सभी कलाओं में निपुण होना होता है, वह थे भी ऐसे जब 1936-37 में मद्रास के तत्कालीन मुख्यमंत्री और 94 वर्ष की आयु के पहले ट्रेंड सेंटर नेता चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने हिंदी को स्कूलों में अनिवार्य कर दिया तो एक 14 वर्ष का बालक इवी रामास्वामी पेरियार (94 वर्ष के दूसरे ट्रेंड सेंटर नेता) के चलाये द्रविड़ आंदोलन में शामिल हो गया, करूणानिधि की जिंदगी ने उन्हे हमेशा दोहरे रूप दिखाए है उन्होंने सत्ता का सुख भी भोगा है और विपक्ष में रहकर जांच एजेंसियों की गिरफ्तारी भी, वह छात्र राजनीति के कारण पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए पर 50 तमिल फिल्मों में संवाद लिखकर खुद को एम जी आर को स्थापित करने में कारगर रहे, उन्होने जीवन भर तमिल राष्ट्रवाद की राजनीति करी पर जब उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखी तो उसका शीर्षक नेन्जुक्कु नीति (दिल के लिए इंसान) रखा| वह स्कूली दिनों में हिंदी विरोध करने के कारण अपने राजनीतिक गुरु और द्रमुक संस्थापक अन्नादुरई और बाद में द्रविड़ आंदोलन के जनक पेरियार के संपर्क में आए पर 2014 के लोकसभा चुनाव में पहली मर्तबा द्रमुक के पोस्टर हिंदी में चस्पा हुए थे, यू तो तब द्रमुक की कमान उनके पुत्र स्टालिन संभाल रहे थे, पर यह बदलाव करूणानिधि के जीते जी हुआ था|


1996 में देश में तीन प्रधानमंत्रियों ने शासन किया था,  पहले एनडीए के अटल बिहारी वाजपेई 13 दिन तक पीएम रहे फिर तीसरे मोर्चे के एचडी देवगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल पीएम बने, तब के कांग्रेस सुप्रीमो सीताराम केसरी ने यह कहकर तीसरे मोर्चे की सरकार से समर्थन वापस ले लिया की, तब सरकार में साझेदार द्रमुक को प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के साजिश की जानकारी थी. खेर तख्तापलट होता है और एचडी देवगौड़ा की जगह इंद्रकुमार गुजराल प्रधानमंत्री बनते हैं पर उसी कांग्रेसनीत गठबंधन की सरकार में दस साल द्रमुक प्रमुख करुणानिधि की पार्टी के लोग शामिल होते हैं, गोरतलब है,कि उस संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी होती है, जिनके कोप से केसरी ने तख्तापलट किया था, खेर 2 जी स्पेक्ट्रम को घोटाला कहा जाता है और द्रमुक कोटे से मंत्री ए राजा और करूणानिधि की बेटी कनिमोई भी तिहाड़ में समय गुजार कर आती हैं|
जब 1967 में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और द्रमुक प्रमुख अन्नादुरई की मौत हो जाती है और उन्हे मरीना बीच पर दफनाया जाता है तो जो पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम से भारत मुनेत्र कड़गम बनने की दिशा में जा रही थी वह वापिस तमिल राष्ट्रवाद की ओर जाती दिखी, दरअसल एक दफा अन्नादुरई ने द्रविड़स्तान द्रविडों के लिए अलग देश का नारा दिया था पर धीरे धीरे वह सहिष्णु होते जा रहे थे, 1962 में जब भारत चीन से युद्ध का समय था, तब अन्नादुरई ने द्रविड कार्यकर्ताओं को राष्ट्रीय सुरक्षा के काम में लगा दिया था, जो पार्टी कभी गैर-ब्राह्मणों की ही पार्टी कहलाती थी|



अन्नादुरई ने उसमें उत्तरभारतीयों और ब्राह्मणों को भी आने का मौका दिया खेर अन्नादुरई की मौत के बाद के कामकाज और करुणानिधि फिर एम जी रामचंद्रन और करुणानिधि और फिर जयललिता और करुणानिधि की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के चर्चे होते थे, जो एक चरित्र तमिलनाडु की राजनीति से कभी ओझल नहीं हुआ वह थे करूणानिधि| एम जी रामचंद्रन तमिल सिनेमा के महानायक थे, शुरूआत वह कांग्रेस से जुड़े वर राजगोपालाचारी और गांधी का दौर था, पर धीरे धीरे उनका दल से मोहभंग होता गया, जब करूणानिधि संवाद लेखक और एम जी रामचंद्रन की जोड़ी साथ में जुटी तो दर्शक सिनेमा देखकर तालियां बजाने को विवश हुए, करूणानिधि उस समाज की कहानियां गढ़ते थे जो समाज की उपेक्षाओं का शिकार था, जब करुणानिधि राजनीति में सक्रिय थे, तो एम जी रामचंद्रन भी उनके साथ हो गए, जब अन्नादुरई की मौत के बाद एमजीआर ने करुणानिधि से मंत्री पद मांगा तो करुणानिधि ने कहा आप सिनेमा छोड़ कर राजनीति में आओं तभी कुछ होगा, दोनों के मतभेद से एआईएडीएमके बनी और एमजीआर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री उनकी लोकप्रियता करुणानिधि से ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं थी|



 1972 में भारतरत्न से सम्मानित एमजीआर से राजीव गांधी तब परेशान हो गए जब उन्हें पता चला कि तमिलनाडु की अपनी श्रीलंका नीति है, दरअसल श्री लंका में आंतरिक कलह की स्थिति में जब राजीव गांधी ने श्री लंका में सेना भेजी तो तमिल लोगों ने उसका विरोध किया| एमजीआर की मौत के बाद उनकी राजनीति उतराधिकारी और बाद में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता और करूणानिधि का रिश्ता ठीक भारत पाकिस्तान के रिश्ते जैसा हो चला था, जब जयललिता मुख्यमंत्री बनती तब वह करुणानिधि पर भ्रष्टाचार के केस खोल देती थी और जब करुणानिधि मुख्यमंत्री बनते तब जयललिता पर आय से अधिक सम्पत्ति की फाइल चालू हो जाती है, उनका गतिरोध एक तरफ और दोनों नेताओं के लिए जनता का अपार जनसमर्थन एक तरफ अंतोगत्वा 7 अगस्त 2018 को 94 वर्ष के इस तीसरे और आखिरी चमत्कृत नेता की मौत के बाद तमिल राष्ट्रवाद अंधेरे में है वैसे रजनीकांत और कमल हासन राजनीति का हिस्सा बनना चाहते है पर दूसरा करुणानिधि बनना अभी भी मुश्किल है, मैंने उनको चमत्कृत लिखा पर वह भी उसी नास्तिक प्रवृत्ति के समर्थक थे, जो तर्क और विज्ञान में भरोसा करते थे आडम्बर और अंधविश्वास में नहीं|

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