आजादी



आज पहली मर्तबा तिरंगे को लहराते हुए नहीं देखा, हर बार भोपाल के लालपरेड मैदान पर मुख्यमंत्री द्वारा  झंडा वंदन को लाइव देखा है, हर्ष फायर के साथ टुकड़ियों में बजती राष्ट्रगान जन-गण-मन की धुन में तीसरी बार खडा हुआ जाता है, यह उद्घोषक सलामी मंच के पीछे से बोलते हैं, पर उसके बावजूद लोग बेसुध से तीनों बार खड़े हो जाते है और उनके पीछे पीछे सभी लोग पर अपन नाज से दो बार बैठे रहते थे, वहीं वर्षो का अनुभव जो ठहरा, शायद होश संभालने से अब तक हर स्वतंत्रता दिवस का कार्यक्रम जो देखा है, सलामी मंच पर मुख्यमंत्री का आना



,उन्हे कमाण्डर द्वारा सलामी देना, ध्वजारोहण कर गुब्बारे हवा में छोड़ना, पुलिस महानिदेशक के साथ खुली जीप में बैठकर परेड़ की सलामी लेना और जनता का अभिवादन स्वीकारना फिर मुख्यमंत्री का संदेश पढ़ना और एकाएक लोगों का कुर्सी से उठकर संदेश की प्रति पर झपेटा मारकर झीनना, मुख्यमंत्री द्वारा पदक बांटना और एकदम किसी स्काउट गाइड के बच्चे का परेड की थकावट के बाद मैदान में गिरजाना, झांकियों को देखकर बच्चों का खिल उठना सब दृश्य इन आंखों में समाए है, मुख्यमंत्री के बगल से लगी कुर्सियों पर वीवीआईपी के जमावाड़ा से अभी दो-तीन बार से सेल्फी के लिए लोगों का अनुशासन हीनता भी मैने देखी थी



, पर इस बार स्वतंत्रता दिवस इन राष्ट्रभक्ति गीतों की धुनों के जितना सुहाना न होकर आज के युवा की तरह आभासी या मोबाइल की दुनिया में रचा वसा था, इस बार मैं एक स्वतंत्रता सेनानी के निजी सचिव की भांति नहीं बल्कि एक सुस्त डीपी में देशभक्ति दिखाने वाले युवा की शक्ल अख्तियार कर चुका हुं, सुबह उठे एक पोस्टर बनाया, बनाया भी नहीं एक बने बनाए पोस्टर में खुद की फोटो चेपी,दो दिन पहले ही एक राजनीतिक दल के एप की जानकारी मिली थी, डाउनलोड किया और आज पहला प्रयोग स्वतंत्रता दिवस पर ही किया, क्योंकि वह दल देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जी के विचार को खुद से काफी इतर मानता है, शायद इसीलिए इस महान रणबांकुरे को पोस्टर में जगह नहीं दी गई हमें क्या हमें तो वॉट्सएप, ट्वीटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर बस पोस्टर से देशभक्ति दिखानी ही थी, तो दिखा दी, जब कमरे से उठकर निकले तो जिले के सारे राष्ट्रध्वज उतर चुके थे, शायद लगे भी हो तो आभासी दुनिया के व्यक्ति को कहा दिखेंगे, तो सोचा मूवी देखकर आया जाए, तो 16 किलोमीटर दूर एक सीताराम माॅल करेली में है, नरसिंहपुर जिला मुख्यालय से 45 से 55 मिनट में वहां पहुंचा जा सकता था, जिलें में नए नए वसे है तो गुगल मैंप पर लोकेशन डालकर उन मोहतरमा की आवाज चालू कर दी अब उनके शब्दों के क्रम में मुझे दाए बाए जाना था, रास्ते में सोचा कितने हाइटेक हो चूके हैं, गुगल मेप मुझेअनजान डगर में रास्ता बता रही है, इतने बड़े हाइवे एनएच 26 पर गाड़ी चल रही है, काश गांधीजी सरीखे सेनानी यह विकास देखते तो खुद के संघर्ष के प्रतिसार पर खुश होते, गांधीजी एक दम से दिमाग में नहीं आए बल्कि रास्ते में खेतों में लहराता फसलों को देखकर गांधी जी के गांव आधारित विकास का खाका घूम रहा था, जो उनके सबसे बड़े अनुयाई नेहरू जी ने शहर आधारित उद्योग आधारित उद्योगों को स्थापित कर तोड़ दिया था, वैसे नेहरू जी स्मरण आया तो अभी हालही में मध्यप्रदेश के राजभवन को राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने आम नागरिकों के लिए खोला है, पहली बार आम नागरिकों ने राज्यपाल के घर में दस्तक दी है, यू तो यह सराहनीय पहल है, पर यहां भी स्वतंत्रता सेनानियों के चित्रों में नेहरू जी गायब है, संघ के संस्कार पर स्थापित सरकारें नेहरू को अछूत मान रही है, इतने महान विजनरी और भारत की नीव के मजबुत पत्थर से ऐसी अस्पृश्यता मेरी सोच से परे है|
खेर रास्ते में गांव के खेतों से शहर को जोड़ते हाइवे पर   गांधी जी जिसे करूणा की कविता कहते थे ऐसी गाय आती दिखी मैं अवाक से रूक गया और मेरे पीछे आता ट्रक भी, जब खेत में नजर दौड़ाई तो देखा कि भूमिपुत्र किसान गायों के पीछे लाठी लेकर दौड़ लगाता दिखा, यहां न गाय दोषी है, न किसान, गाय यू तो हिन्दुस्तान की छहमाताओं में से एक है, पर यहां इन माताओं के लिए न वृद्धाश्रम जैसी व्यवस्था है, न ही घर में बेठने लायक जगह अब बिचारी भूल वश किसान की फसल तबाह कर देती है और किसान बिलख उठता है, वैसे जिलें में संचालित अधिकतर गौशालाओं में गायों के लिए जगह नहीं है, तो वह बिचारी सड़क के एक छोर से दूसरे छोर तक मरने पर विवश है, इन सड़कों पर बारिश के पानी के बाद सबसे ज्यादा गौमाता का रक्त ही गिरा है, थोड़ा आगे जाकर पगड़डी नुमा सड़क दिखी जो मॉल की तरफ ले जाने वाली थी, पूरी कीचड़ से सनी हुई सड़क जो कहीं कहीं कांक्रीट की सतह दिखाकर मानों यह बता रही हो कि बेटा मैं भी कभी पक्की हुआ करती थी, देर सवेर वहां सिनेमाघर पहुंचे शहर के सबसे बड़े मॉल के सिनेमाघर की खिड़की पर हमारा एटीएम कार्ड महज एक प्लास्टिक कागज सा मेला था, वहां नगद रहित आहरण पर धता होता दिख रहा था, दो दिन पहले साइकिल की दुकान पर एटीएम कार्ड स्वाइप मशीन देखकर जो खुशी हुई थी, वर यहां दुख में बदल गई, वैसे दुख और ज्यादा हुआ जब आदीवासी नेता की जीत और गांधी विचार की हार का दुष्परिणाम देखा, दरअसल गांधीजी जी शराबबंदी के पक्षधर थे और शराबबंदी कराना चाहते थे, गांधीवादी सांसदों ने जब शराबबंदी का कानून बनाने का प्रयास किया तो आदीवासी ने कहा कि शराब आदिवासी पूजा पद्धति का हिस्सा है, इसीलिए इसे बंद मत कीजिए हुआ भी और मंदिरा अब सरकार के उपार्जन का मुख्य जरिया है,


 वहां सिनेमाघर में दो युवक घोर नशे में अपनी आजादी जी रहे थे, पिक्चर अक्षय कुमार की गोल्ड थी, जिसमें 1948 के ओलंपिक में हॉकी गोल्ड मेडल को स्वतंत्रता के मूल्यों से जोड़कर दिखाया गया था, 1937 का जर्मनी और नाजी नेता हिटलर से तिरंगे कि शान तक की कहानी बयां करती उस मूवी में तिरंगे को फहरते देख और एक  बार राष्ट्रगान की धुन और एक बार गाते हुए जन-गण-मन गाकर और खड़े होकर स्वतंत्रता दिवस का थोड़ा सा अहसास तो हुआ वैसे भी आजकल राष्ट्रगान में खड़े होने को ही बस राष्ट्रभक्ति माना जाता है, चाहे आप कर्तव्य विमुख ही क्यों न हो, वैसे मूवी खत्म  होते ही चाय की चपरी मिली , वहां चाय से ज्यादा चर्चा गर्म चल रही थी, चार लोग आपस में 71 वे स्वतंत्रता दिवस और 72 वी वर्षगांठ पर बहस कर रहे थे, वह चर्चा पूर्णता सुनने लायक और तर्कपूर्ण थी, अंत में गुगल बाबा ने निर्णायक के तौर पर वहां प्रवेश किया और दोनों ही बातें गुगल ने सही बता दी, उस चर्चा का जो अंत था, वह ही आज की आजादी के दिन का अंत है "तुम्हे लगता है, कि सिर्फ तुम्हारी हां में हां मिलाने वाला देशभक्त और बाकि सब अवैध घूसपैठिये है, भई हमारी पार्टी 70 साल से चाहे राज कर रही होगी पर 125 साल का संघर्ष भी हमारा है" इसके जबाव में एक अंधेड व्यक्ति बोला "मोदीजी चाय बेचते थे और तुम्हारा पप्पु चांदी का चमचा लेकर पैदा हुआ है" खेर जो भी हो भारत की आज़ादी शायद राजनीति की कैद और राजनीति जुमलों की कैंद से जब आजाद होगी तभी हमें आजादी मिलेगी|



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