जब बंदूकें खामोश हो जाएंगी, जब खिलेंगे धरती पर फूल
वाजपेयी जी यू तो संसार से विदा 16 अगस्त 2018 को अपराह्न 5 बजकर 5 मिनट पर हुए पर 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद वह एक दम से राष्ट्रीय राजनीति के फलक से ओझल हो गए थे, वह 2009 तक लखनऊ लोकसभा सीट से सांसद थे, पर संसद में उनके भाषणों से 2004 के बाद देश सुनने को तरस रहा था, 2009 के लोकसभा चुनाव में जब अटल जी के बाद लालकृष्ण आडवाणी पीएम इन वेटिंग के तौर पर उभरे तो खराब स्वास्थ्य के कारण लखनऊ लोकसभा सीट से सांसद के तौर पर वाजपेयी जी का लड़ना मुश्किल था, तो उनके सहयोगी रहे लालजी टंडन को वहां से लड़ाया गया वह जीते भी पर अटल बिहारी जी के शब्दों के बाणों से अब देश की राजनीति की रणभूमि दूर हो चली थी, पहले पहल यह खबर आती थी, कि वाजपेई जी के जन्मदिन पर यानि 25 दिसंबर को राज्यों के मुख्यमंत्री और तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी उन्हे शुभकामनाएं देने चले जाते थे, पर वह कुछ वर्षों से लोगों को पहचानने से भी इंकार कर देते थे, जब 2015 में उन्हे भारत रत्न देने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी उनके कृष्णा मेनन मार्ग स्थित निवास पहुंचे तो उनका चेहरे के आगे एक जवान सामने आ गया था, मुझे याद है, कि सब उस जवान को कोस रहे थे, कि काश वो हट जाता तो उनके दर्शन तो हो जाते, वो उनकी आखरी फोटो थी, जो सार्वजनिक पटल पर आई थी,
उनके जीते जी उनके नाम पर अटल बिहारी हिंदी विश्वविद्यालय और अटल बिहारी वाजपेई सुशासन केंद्र सरीखे संस्थान खडे होते हमारी पीढ़ी ने मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में देखे थे, वह शख्स जो भारतीय जनता पार्टी में भी नेहरू की राजनीति का सच्चा उतराधिकारी था, 1984 के लोकसभा चुनाव में ग्वालियर से वह कांग्रेस प्रत्याशी माधवराव सिंधिया से भारी मतों से पराजित हुए थे, पर उन्हे न अपनी जीत का गुरूर था न हार पर मलाल, वह तो अटल थे, एक कम्युनिस्ट छात्र नेता, एक कविहदय जो राजनीतिक संत कहलाने योग्य आर्दश जीवन जीकर गया है|
अभी राज्यसभा में शिरोमणि अकाली दल के नरेश गुजराल के निजी विधेयक संसद (उत्पादकता में वृद्धि) विधेयक पर चर्चा हो रही थी, राजनीतिक शिष्टाचार की बाते जब राज्यसभा सांसद कैलाश सोनी और संजय सिंह ने की, तो दो नाम उन्होंने प्रमुखता से लिए एक समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया और दूसरे अटल बिहारी बाजपेई, वाजपेई जी संसद के शुरूआती दिनों से सदस्य थे, उन्होने जनसंघ और भाजपा दोनों के नेता के तौर पर उस आदर्श विपक्ष की भूमिका अदा की जो प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव राव के समय जिनेवा में भारत का पक्ष रखने जाता है और मनमोहन सिंह जब वित्तमंत्री बने तो उन्हे आलोचना कैसे स्वीकारते है इसका पाठ भी पढ़ाता है, वह मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, पीवी नरसिंहराव, चंद्रशेखर सहित सभी दलों के नेताओं के साथ सौहार्द पूर्ण मित्रता रखते थे, वह जब जब लाल किले की प्राचीर से बोले तब तब उन्होंने लिखा हुआ भाषण वाचा, जब उनसे सहयोगियों ने कहा कि आप अपनी शैली में भाषण दिजिए तो उनका जबाव था, कि मैं प्रधानमंत्री के नाते गलती नहीं करना चाहता क्यो कि वह जानते थे, कि उनकी शैली स्वतंत्र है, और प्रधानमंत्री का भाषण भाषाई कसावट वाला होता है, यह बात उनके दल के अगले प्रधानसेवक ने नहीं मानी क्योंकि मोदी जी जब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने 15 अगस्त 2014 को लाल किले की प्राचीर से बिना पढ़े भाषण दिया था, अभी एक मैकेनिक की दुकान पर गया वह भाई अग्निबाण अखबार की संपादकीय पढ रहा था और कह रहा था, कि उन्होने तीन देवियों मायावती, ममता बनर्जी और जयललिता के साथ सरकार चलाई थी, हमारे दादाओं की पीढ़ी नेहरू जी की फोटो को देखकर सर झुकाया करती थी आज वैसी ही श्रद्धा वाजपेयी जी के फोटो के समक्ष भी देखी|
वाजपेई जी का 80 वां जन्मदिन था, तो तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. कलाम ने प्रधानमंत्री को फूलों का गुलदस्ता और एक ग्रीटिंग कार्ड भेंट दिया। कार्ड में शुभकामनाओं के साथ कुछ पंक्तियां भी उन्होंने लिखीं- 'जब बंदूकें खामोश हो जाएंगी, जब खिलेंगे धरती पर फूल, सच्ची आत्माओं से महक उठेगी, जिसने इस सुंदर शांति का किया है सृजन'। यह ही शब्द आदरणीय वाजपेई जी के प्रति समर्पित है वह वो पुष्प थे जिनकी खुशबू से भारतीय राजनीति और देश महका है|




अटल थे ,अटल हैं, अटल रहेंगे।
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर लेख
जवाब देंहटाएंKeep it up
जवाब देंहटाएंBhut achcha likha hai